इसका कारण यह है कि उन चारों को सजा देने के लिए 22 जनवरी का दिन तय किया गया था। उस डेथ वारंट के बाद चार में से एक अपराधी ने राष्ट्रपति को दया याचिका दे डाली। अब जेल प्रशासन और सरकार ने कुछ ऐसा नियम बना रखा है कि यदि किसी ने दया याचिका दे रखी हो, तो उसके साथ साथ उसके सहअभियुक्तों की सजा पर भी अमल नहीं किया जा सकता। इसलिए जब कोर्ट में डेथ वारंट पर रोक लगाने के लिए अपराधियों के वकील ने उस कोर्ट में पटीशन डाला, तो जेल प्रशासन ने अदालत को साफ साफ बताया कि डेथ वारंट पर अब अमल नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक अपराधी ने दया याचिका दाखिल कर दी है। अदालत भी इस स्पष्टीकरण पर बौखला गई और जेल प्रशासन से पूछा कि ऐसा नियम क्यों बनाया गया है। अदालत ने अपराधी के वकील को भी लताड़ लगाई कि डेथ वारंट जारी होने पर ही दया याचिका क्यों दाखिल की गई? पहले वे लोग क्या कर रहे थे?
लेकिन अदालत भी लाचार थी। दया याचिका दाखिल करने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। फांसी होने की पूर्व संध्या को भी अपराधी चाहे तो दया याचिका दाखिल कर सकता है और वैसी स्थिति में न सिर्फ उसका, बल्कि उसके सह अभियुक्तों की फांसी भी टल जाती है। यह नियम है और इस नियम के रहते अदालत कुछ नहीं कर सकती। इसलिए अदालत को कहना पड़ा कि डेथ वारंट दया याचिका दाखिल करने के साथ ही अपनी मौत को प्राप्त कर चुका था।
हालांकि फांसी के लिए तय 22 जनवरी के पहले ही राष्ट्रपति ने उस अपराधी की दया याचिका खारिज कर दी। उसके बावजूद 22 तारीख को फांसी नहीं हो सकी, क्योंकि एक नियम यह भी है कि दया याचिका खारिज होने के 14वें दिन या उसके बाद ही फांसी की सजा दी जा सकती है। दया याचिका खारिज होने के बाद 14वें दिन यानी 1 फरवरी के लिए फिर उन चारों के लिए फांसी की सजा का दिन तय कर दिया गया है।
पर उस रोज सजा दे दी ही जाएगी, इसके बारे में कोई दावे से कुछ नहीं कह सकता। अभी तीन अभियुक्तों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका नहीं दाखिल की है। एक अभियुक्त के परिवार ने दया याचिका दाखिल की थी, जिसे दिल्ली सरकार और केन्द्रीय गृहमंत्रालय द्वारा खारिज किये जाने के बाद राष्ट्रपति द्वारा खारिज किया जाना बाकी था। राष्ट्रपति का कोई निर्णय आता, उसके पहले ही उस अभियुक्त ने वह याचिका यह कहते हुए वापस ले ली कि उसकी इसके लिए सहमति नहीं ली गई थी। सच कहा जाय, तो उसके बाद ही सत्र अदालत ने डेथ वारंट जारी किया था।
दूसरी बार डेथ वारंट जारी होने के बाद एक अन्य अभियुक्त ने यह दावा करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी कि कांड के वक्त वह नाबालिग था। हालांकि सु्रप्रीम कोर्ट ने उसकी वह याचिका भी खारिज कर दी है। पर अभी भी तीन अभियुक्तों द्वारा अलग अलग राष्ट्रपति से दया की भीख मांगने का अधिकार बचा हुआ है। अब यदि 31 जनवरी को उन तीनों में से एक राष्ट्रपति से दया मांगने का आवेदन लगा देता है, तो फिर 1 फरवरी के लिए जारी किया गया डेथ वारंट अपनी डेथ को प्राप्त कर लेगा और चारों एक बार फिर फांसी पर लटकने से बच जाएंगे। फिर सत्र अदालत को राष्ट्रपति द्वारा वह दया याचिका खारिज करने का इंतजार करना पड़ेगा और उसके बाद ही वे 14 दिन का समय देते हुए तीसरी बार डेथ वारंट जारी कर सकेगी।
वही बात दो बार और दुहराई जा सकती है और फिर पांचवें वारंट में ही दोषियों को सजा दी जा सकती है। सजा पाने के दिन अपराधी को स्वस्थ होना चाहिए और यदि वह अस्वस्थ हो गया, तो फिर कोई यह दावे से नहीं कह सकता कि पांचवे डेथ वारंट के बाद भी दोषी फांसी पर लटक ही जाएगा। यानी हमारी व्यवस्था में इतनी सारी कमियां हैं कि सुप्रीम आदेश आने के बाद भी दोषी फांसी से बच सकता है। ऐसा राजीव गांधी के हत्यारे के साथ भी हो चुका है। चार हत्यारों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। उनमें से एक महिला दोषी को राष्ट्रपति ने माफी दे दी थी, पर तीन पुरुष दोषी भी फांसी से बच गए, क्योंकि उन्होंने फांसी में विलंब का हवाला दिया। और कहा कि उन्होंने फांसी के डर के साए में अपना लंबा समय गुजारा है, जो उनके लिए बहुत ही यातनादायक था। इसलिए उन्हें फांसी नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी उस दलील को मान ली और वे फांसी से बच गए। फिलहाल वे उम्र कैद की सजा भुगत रहे हैं।
निर्भया के हत्यारे भी उसी कहानी को दुहराना चाहते हैं और सभी तरह की तिकड़मों की सहायता से फांसी से बचते जा रहे हैं। पर सच्चाई यही है कि इन तिकड़मों के लिए उन्हें मौका हमारी व्यवस्था ने ही दिया है। राष्ट्रपति से दया याचिका का अधिकार गलत नहीं है, लेकिन उसके लिए समय सीमा तो तय होनी ही चाहिए, न कि फांसी पाने के दिन का उसके लिए इंतजार किया जाय और अभी मुजरिमों को एक ही दिन और एक ही समय फांसी देने की व्यवस्था भी दोषपूर्ण है। जाहिर है, भारत की न्याय व्यवस्था दोषपूर्ण है और यह दोषियों को संरक्षण प्रदान करती है, जबकि पीड़ितों के लिए गंभीर यातना का कारण बनी हुई है। (संवाद)
निर्भया के हत्यारों को फांसी, सिस्टम हुई एक बार फिर नंगी
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-01-21 09:53
निर्भया के हत्यारों को फांसी की सजा मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी फांसी की सजा को 2017 में ही बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट देश का अंतिम कोर्ट है। इसलिए जब उससे भी फांसी की सजा मिलती है, तो फांसी हो जानी चाहिए। हालांकि सजायाफ्ता को सुप्रीम कोर्ट में ही उस फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका करने का भी अधिकार है। समीक्षा याचिका दाखिल भी की गई और सुप्रीम कोर्ट ने उसे भी खारिज कर दिया। यह 2018 की घटना है और अब 2020 का साल चल रहा है। पर इसके बावजूद हत्यारों को फांसी नहीं हुई है। अगले 1 फरवरी को फांसी की सजा के लिए समय तय किया गया है। लेकिन इसकी कोई गारंटी की उस दिन सजा पर अमल हो ही जाएगा।