सबसे पहले स्मृति ईरानी को हटाने का दबाव पड़ा था। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रिसर्च स्काॅलर रोहिथ वेमुला की मौत के बाद वह मांग उठी थी। तब स्मृति ईरानी मानव संसाधन विकास मंत्री थी और उस हैसियत से उन्होंने हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच हुए हाथापाई के मामले में एक पक्ष का साथ देकर वेमुला को हाॅस्टल से बाहर करवा दिया था। उसके पहले वेमुला को मिल रहा फेलोशिप भी रोक दिया गया था, जिसके कारण वेमुला और उसका परिवार न केवल आर्थिक तंगी का शिकार हो गया था, बल्कि वेमुला बेघर हो गया था।
उसी माहौल में वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी मौत में ईरानी स्मृति के मंत्रालय से एक के बाद एक भेजी गई आधा दर्जन से अधिक चिट्ठियों ने भूमिका निभाई थी। जाहिर है, सुश्री ईरानी के पत्रों की भूमिका वेमुला के निष्कासन में निर्णायक साबित हुई थी। और इसके कारण उसकी मौत की जिम्मेदार मुख्य तौर से ईरानी को ही माना गया। फिर तो चैतरफा स्मृति ईरानी के इस्तीफे की मांग उठने लगी थी। देश भर के छात्र आंदोलन करने लगे थे। लेकिन मोदीजी पर उन सबका कोई असर नहीं पड़ा। न तो स्मृति ईरानी को सरकार से बाहर किया गया और न ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाया गया। हां, उन्हें बहुत बाद में उस मंत्रालय से हटाया गया, लेकिन उसका संदर्भ कुछ और था।
इसलिए जब एमजे अकबर पर महिला पत्रकारों द्वारा आरोप लगाए जाने लगे, तब भी कुछ लोगों को ऐसा लग रहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री सरकार से बाहर नहीं करेंगे, क्योंकि बाहर करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा नहीं है। पर अधिकांश लोगों को तो यही लग रहा था कि अकबर बाहर होंगे। लेकिन विलंब होने के कारण उनकी आशा भी निराशा में बदलने लगी। जब आरोप लग रहे थे, तो अकबर विदेश यात्रा पर थे। खबर आई कि उन्हें वापस आने को कहा गया है। लेकिन वह खबर गलत साबित हुई, क्योंकि अकबर अपनी पूरी यात्रा के बाद ही भारत वापस लौटे। भारत आकर उन्होंने एक महिला पत्रकार पर मानहानि का दावा ठोंक दिया और कहा कि अन्य सभी पर वे मानहानि का दावा करेंगे, क्योंकि उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाए गए हैं, जिनसे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है। अकबर ने इस्तीफा भी नहीं दिया।
भाजपा ने न तो एमजे अकबर का खुलकर बचाव किया और न ही विरोध। दबे स्वर में वहां से आवाज आ रही थी कि मामले पुराने हैं और वे उस समय के हैं, जब अकबर भाजपा में थे ही नहीं। यह दबी आवाज भी आई कि अकबर के खिलाफ कोई मुकदमा ही नहीं किया गया है। इस तरह की दबी आवाजों और भाजपा नेताओ की सार्वजनिक चुप्पी से साफ हो रहा था कि अकबर को सरकार से बाहर करने का कोई इरादा न तो पार्टी नेतृत्व का है और न ही सरकार के नेतृत्व का है। उन्हें लग रहा था कि यह मामला धीरे धीरे शांत हो जाएगा।
लेकिन आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही थी। दो विदेशी महिला पत्रकारों तक ने भी अकबर पर यौन हिंसा का आरोप लगा दिया। बात यदि सिर्फ आरोपों तक सीमित रहती, तब भी गनीमत थी, लेकिन सामने पांच राज्यों के चुनाव भी थे, जिनमें तीन में भारतीय जनता पार्टी की अपनी सरकार है और उन तीनों में फिर से चुनाव जीतना उसके लिए बहुत बड़ी चुनौती है। इन तीनों राज्यों में राजस्थान में पार्टी की स्थिति खराब है। पिछले कुछ दशकों से वहां बारी बारी से एक बार भाजपा की सरकार बनती है, तो दूसरी बार कांग्रेस की। इस बार बारी कांग्रेस की है। इसलिए राजस्थान की हार को तो भाजपा बर्दाश्त कर लेगी, लेकिन मध्यप्रदेश की हार बर्दाश्त करना उसके लिए मुश्किल है।
अकबर के दुर्भाग्य से वे मध्यप्रदेश से ही राज्यसभा में भाजपा के सांसद हैं और मध्यप्रदेश में भी भाजपा की स्थिति कोई अच्छी नहीं है। वहां कांग्रेस पहले से ज्यादा एकजुट है। 15 साल तक लगातार सत्ता में रहने के कारण सत्ता विरोधी भाव का सामना भी पार्टी को करना पड़ रहा है। पहले शिवराज सिंह के नाम पर ही पार्टी चुनाव जीत लेती थी, लेकिन उनकी लोकप्रियता भी अब पहले जैसी नहीं रही। केन्द्र सरकार के खिलाफ माहौल भी मध्यप्रदेश में भाजपा के काम आ जाता था, लेकिन इस समय केन्द्र में भी भाजपा की ही सरकार है।
इन सबके अलावा सवर्ण और ओबीसी जातियों के गठजोड़ से बना नया संगठन सपाक्स भाजपा के लिए नई मुसीबत खड़ा कर रहा है। सपाक्स मध्यप्रदेश का आम आदमी पार्टी साबित हो सकता है। इसके कारण भाजपा वहां बहुत नर्वस है। और इसके बीच एम जे अकबर का प्रकरण भाजपा को और भी कमजोर कर रहा था। राहुल गांधी ने अपने भाषण में भी एमजे प्रकरण के द्वारा भाजपा की महिला सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठा डाले। यदि अकबर अपने पद पर बने रहते, तो मध्यप्रदेश में इसका एक बड़ा मुद्दा बनना तय था और यह निश्चय ही भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जाता।
यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी को अपना रुख बदलना पड़ा। अपने मंत्रियों को किसी बाहरी दबाव मे न हटाने की उसकी हठवादिता कमजोर पड़ने लगी। भाजपा की सूत्रों को माने, तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अकबर को हटाने की अनिवार्यता से पार्टी और प्रधानमंत्री को अवगत कराया और आखिरकार अकबर को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। लेकिन अकबर अभी भी राज्यसभा के सदस्य हैं। इसे लेकर भी भाजपा पर हमले हो सकते हैं और वहां से भी उनको हटाने की मांग हो सकती है। देखना दिलचस्प होगा कि अकबर पर चल रही राजनीति और कौन सा गुल खिलाती है। (संवाद)
एम जे अकबर का विलंबित इस्तीफा
क्या मध्यप्रदेश की राजनैतिक विवशता ने रंग दिखाया?
उपेन्द्र प्रसाद - 2018-10-18 11:06
आखिरकार एमजे अकबर ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे ही दिया। उस इस्तीफे के बाद भारत का सभ्य समाज राहत की सांस ले रहा है। हो रहे विलंब के बाद यह लगने लगा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अकबर को निकालने के लिए पड़ रहा जन दबाव काम नहीं कर रहा है और उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखाने में मोदी की कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसा लगना स्वाभाविक था क्योंकि मोदी की सरकार से अब तक किसी को भी मंत्रिमंडल से विपक्ष की मांग पर बाहर नहीं किया गया था।