इस संकट के बीच सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार एक स्वर में नहीं बोल रही है। सरकार की ओर से कभी कहा जाता है कि हमारे सैनिकों को धोखे से मारा गया। इसका मतलब यह है कि हमारी सेना को यह अंदाज नहीं था कि उनपर हमला हो सकता है और एकाएक धोखे से हुए हमले में वे मारे गए। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे सैनिक मारते मारते मरे। विदेश मंत्रालय चीन के भारतीय क्षेत्र में धुस आने की बात करता है, तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि चीन ने भारत में एक इंच की घुसपैठ कभी नहीं की और वह अभी भी भारतीय क्षेत्र के एक इंच पर काबिज नहीं है। विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री के बयानों में इस विरोधाभाष को ढकने की कोशिश में प्रधानमंत्री कार्यालय एक ऐसी सफाई दे डालता है, जिससे पूरा प्रकरण ही मजाक बन जाता है।

लेकिन भारत चीन की सीमा पर जो हो रहा है, वह मजाक नहीं है। वहां बना हुआ तनाव कभी भी युद्ध का रूप ले सकता है। फिलहाल भारत संयम से काम ले रहा है और अपनी तरफ से कोई भड़काऊ बयान नहीं दे रहा है, जब चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार भारतीय क्षेत्र को भी अपना बता रहा है और भारत से कह रहा है कि वह उस क्षेत्र को खाली कर दे, जबकि सच्चाई यह है कि चीन भारतीय क्षेत्र में घुसकर अपना अस्थाई पोस्ट बना चुका था। उसे हटाने के क्रम में ही यह हिंसा हुई। अब चीन ने दुबारा वहां पोस्ट बना लिया है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना सही है कि चीन ने किसी भारतीय पोस्ट पर कब्जा नहीं किया है, लेकिन वे यह बात छिपा रहे हैं कि चीन ने भारतीय सीमा में घुसकर अपना पोस्ट बना लिया था।

वैसे भारत और चीन के बीच पूरे हिमालय क्षेत्र में सीमा विवाद है, लेकिन ताजा हिंसक वारदात लद्दाख की गलवान घाटी में हुई। गलवान घाटी गलवान नदी के आसपास के हिस्से को कहते हैं। यह भारत का हिस्सा है, क्योंकि गलवान नाम ही एक भारतीय गुलाम रसूल गलवान के नाम पर है। यह नाम ब्रिटिश प्रशासन ने रखा था, क्योंकि इस घाटी और नदी की खोज सबसे पहले भारतीय रसूल गलवान ने की थी। चीन भी इस घाटी को इसी नाम से जानता है। यदि यह घाटी चीन या तिब्बत का हिस्सा होती, तो इसका कोई तिब्बती या चीनी नाम होता, लेकिन उन्हें तो इसके बारे में उस समय पता भी नहीं था, जब गलवान ने इसकी खोज की थी।

गलवान घाटी का करीब 70 फीसदी हिस्सा 1962 के युद्ध में चीन के कब्जे में चला गया। 30 फीसदी हिस्सा भारत के नियंत्रण में ही उसके बाद भी रहा है। पर चीन अब पूरा पर दावा कर रहा है और चाहता है कि भारतीय सेना उसे खाली कर दे। कायदे से भारत को कहना चाहिए था कि पूरी गलवान घाटी निर्विवाद रूप से उसी की है, क्योंकि उसका नाम ही उसके इस दावे को प्रमाणित कर देता हैं, लेकिन भारत इस मसले पर आक्रामक नहीं, बल्कि रक्षात्मक रवैया अपना रहा है। अब कहा नहीं जा सकता कि यह रक्षात्मक रवैया भारत की कमजोरी है या उसकी किसी रणनीति का हिस्सा है।

गलवान घाटी के अलावा लद्दाख के पैंगोंग झील के इलाके में भी चीन बार बार भारत में घुस आता है। पहले फिंगर 8 भारत और चीन के बीच नियंत्रण रेखा का काम करता था। वहां से 8 किलोमीटर भारत के क्षेत्र में फिंगर 4 पर चीन ने अपना सैनिक पोस्ट बना लिया है और भारत को समझ नहीं आ रहा है कि इस समस्या का सामना कैसे किया जाय।

चीन अपनी ताकत का इस्तेमाल कर मनमानी कर रहा है। जाहिर है, भारत अपनी ताकत का इस्तेमाल कर ही उसका जवाब दे सकता है। लेकिन यदि दोनों तरफ से ताकत का इस्तेमाल होता रहा, तो इसकी परिणति में होगी और भारत फिलहाल युद्ध नहीं चाहता, क्योंकि एक तो वह कोरोना संकट से जूझ रहा है और दूसरे चीन से उसके कुछ ऐसे आर्थिक व्यापारिक रिश्ते बन गए हैं कि उन रिश्तों के बिगड़ने से देश का नुकसान भी हो सकता है।

सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई चीन एकाएक आक्रामक हो गया है? तो इसके दो कारण हो सकते हैं। एक कारण, तो कोरोना बीमारी के लिए उसपर दुनिया की ओर से जो दबाव बन रहा है, उससे मुक्त होने के लिए भारत सीमा पर तनाव पैदा कर दुनिया के ध्यान को भटकाना चाहता है। यह तात्कालिक कारण हो सकता है। दूसरा कारण यह है कि नियंत्रण रेखा के इर्द गिर्द भारत बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। वहां सड़कें बनाई जा रही हैं और पुल भी बनाए जा रहे हैं और चीन को यह नागवार गुजर रहा है, जबकि अपने क्षेत्र में उसने यह सब काम पहले ही कर रखा है।

मोदी सरकार ने सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण की गति तेज कर दी। यह अच्छा है, लेकिन उसने चीन से होने वाली संभावित प्रतिक्रिया का सही आकलन नहीं किया। यहीं मोदी सरकार ने गलती कर दी। चीनी प्रतिक्रिया के जवाब में भारत को क्या करना चाहिए, इसके बारे में पहले से कोई योजना नहीं बनाई गई। इस तरह की गलती मोदीजी बार बार करते हैं। यही गलती नोटबंदी और लॉकडाउन की घोषणा करते समय की गई और यही सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण के निर्णय के समय की गई। (संवाद)