संघ परिवार का डबल गेम शुरु से ही चल रहा है। इसका भी पर्दाफाश हो चुका है। संघ परिवार के एक विरोधी का यह मानना है कि यह दोहरेपन की हद है।

संघ आरोप लगा रहा है कि सबरीमाला में अयप्पा मंदिर के बाहर जो गुंडागर्दी और हिंसा हो रही है, उसके लिए सीपीएम के समर्थक जिम्मेदार हैं। पर सच्चाई यह है कि हिंसा के शिकार होने वाले मुख्य रूप से टीवी मीडिया और न्यूज एजेंसियों मे काम करने वाली वे महिलाएं हैं, जो सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का समर्थक कर रही हैं। सीपीएम भी सभी महिलाओं के प्रवेश का समर्थन कर रही है और उसकी सरकार इससे संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की कोशिश कर रही है। तो फिर अपनी समर्थक मीडिया की महिला पत्रकारों के खिलाफ सीपीएम के लोग हिंसा क्यों करेंगे?

तथ्य यह है कि मध्यस्थों, विशेष रूप से जिन महिलाओं को धमकी दी गई थी, उन्हें सबसे डरावनी भाषा में धमकी दी गई थी। उनके साथ दुव्यवहार भी किया गया। चुंकि वे महिलाएं सभी उम्र की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश की पक्षधर हैं, इसलिए संघ परिवार का यह आरोप गलत साबित हो जाता है कि सीपीएम ने उनको धमकी दी और उसके लोगों ने उनके साथ दव्र्यहार किया। आखिर कोई अपने समान विचार रखने वाले लोगों के खिलाफ क्यों होगा?

निर्विवाद वास्तविकता यह है कि अप्यप्पा के असली भक्त हिंसा में शामिल नहीं हैं। हिंसा में विभिन्न हिन्दू संगठनों से जुड़े लोग शामिल हैं। और उनमें सबको संघ परिवार का आशीर्वाद प्राप्त है। एक मंत्री ने एक आडियो क्लिप जारी किया, जिसमें एक संघ नेता संघ के कार्यकत्र्ताओं को कह रहा है कि वे अयप्पा के भक्त के रूप में सबरीमाला पहुंचें।

सबरीमाला मसले पर भाजपा का दोहरा चेहरा सामने आ रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार है। केन्द्र की सरकार ने केरल के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदेश सरकार सख्त कदम उठाए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन कराए। लेकिन दूसरी ओर प्रदेश की भाजपा ईकाई सबरीमाला में सभी उम्र की महिलाओं के अयप्पा मंदिर में प्रवेश के खिलाफ है।

मोदी सरकार को यह अधिकार है कि राज्य सरकार को वह इस तरह का आदेश दे, लेकिन भाजपा के केन्द्रीय नेत्तव का यह दायित्व बनता है कि वह अपनी पार्टी की केरल ईकाई को यह आदेश दे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का वह सम्मान करे और प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगाड़ने वाला कोई काम नहीं करे। लेकिन केन्द्र सरकार प्रदेश सरकार को तो आदेश दे रही है, लेकिन भाजपा की राज्य ईकाई को केन्द्र की ओर से कोई आदेश नहीं जारी किया जा रहा है।

भारतीय जनता पार्टी का दोहरा चेहरा इस तथ्य से भी उजागर हो रहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा के लिए कोई याचिका भी दायर नहीं कर रही है। यदि उसे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत है, तो उसे सड़कों पर हुड़दंग मचाने की जगह सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा की अपील के साथ जाना चाहिए, जैसा कि नायर सर्विस सोसायटी ने किया है।

भाजपा के पास एक रास्ता और है। वह केन्द्र की मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाने की सलाह भी दे सकती है। कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को निष्प्रभावी किया जा सकता है। पर भारतीय जनता पार्टी इस तरह की मांग भी अपनी सरकार ने नहीं कर रही है, पर सबरीमाला में सभी उम्र की महिलाओं के मंदिर मंे प्रवेश के रास्ते में व्यावधान पैदा कर रही है। (संवाद)