अवसर के मुताबिक पोशाक धारण करने, मेकअप करने और भाव-भंगिमा बनाने में तो प्रधानमंत्री मोदी बेजोड हैं ही, अपनी नाकामियों को उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करने और तथ्यों को तोड-मरोडकर गलतबयानी करने के मामले में भी उनके मुकाबले कोई नहीं ठहर सकता। अपनी शख्सियत की इन तमाम खूबियों के साथ देश के समक्ष प्रस्तुत हुए मोदी ने कोरोना संक्रमण से निबटने के मामले में भरपूर गलतबयानी की और अपनी नाकामियों को भी उपलब्धियों की तरह पेश करते हुए खुद की पीठ थपथपाई।
प्रधानमंत्री ने फरमाया कि जब भारत में कोरोना संक्रमण का एक भी मामला नहीं था, हमने कोरोना प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डो पर स्क्रीनिंग करते हुए संक्रमित पाए गए लोगों का 14 दिन का आइसोलेशन शुरू कर दिया था। उन्होंने दावा किया कि भारत सरकार के समय से उठाए गए कदमों की वजह से ही हमारे यहां अन्य देशों के मुकाबले कोरोना मरीजों की संख्या बहुत कम है।
दरअसल प्रधानमंत्री यह दावा करने से पहले अगर इस बारे में अपने कैबिनेट सचिव राजीव गौबा के दिए गए बयान को देख लेते तो शायद यह गलतबयानी करने से बच जाते। कैबिनेट सचिव करीब दो सप्ताह पहले ही यह स्वीकार कर चुके हैं कि 8 जनवरी से 23 मार्च तक लगभग 15 लाख यात्री भारत आए थे। उन्हें आने दिया गया और बगैर उनकी जांच किए ही उन्हें जाने दिया गया। वे जब अपने-अपने घरों को चले गए तो केंद्र सरकार की नींद खुली और उसने राज्य सरकारों से कहा कि वे अपने यहां विदेशों से आए लोगों का पता लगाए और उन्हें क्वारंटाइन करें।
प्रधानमंत्री के दावे के संदर्भ में सवाल यह भी है कि अगर जनवरी महीने से ही विदेशों से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू हो गई थी तो फरवरी महीने के आखिरी सप्ताह में भारत आए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके विशाल अमले की भी क्या जांच की गई थी?
दरअसल प्रधानमंत्री जितनी गंभीरता ओढकर अब बातें कर रहे हैं, अगर वे वाकई शुरू में ही कोरोना के संकट को लेकर संजीदा होते तो ट्रंप की यात्रा का आयोजन ही स्थगित या रद्द कर देते। कहने की जरूरत नहीं कि संकट की गंभीरता को सिर्फ हमारे प्रधानमंत्री ने ही नजरअंदाज नहीं किया बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति की स्थिति भी अलग नहीं रही। वे जिस समय भारत आए थे, उस समय उनके देश में कोरोना से लोगों के मरने का सिलसिला शुरू हो गया था, लेकिन वे भी अपने यहां संगीन होते हालात को नजरअंदाज कर भारत चले आए, क्योंकि उनकी प्राथमिकता में भी उनकी चुनावी राजनीति सबसे ऊपर थी।
हमारे यहां स्थिति गंभीर होती जाने के बावजूद हकीकत तो यह है कि लॉकडाउन करने का फैसला लखनऊ में सिने गायिका कनिका कपूर के संक्रमित पाए जाने पर हडकंप मचने के बाद ही किया गया। उस फैसले पर अमल में एक सप्ताह की देरी भी मध्य प्रदेश में सरकार गिराने-बनाने के खेल के चलते की गई।
कनिका कपूर लखनऊ में जिन तीन-चार हाई प्रोफाइल पार्टियों में शामिल हुई थी, उनमें से एक पार्टी के आयोजक पुराने कांग्रेसी नेता अकबर अहमद डम्पी थे। उनकी पार्टी में उनसे पुरानी मित्रता निभाने के लिए राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी अपने सांसद बेटे दुष्यंत सिंह और बहू के साथ शामिल हुई थीं। दुष्यंत अगले दिन यानी 17 मार्च को संसद भवन में कई सांसदों से मिले थे और संसदीय समिति की बैठक में भी शामिल हुए थे।
उसी दिन राष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सांसदों को राष्ट्रपति भवन में भोज पर आमंत्रित किया था, जिसमें करीब 90 सांसद शामिल हुए थे। इसी दौरान मध्य प्रदेश में सरकार गिराने-बनाने के खेल के चलते विधायकों को भी बसों में भर कर इस रिसॉर्ट से उस रिसॉर्ट या होटल में ले जाया जा रहा था। सरकार गिरने के बाद उसका जश्न मनाने के लिए भोपाल में भाजपा कार्यालय पर करीब तीन हजार कार्यकर्ता जुटे थे। लेकिन इन सभी आयोजनों पर प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। सरकार के कीर्तन में मगन रहने वाले मीडिया में भी इन आयोजनों पर कोई सवाल नहीं उठा।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद नए मुख्यमंत्री के चयन में भी तीन दिन खर्च हुए। अंततः 23 मार्च को जब शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली तो अगले दिन प्रधानमंत्री ने टीवी पर आकर तीन सप्ताह के लॉकडाउन का एलान किया।
बहरहाल, प्रधानमंत्री के इस संबोधन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सकारात्मक पक्ष यह रहा कि इस बार वे अपनी चिर-परिचित उत्सवधर्मिता से मुक्त नजर नए। अपने पहले के संबोधनों की तरह उन्होंने लॉकडाउन के दौरान आने वाले दिनों में ताली, थाली, घंटा, शंख आदि बजाने या दीया-मोमबत्ती जलाने जैसा कोई उत्सवी टास्क जनता को नहीं दिया गया। हालांकि इससे उनका खाया-अघाया वाचाल समर्थक वर्ग निश्चित ही निराश हुआ होगा, लेकिन कोरोना के संक्रमण से बचाव की दिशा में यह एक बेहद महत्वपूर्ण बात है। क्योंकि पहले 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान ताली-थाली और ढोल-ढमाकों के साथ सडकों पर निकले विजयी जुलूसों और फिर 5 अप्रैल (भाजपा के 40वें स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर) दीया-मोमबत्ती और मशाल जुलूसों तथा आतिशबाजी के आयोजन ने संक्रमण को बढाने में ही योगदान दिया है। इन आयोजनों की भारत के ढिंढोरची मीडिया में भले ही खूब वाहवाही हुई हो, मगर दुनिया भर के मीडिया ने खिल्ली ही उडाई थी। शायद यही वजह रही कि प्रधानमंत्री ने इस बार ऐसा कोई भी कार्यक्रम लोगों को देने से परहेज बरता।
प्रधानमंत्री ने तीन सप्ताह से जारी लॉकडाउन को अगले 19 दिनों के लिए बढाने का एलान करते हुए कहा, ‘अगले एक सप्ताह में कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कठोरता और ज्यादा बढ़ाई जाएगी। 20 अप्रैल तक हर कस्बे, हर थाना क्षेत्र, हर जिले और हर राज्य को परखा जाएगा कि वहां लॉकडाउन का कितना पालन हो रहा है, उस क्षेत्र ने कोरोना से खुद को कितना बचाया है।’ मोदी ने कहा कि जो क्षेत्र इस अग्निपरीक्षा में सफल होंगे, जो हॉटस्पाट में नहीं होंगे और जिनके हॉटस्पाट में बदलने की आशंका भी कम होगी, वहां पर 20 अप्रैल से कुछ जरूरी गतिविधियों की सशर्त अनुमति दी जा सकती है।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में लोगों से 7 मुद्दों पर सहयोग भी मांगा जिसमें बुजुर्गों का ध्यान रखने, गरीबों के प्रति संवेदनशील नजरिया अपनाना आदि शामिल हैं। लेकिन उन्होंने करीब 24 मिनट के अपने पूरे संबोधन में जिस बात पर सबसे कम चर्चा की, वह है इस लॉकडाउन का आर्थिक पक्ष, जिस पर सबसे ज्यादा बात की जानी चाहिए थी।
कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा की तरह बोले तो बहुत लेकिन उन्होंने कहा कुछ नहीं। (संवाद)
इस आपदा काल में प्रधानमंत्री देश को आश्वस्त नहीं कर सके
जरूरी मुद्दों पर उन्होंने मुंह ही नहीं खोला
अनिल जैन - 2020-04-21 10:14
कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार बार देश से मुखातिब हो चुके हैं। पिछले सप्ताह 14 अप्रैल को राष्ट्र के नाम उनका चैथा औपचारिक संबोधन था, लेकिन उसमें भी कोरोना संक्रमण के खौफ और लॉकडाउन के चलते तमाम तरह की दुश्वारियों का सामना कर रही जनता को आश्वस्त करने जैसी कोई बात नहीं थी। उनका यह संबोधन लॉकडाउन बढाने की घोषणा के निमित्त था। चूंकि पांच-छह राज्य सरकारें अपने-अपने सूबे में पहले ही लॉकडाउन की अवधि 16 दिन यानी 30 अप्रैल तक बढाने का एलान कर चुकी थीं, लिहाजा प्रधानमंत्री ने उनके एलान से हट कर कुछ नया दिखाने के मकसद से 16 के बजाय 19 दिन के लिए लॉकडाउन बढाने का एलान किया।