लेकिन इस अपील के बावजूद भी कई घरेलू कामगारों के अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। अधिकांश घरों से उन्हें मार्च के पूरे पैसे तो, मिल गए, लेकिन कई घरों ने उनके 10 दिन के पैसे काट लिए या इसके बदले अतिरिक्त काम करवाए। कुछ महिलाओं का कहना है कि कई जगहों से पूरे मार्च के पैसे उन्हें नहीं मिल पाए, क्योंकि लाॅकडाउन की वजह से कई लोग अपने गांव-शहर चले गए।

असंगठित क्षेत्र की ये घरेलू कामगार महिलाएं लाॅकडाउन के बाद से ही अपने काम को लेकर चिंतित हैं। मार्च महीने में 10 दिन काम नहीं करने के बावजूद लगभग 80 फीसदी लोगों ने तो इन महिलाओं को पूरा वेतन दे दिया, लेकिन अप्रैल में बिना काम किए इन्हें वेतन मिल पाएगा, इसे लेकर वे आशंकित हैं। अप्रैल में काम पर नहीं जाने से इन महिलाओं को डर सता रहा है कि कहीं उनकी कमाई शून्य न हो जाए। उन्हें सरकार से आर्थिक मदद की दरकार है ।

संगिनी संस्था कई सालों से भोपाल में घरेलू कामगार महिलाओं के अधिकार के लिए काम कर रही है। इनकी पहल पर 2011 में भोपाल में घरेलू कामगार महिला अधिकार संघ का पंजीयन करया गया, जिसमें भोपाल की 10 हजार से ज्यादा घरेलू कामगार महिलाएं जुड़ी हुई हैं। संस्था की निदेशक प्रार्थना मिश्रा का कहना है, ‘‘पूरे देश में घरेलू कामगार महिलाएं इस लाॅकडाउन के कारण अपने परिवार के भरण-पोषण को लेकर चिंतित हैं। इनकी कमाई पर इनके परिवार का खर्च चलता है। कई घरों में काम करने के बाद औसतन 7 से 10 हजार रुपए तक ये महिलाएं कमाती हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भले ही कह रहे हैं कि लाॅकडाउन के दरम्यान किसी भी मजदूर या कर्मचारी का वेतन नहीं काटा जाए, लेकिन पूरे अप्रैल काम नहीं करने के बावजूद इन महिलाओं को कितने घरों से पैसा मिल पाएगा, कहना मुश्किल है। लाॅकडाउन के बाद भी कई घरों में तुरंत इन्हें काम पर बुलाने की संभावना कम ही है। इस स्थिति में इनका पूरा परिवार आर्थिक संकट में फंस सकता है।’’

लोक सभा सचिवालय के शोध एवं सूचना प्रभाग द्वारा दिसंबर 2014 में प्रकाशित सूचना बुलेटिन में दर्ज आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में 47.5 लाख घरेलू कामगार हैं, जिनमें शहरी क्षेत्रों में 30 लाख घरेलू कामगार महिलाएं हैं। एनएसएसओ के अनुसार उदारीकरण के अगले दशक यानी 1991 से 2001 के बीच देश में घरेलू कामगारों की संख्या में 120 फीसदी की वृद्धि हुई थी। दिल्ली श्रमिक संगठन के तहत गठित राष्ट्रीय प्रगतिशील घरेलू कामगाार महासंघ द्वारा दिए गये आंकड़े के मुताबिक भारत में पांच करोड़ से भी ज्यादा घरेलू कामगार हैं जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं। इन आंकड़ों के आधार पर माना जा सकता है कि ऐसी महिलाओं की संख्या करोड़ों में है। अलग-अलग आंकड़ों के बावजूद अधिकांश शहरी घरों में घरेलू कामगार कार्यरत हैं। लाॅकडाउन में इन महिलाओ का काम भी छूट गया है और लाॅकडाउन के बाद भी कोरोना संक्रमण के भय से बहुत सारे लोग इन्हें जल्द काम पर नहीं रखेंगे। ऐसे में इन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अलग से राहत पैकेज देना चाहिए, जिससे कि इनके परिवार की आजीविका चल सके।

घरेलू कामगार महिला अधिकार संघ की अध्यक्ष शीला नरवाडे का कहना है, ‘‘कई कामगार विधवा एवं एकल भी हैं। कई के पास राशन कार्ड नहीं है। इनमें से बहुत को सरकार की अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। जिन्हें पात्रता है, उन्हें घरों में काम के अलावा उस पात्रता का लाभ मिलता है। ऐसे में लाॅकडाउन से हर महिला कामगार पर असर पड़ा है। सभी को चिंता है कि कम काम या काम नहीं मिलने पर अगले दो-तीन महीने हम कैसे घर चलाएंगे।’’ संघ की कोषाध्यक्ष अनीता रजक का कहना है, ‘‘एक ओर इन महिलाओं में रोजगार का संकट बढ़ा है, तो दूसरी ओर इन पर घरेलू हिंसा भी बढ़ी है। यह भी खतरा है कि जिन महिलाओं के बच्चे कुछ बेहतर शिक्षा पा रहे हैं, पैसे की कमी से उनकी शिक्षा अधूरी न रह जाए।’’

कई घरेलू कामगार महिलाओं ने भी अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि सरकार उनके लिए अलग से राहत दे। ज्योति पाटिल कहती हैं, ‘‘हम चार लोग हैं। मैं चार घरों में काम करती हूं। अप्रैल का पैसा देने को लेकर मुझे कोई आश्वासन नहीं मिला है। चारों ने कहा कि जब वे फोन करें, तभी काम पर लौटना है।’’ विधवा महिला कमला दो घरों में काम कर 4 हजार रुपए कमाती थी। वह कहती हैं, ‘‘मुझे मई में भी आने से मना कर दिया गया है।’’ 7 लोगों के परिवार संभालने वाली आशा सपकाडे 10 घरों से 10 हजार रुपए कमाती थी। वह कहती हैं, ‘‘मुझे दो घरों से मार्च का भी पैसा नहीं मिला है। अभी 8 लोगों ने कह दिया है कि कम से कम मई तक काम नहीं कराएंगे। जून महीने का भी संशय है। दो लोगों ने लाॅकडाउन के बाद काम पर बुलाया है।’’

घरेलू कामगारों के लिए लगातार कानून एवं नीति बनाने के प्रयास जारी है, लेकिन अभी तक एक यूनिवर्सल कानून या नीति नहीं बन पाई है, जिसकी वजह से इन्हें शासन की ओर से किसी अलग योजना का लाभ नहीं मिल पाता, जिस तरीके से बीड़ी मजदूर, निर्माण श्रमिक या ठेका श्रमिक को अलग से योजना का लाभ मिलता है। असंगठित क्षेत्र की एक अलग श्रेणी मानकर इन्हें अन्य योजनाओं (बीपीएल, सामाजिक सुरक्षा पेंशन आदि) के अलावा कोरोना संकट के समय कम से कम चार महीने तक सरकार से आर्थिक मदद मिलनी चाहिए।

प्रार्थना मिश्रा के अनुसार, ‘‘महाराष्ट्र सरकार ने इस दिशा में पहल की है। वहां घरेलू श्रमिकों की जानकारी एक फाॅर्म के माध्यम से मंगवाई जा रही है, जिससे कि उन्हें सरकार की योजनाओं का लाभ कोरोना संकट काल में दिया जा सके। कई कामगारों के पास सरकारी कार्ड है, कई के पास रहवासी समितियों केा कार्ड है और कई के पास संघ या संगठन का कार्ड है। जिनके पास कार्ड नहीं है, उनकी पहचान के लिए जिन घरों में वे काम करती हैं, उनमें से 4-5 घरों से लिखित में प्रमाण लेना चाहिए। इसके अलावा हम लोगों से अपील भी कर रहे हैं कि वे लाॅकडाउन के समय का वेतन न काटे और उन्हें काम से न हटाएं। इसके अलावा घरेलू कामगारों को यदि दैनिक आवश्यकता के समानों की जरूरत है, तो उन्हें आर्थिक मदद करें, लाॅकडाउन के बाद जब घर में वे काम के लिए आएं, तो दस्ताने, मास्क, सैनेटाइजर दें, यदि घर में कोई कोरोना संदिग्ध हो तो उन्हें काम पर न बुलाए, उन्हें बाथरूम इस्तेमाल करने दें और लिफ्ट से आने-जाने दें।’’ (संवाद)