दोनो में सच चाहे जो भी हो, वह बहुत भयावह है और हमारी सरकारों की संवेदनहीनता पर गंभीर टिप्पणी करती है। केन्द्र सरकार तो उनकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है ही, लेकिन राज्य सरकारें भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं। वे मजदूर मध्यप्रदेश के थे, लेकिन वे कहीं के भी हो सकते थे। वह तो एक बानगी है। ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें प्रवासी मजदूरों और उनके बच्चों की दर्दनाक मौत हुई है।
उनपर तरह तरह से अत्याचार हो रहे हैं। सच कहा जाय तो हमारी केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें उन्हें मनुष्य मानने के लिए तैयार ही नहीं है। कोरोना पीड़ितों को बचाने के लिए हमारे देश की सरकारें इतनी व्यग्र हैं कि उन मजदूरों के दर्द को अपना दर्द ही नहीं मानतीं। उन्हें फिक्र बस इस बात की है कि कोरोना से मरने वालों की संख्या को नियंत्रित करें, लेकिन उस नियंत्रण प्रक्रिय से दूसरे लोग जो मर रहे हैं, उनकी कोई परवाह नहीं। जहां तहां मजदूर अपने आक्रोश को व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन उनके आक्रोश को सख्ती से कुचल दिया जा रहा है। ऐसे ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो किसी भी सभ्य समाज को हिला कर रख देने के लिए काफी है, लेकिन हमारा राज्य तंत्र काफी क्रूर हो गया है। एक विडियो में तो एक पुलिस वाला सड़क से अपने घरों की ओर जाने वाली महिलाओं से उठक बैठक करवा रहा है। महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला हमारे समाज का भद्रलोक उस पर मौन है। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौन हैं। कोई यह नहीं कह रहा कि उस विडियो में जो पुलिसवाला है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
मानवता का भारत में खून हो रहा है और हमारा कथित सभ्य समाज कोरोना से अपनी जान बचाने में लगा हुआ है। एक घटना उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर हुई। राजस्थान की तरफ से प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर रहे थे। उन मजदूरों में उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार और झारखंड के मजदूर भी थे। उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपने प्रदेश के लोगों के अलावा अन्य मजदूरों को प्रदेश में घुसने से रोक दिया। और उत्तर प्रदेश का वासी कौन है, इसके लिए उनसे आधार कार्ड दिखाने को कहा। यानी यदि कोई उत्तर प्रदेश का था और उसके पास आधार कार्ड नहीं थे, तो उसे भी प्रदेश में घुसने से रोक दिया गया। उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूर के पास यदि आधार कार्ड भी था, लेकिन उस पर पता राजस्थान का लिखा हुआ था, क्योंकि मजदूरों ने वह कार्ड राजस्थान में ही बनाया था, तो उनको भी प्रदेश में घुसने से रोक दिया।
किस दिशा में जा रहा है देश? देश के किसी भी हिस्से में आने जाने का अधिकार हमारे संविधान ने हमें दे रखा है। क्या कोरोना संकट के इस दौर में वे अधिकार स्थगित हो गए हैं? और यदि कोई बिहार का आदमी राजस्थान से अपने घर जाएगा, तो वह उत्तर प्रदेश से घुसकर ही जाएगा। और यदि से वहां नहीं घुसने दिया जाएगा, तो फिर वह बिहार कैसे जाएगा? राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा पर जब वह हो रहा था, तो राजस्थान की पुलिस ने उस पर एतराज जताया। राजस्थान की पुलिस चाहती थी कि वे प्रवासी मजदूर अपने अपने घरों की ओर जाएं, लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस उसके लिए तैयार नहीं थी। राजस्थान पुलिस ने उत्तर प्रदेश सीमा पर लगे बैरिकेड को जबरन हटाने की कोशिश की और फिर दोनों राज्यों की पुलिस आपस में ही मारपीट करने लगी।
यह शायद आजादी के बाद हमारे देश की पहली घटना थी कि दो राज्यों की पुलिस राज्य की सीमा पर एक दूसरे से भिड़ गई। वह राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा नहीं हो, मानों भारत और पाकिस्तान की सीमा हो, जहां कुछ लोगों को घुसाने के लिए दोनों ओर की सेना एक दूसरे से लड़ रही हों। अंत में उत्तर प्रदेश पुलिस की ही चली और उन लोगों को प्रदेश में नहीं घुसने दिया गया, जिनके पास आधार कार्ड नहीं थे और आधार कार्ड में उत्तर प्रदेश का पता नहीं था।
वह तो हुई उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमा की बात। दिल्ली और हरियाणा की सीमा पर जो हो रहा है, वह तो उससे भी ज्यादा चिंताजनक है। हरियाणा पुलिस दिल्ली से आने वाले लोगों को रोक रही है। कुछ लोगों की उसने पहचान कर रखी है, जिन्हें इजाजत है। लेकिन बाकी सबको हरियाणा से प्रवेश में रोका जा रहा है। सबसे आपत्तिजनक यह है कि यदि कोई हरियाणा का वासी है और उसके पास हरियाणा के वासी होने का पहचान पत्र है, तब भी उसे राज्य में प्रवेश करने से रोका जा रहा है। हरियाणा के लाखों लोग दिल्ली में काम करते हैं। उनमें कई तो पुलिस में ही हैं। लेकिन जब वे दिल्ली के अपने कार्यस्थल से हरियाणा के अपने निवास स्थल पर जाना चाहते हैं, तो उन्हें रोक दिया जाता है और कहा जाता है कि दिल्ली में ही रहो।
यह क्या बात हुई? क्या राज्य सरकारें कोरोना के खिलाफ लड़ाई अलग अलग लड़ रही है? क्या वह अलग अलग लड़ाई लड़कर कोरोना को पराजित कर देगी? इस तरह की सोच ही दुर्भावना युक्त है। कोरोना संकट ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय एकता को भी तार तार कर दिया है। सभी राज्य कोरोना के खिलाफ नहीं लड़ रहे, बल्कि अपने आंकड़े दुरुस्त रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसमें मानवता शर्मसार हो रही है। (संवाद)
कोरोना संकट और प्रवासी मजदूर
सरकारों का क्रूर चेहरा सामने आ रहा है
उपेन्द्र प्रसाद - 2020-05-12 11:15
प्रवासी मजदूरों के साथ कोरोना संकट के दौर में जो व्यवहार किया जा रहा है, वह अत्यंत ही शर्मनाक है। अभी भी जहां तहां वे सड़कों पर चलते दिखाई पड़ रहे हैं और पुलिस का निशाना बन रहे हैं। कुछ दिन पहले ही 16 प्रवासी मजदूर महाराष्ट्र में एक मालगाड़ी से कटकर मर गए। सरकार के अनुसार वे पटरी पर सोए हुए थे और मालगाड़ी काटते हुए उनके ऊपर से गुजर गई। वह दृश्य बेहद ही भयानक था। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने दुखों से आजीज आकर आत्महत्या कर ली, क्योंकि कोई रेल की पटरी पर क्यो सोएगा?