यह प्रदेश मंदिरों एवं प्राकृृतिक छटा से अच्छादित रंग - विरंगी दृृश्य से भरपूर घाटियों का मनोरम स्थल है जहां प्रतिवर्ष लाखों सैलानी एवं धार्मिक भावनाओं से जुड़े लोग लगातार आते रहते है। हरिद्वार ,रूद्र प्रयाग , जोशी मठ, चमोली, उत्तरकाशाी, नीलकंठ, हेमकुंड, नंदादेवी, गोमुख गंगोत्री, अमरनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ अनेक तीर्थस्थल इस प्रदेश की रौनक है जहां जाने की हर सुगम व्यवस्था करने का दायित्व वहां की चुनी सरकार पर है। नैनीताल, अलमोडा ,मंसूरी ,यहां के हिलस्टेशन, नेशनल पार्क इस प्रदेश में बार - बार सैलनियों को आने का निमंत्रण देते है। सरकार एवं वहां के निवासियों का पुनीत कर्तव्य बन जाता है कि सैलानियों एवं तीर्थयात्रियों को हर सुविधा मुहैया करायें जिससे इस प्रदेश की शानशौकत बनी रहे। इनके लिये सरकार प्रदेश में जगह - जगह बेहतर पर्यटन केन्द्र खोलकर बेरोजगारो को नियमित रोजगार देने का सुअवसर उपलब्ध करा सकती है।

इस प्रदेश में मार्ग की भी ज्वलंत समस्याएं है जिसे सही कर उद्यमियों को नये उद्योग लगाने की दिशा में प्रेरित कर बेरोजगारी दूर की जा सकती है। इस प्रदेश की सबसे बड़ी ज्वलंत समस्या बाढ,भूकंप एवं भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का है जिसका सही हल निकालकर रोजगार देनेे के संसाधन उद्योग लगाने की संभावनाएं बनाई जा सकती है । प्रदेश के उबड़ - खाबड़ जमीन को समतल बनाकर उद्योग एवं कृृर्षि लायक बनाया जा सकता है।

पर्वतीय क्षेत्र की कृृषि में समुचित मशीनीकरण के अभाव में प्रदेश में उत्पादन एवं रोजगार घटता जा रहा है जिसे आधुनिकीकरण का रूप देकर विकसित किया जा सकता है। प्रदेश में जैव संसाधन का बाहुल्य है। जल एवं उर्जा के महत्वपूर्ण स्त्रोत है। वन एवं कृृषी उत्पादों की विविधता है। यहां का जलवायु शुद्ध एवंज ल अमृृम सदृृश है। जिससे पर्यटन विकास की संभावनाएं सर्वाधिक बन सकती है। प्रदेश में कृृषि एवं वानिकी विकास की सेभावनाएं भी बनी हुई है। प्रदेश में सेवाओं की उपलब्घता में वृृद्धि एवं बुनियादी ढांचे में सुधार कर विकास की संभावनाएं तलाशी जा सकती है। जिससे पर्यटक एवं उद्योगपतियों को आने का मर्ग सुगम हो जायेगा । प्रदेश की उबड़ - खाबड़ जमीन को समतल एवं कृृषि योग्य सीढ़ीतर बनाकर कृृषि एवं पशुपालन की दिशा में विकास की संभावनाएं बनी हुई है। प्रदेश के वन उत्पादों के लिये उद्योग एवं बाजार उपलब्ध कराकर प्रदेश से पलायन रोका जा सकता है।

उत्तराखंड जहां पर्वतीय राज्य होने के कारण प्राकृृतिक सम्पदा से भरपूर है वहीं प्राकृृतिक आपदा से भी घिरा है। जहां समय - समय पर भूकंप एवं भूस्खलन की घटनाएं बार - बार होती रहती है। जिससे धन,जन दोनों क्षेत्र में काफी नुकसान होता है। इस दिशा में सरकार को ज्यादा सजग एवं तत्परता से कार्य करने तरीके अपनाने होंगे। प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माग्रेट आल्वा ने भी इस दिशा में विचार करते हुए तत्कालीन सरकार को अपनी राय दी थी कि प्रदेश के सतत् विकास के लिये राज्य के बुनियादी ढ़ांचा को मजबूत किया जाना बहुत जरूरी है। प्रदेश के युवकों में मेहनती जज्बें है, जिन्हें पहचानने की आज जरूरत है। प्रदेश की शिक्षा को व्यवसायिक शिक्षा से जोड़े जाने की जरूरत है, जिससे स्वरोजगार की संभावनाएं बन सके ।

उत्तराखंड का भौगोलिक परिवेश पर्वतीय मैदान होने के कारण बड़े उद्योग लगने की संभावनाएं तो नहीं बन सकती पर वन प्रदेश होने के कारण काष्ट की यहां बहुतायत है जिससे लकड़ी उद्योग स्थापित कर इससे कुटीर उद्योग विकसित किये जा सकते। यहां की जलवायु उŸाम, स्वस्थ्य वर्द्धक हावाएं एवं आकर्षक मनोहारी छटा होने के कारण अनेक जगह छोटे - छोटे पर्यटक केन्द्र सरकारी तौर पर बनाये जा सकते, जो पर्वतीय अद्योग के रूप में प्रदेश के विकास में सहायक बन सकते।

इस तरह प्रदेश में विकास की अनेक संभावनाएं है, जिन्हें तलाशने एवं सही रूप देने की जरूरत है। (संवाद)