वरिष्ठ केसी (एम) नेता पी जे जोसेफ और जोस के मणि, केसी (एम) के संस्थापक, स्वर्गीय के एम मणि के पुत्र, के नेतृत्व में दो गुटों के बीच विवाद की हड्डी कोट्टायम जिला पंचायत अध्यक्ष पद है। वर्तमान में यह पोस्ट जोस गुट के एक निष्ठावान व्यक्ति के पास है। जोसेफ गुट चाहता है कि वह पद छोड़ दे, लेकिन जोस गुट ने साफ साफ मना कर दिया है।
जोसफ द्वारा जोस द्वारा पेश किए गए समझौता फार्मूले से सहमत होने से इनकार करने के साथ संकट और भी गहरा हो गया है। प्रतिद्वंद्वी गुटों द्वारा अपने-अपने पदों से हटने से इनकार करने से यूडीएफ खेमे में तनाव बढा गया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ओमन चांडी और रमेश चेन्निथला द्वारा किए गए एक पैच-अप का प्रयास अब तक सफलता हासिल करने में विफल रहा है।
कांग्रेस के नेतृत्व की रातों की नींद हराम हो रही है। इसका कारण जोसफ द्वारा उठाए गए कड़े रुख है। केसी (एम) के कार्यवाहक अध्यक्ष जोसेफ ने कांग्रेस ने कांग्रेस को चेतावनी दी है कि यदि जोस अपना स्टैंड बदलने में विफल रहे, तो स्थिति और भी बिगड़ सकती है।
जोसेफ द्वारा लिया गया कड़ा रुख सीपीआई (एम) के राज्य सचिव कोडिएरी बालाकृष्णन द्वारा किए गए प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में के सी (एम) को देखना होगा। कोडिएरी ने कहा था कि यदि कोई भी पार्टी वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) में शामिल होना चाहती है, तो उसका स्वागत है। एकमात्र शर्त यह है कि उसे धर्मनिरपेक्षता की नीति को स्वीकार करना होगा। जोसेफ के कड़े रुख का श्रेय कोडियरी के उस प्रस्ताव को दिया जा रहा है।
के सी (एम) एक बड़े विभाजन की ओर बढ़ता साफ दिख रहा है और कांग्रेस का नेतृत्व इस बात पर विचार कर रहा है कि समस्या को कैसे हल किया जाए।
यह संकट फ्लैश बिंदु तक पहुंचने के लिए तैयार है, क्योंकि जोसेफ गुट वर्तमान में कोट्टायम जिला पंचायत के प्रमुख सेबेस्टियन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने की योजना बना रहा है। गौरतलब हो कि सेबेस्टियन जोश गुट के बफादार हैं। यह प्रस्ताव तभी सफल होगा जब जिला पंचायत में कांग्रेस सदस्य इसका समर्थन करेंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व जोसेफ को उपकृत करेगा? यदि वह अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करता है, तो इससे कांग्रेस का नुकसान होगा और यदि नेतृत्व इसका विरोध करता है, तब भी इससे कांग्रेस का ही नुकसान होगा।
केसी (एम) में विभाजन को यूडीएफ इस समय बर्दाश्त नहीं कर सकता है, इस साल अक्टूबर में स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं। के सी (एम) मध्य केरल में एक शक्ति है। और, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी के कमजोर पड़ने से एलडीएफ से कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ की सत्ता हासिल करने की संभावनाओं पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा। एलडीएफ सरकार का कार्यकाल मई, 2021 में समाप्त होने वाला है।
आने वाले दिन यूडीएफ नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि दोनों में से कोई भी गुट यूडीएफ से अलग हो जाता है, तो यह यूडीएफ के सामंजस्य और स्थिरता के लिए एक झटका हो सकता है। यूडीएफ द्वारा राज्य में सत्ता में वापसी की संभावनाओं का कमजोर होना राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस को झटका होगा, क्योंकि केरल उन कुछ राज्यों में से एक है, जहां कांग्रेस अभी भी एक ताकत है। (संवाद)
केरला कांग्रेस (एम) का बढ़ता संकट
कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
पी श्रीकुमारन - 2020-06-17 09:42
तिरुअनंतपुरमः कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के एक महत्वपूर्ण घटक केरल कांग्रेस (एम) का संकट दोनों गुटों द्वारा परस्पर समझौता करने से इनकार करने के साथ गहरा गया है।