इतने सारे आरोप लगने के बाद भी एमजे अकबर अपने पद पर बने हुए हैं। वे देश के विदेश राज्यमंत्री हैं। विदेशों में वे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह भी तथ्य है कि उनपर लगे आरोपों की खबर देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में फैल गई है। इसके बावजूद वे विदेश मंत्रालय के मंत्री बने रहने में कोई बुराई नहीं समझते। यह सच है कि यदि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, तो उनकी मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं। कुछ अन्य महिलाएं उनके खिलाफ आरोप लेकर सामने आ सकती हैं। इस्तीफा न देने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वे सोंचते हों कि इस्तीफा देने का मतलब आरोपों को स्वीकार कर लिया जाना है।

इसलिए यह समझ में आता है कि अकबर इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं, लेकिन साधारण तर्कशक्ति से यह समझना कठिन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी सरकार से उन्हें बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखा रहे। मोदी सरकार ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ अभियान चला रही है। इस अभियान के तहत अनेक कार्यक्रम किए जा रहे हैं और इनको भुनाकर प्रधानमंत्री महिला हितों के रक्षक के रूप में दुनिया के सामने पेश हो रहे हैं। पर एमजे अकबर जैसे व्यक्ति को अपनी सरकार में मंत्री बनाकर रखने में प्रधानमंत्री की वह छवि निश्चय ही कमजोर होती है। इस बात को वे भी समझते होंगे, लेकिन इसके बावजूद क्या कारण है कि वे अकबर को बाहर का रास्ता नहीं दिखाना चाहते?

भारतीय जनता पार्टी के लोग अकबर के मामले पर आपराधिक चुप्पी लगाए हुए हैं। वे साफ साफ यह नहीं कह रहे हैं कि उनका समर्थन अकबर के साथ है या नहीं। लेकिन उनकी चुप्पी अकबर के पक्ष मे ही जा रही है और इसलिए हम बिना किसी संशय के कह सकते हैं कि भाजपा का मौन अकबर के प्रति मौन समर्थन ही है। उनकी तरफ से मीडिया में यह फैला दिया जाता है कि ये मामले बहुत पुराने हैं। कभी कह दिया जाता है कि अकबर के खिलाफ अदालत में कोई मामला नहीं चल रहा है। क्या मामला पुराना होने से चरित्रहीन व्यक्ति चरित्रवान बन जाता है और क्या राजनैतिक फैसलों के लिए अदालत की ओर देखना जरूरी है? क्या राजनैतिक प्रक्रिया अदालती प्रक्रिया की गुलाम हो गई है? ऐसा कुछ नहीं हुआ है। सरकारें तो संसद की सहायता से सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक को पलट देती हैं। फिर यह कहना कि किसी पीड़ित पत्रकार ने अदालत में मुकदमा नहीं किया, तो अकबर का दामन साफ माना जाएगा, अनुचित ही नहीं आपत्तिजनक भी हैं।

आरोप एमजे अकबर पर ही नहीं लगे हैं, बल्कि फिल्मी दुनिया से जुड़े कुछ बड़े नामों पर भी लगे हैं। वहां जिन पर आरोप लगे हैं, उनमें से कुछ पर सिनेमा जगत का अपना अनुशासन काम कर रहा है। सुपर स्टार अक्षय कुमार ने एक ऐसे फिल्म निदेशक के साथ काम करने से इनकार कर दिया, जिस पर यौन हिंसा के आरोप लगे थे। उस निदेशक को उसी कारण से फिल्म निर्माता ने अपने फिल्म से अलग होने कह दिया और वह निदेशक अलग भी हो गया है। कुछ के खिलाफ सिने जगत से जुड़े एक संगठन ने नोटिस भी जारी किया है, लेकिन एमजे अकबर के मामले में बिल्कुल उलटा हो रहा है। जबकि जितने ज्यादा आरोप उनके खिलाफ लगे हैं, उतना किसी अन्य के खिलाफ नहीं लगे हैं।

यह सच है कि किसी महिला द्वारा किसी पुरुष के खिलाफ लगाए गए आरोप को आंख मूंदकर सही नहीं माना जा सकता। आरोप गलत भी हो सकते हैं और सही भी, लेकिन जब आरोप लगाने वालों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाएगा, तो आरोपी को संदेह का लाभ भी नहीं दिया जा सकता। आरोप लगाने वाली महिलाएं कौन और क्या हैं- इसे देखकर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह सच कह रही हैं या इसके पीछे उनका कोई एजेंडा है। एमजे अकबर के मामले में देखा जाए, तो आरोप लगाने वाली महिलाएं समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं और उनकी संख्या भी एक दर्जन से ज्यादा हैं। उनमे से कई तो एक दूसरे को जानती भी नहीं होंगी, क्योंकि जिन घटनाओं की चर्चा हो रही हैं, वे 3 दशक के काल खंड में फैली हुई हैं।

मूल सवाल यही है कि प्रधानमंत्री उनको अपनी मंत्रिपरिषद से हटा क्यों नहीं रहे हैं? क्या उनका एमजे अकबर से कोई खास लगाव है। श्री मोदी का जो व्यक्तित्व है, उसमें किसी से खास लगाव की बात हो नहीं सकती। तो फिर क्या कारण हो सकता है? इसका जवाब पिछले साढ़े चार साल के अंदर कुछ अन्य मंत्रियों के हटाने की मांग पर प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिकिया जानकर मिल सकता है। रोहित वेमुला की मौत हुई, तो स्मृति ईरानी को हटाने की मांग हुई, लेकिन उसे प्रधानमंत्री ने साफ नजरअंदाज कर दिया। वीके सिंह ने दलितों की तुलना कुत्तों से कर दी थी। उन्हें हटाने की मांग भी मोदी ने नहीं मानी। एमजे अकबर के मामले में भी वे यही कर रहे हैं। स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री यह संकेत नहीं देना चाहते कि वे किसी के सामने दबाव में आकर झुक जाएंगे। लेकिन लोहिया ने गलत नहीं कहा है कि लोकराज लोकलाज से चलता है। अकबर को मोदी का मिल रहा संरक्षण आगामी चुनावों में भाजपा को भारी पड़ सकता है। दिसंबर के दूसरे सप्ताह का इंतजार करें। (संवाद)