लेकिन मोदी और शाह की जोड़ी का इस बात का अहसास है कि मोदी का जादू लोकसभा के चुनाव में काम कर रहा है, राज्यांं के विधानसभाओे के चुनावों में नहीं। पिछले दो- तीन सालों के दौरान जिन जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं, वहां मोदी द्वारा भीषण प्रचार के बावजूद भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के बाद उसकी सरकारें तो चली ही गई थीं, गुजरात में भी पार्टी की जीत बहुत मामूली थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी को जबर्दस्त सफलता मिली और उसमें मोदी का जादू मतदाताओं पर खूब चला था।

लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भी नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी को जिता नहीं सके। महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली में तो उनकी पार्टी की सरकार चली ही गई और हरियाणा में बहुत मुश्किल से गठबंधन की सरकार का नेतृत्व भाजपा को करना पड़ा। इन सारी परिस्थितियों के विश्लेषण और अध्ययन के बाद खुद नरेन्द्र मोदी ने यह फैसला किया होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को अकेले उतरना ठीक नहीं होगा और नीतीश के नेतृत्व में ही वहां चुनाव लड़ने में समझदारी है।

नेतृत्व की समस्या हल होने के बाद अब एनडीए के घटकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीटों के बंटवारे की है। वहां सीटों के बंटवारे में नीतीश का पलड़ा हमेशा भारी रहा है। 2015 के चुनाव में भाजपा और जदयू अलग अलग थे, लेकिन 2010 का चुनाव दोनों ने साथ मिलकर लड़ा था। तब 243 सीटों में 141 सीटों पर जदयू के उम्मीदवार थे, जबकि 102 सीटों पर भाजपा के। लेकिन वह 10 साल पुरानी बात है। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदेश की कुल 40 सीटों में से 17-17 सीटों पर दोनों के उम्मीदवार थे और शेष 6 सीटों पर रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार थे।

अब असली समस्या गठबंधन के फॉर्मूले का इजाद करने की है। वह फॉर्मूला तभी फॉर्मूला माना जाएगा, जब तीनों पक्ष उसे स्वीकार करे। भारतीय जनता पार्टी और लोकजनशक्ति पार्टी लोकसभा के फॉर्मूले के आधार पर सीटों का बंटवारा चाहती हैं, लेकिन इसके लिए नीतीश हरगिज तैयार नहीं होंगे, क्योंकि उस फॉर्मूले को स्वीकार करने का मतलब है चुनाव के बाद अपने मुख्यमंत्री पद को खतरे में डाल देना। यदि लोकसभा वाला फॉर्मूला अपनाया गया, तो 42 सीटों पर लोजपा के उम्मीदवार होंगे, जबकि जदयू के 101 और भाजपा के 100। यदि चुनाव के बाद भाजपा के ज्यादा उम्मीदवार जीतकर विधायक बन गए, तो वह अपनी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनाने का दावा पेश कर सकती है और लोजपा को भी उसके दावे का समर्थन होगा। और यदि नीतीश कुमार ने भाजपा के दावे को मानने से इनकार किया, तो भाजपा तोड़फोड़ कर भी अपनी पार्टी की सरकार बना सकती है। कम संख्या में विधायक लाने के बाद भी भाजपा अनेक राज्यों में इस तरह के तोड़ फोड़ से सरकारें बनाती रही हैं और चुनाव के पहले किए गए वायदे को भी मानने से इनका करती रही है। यह नीतीश कुमार को पता है। वे महाराष्ट्र में देख चुके हैं कि विधानसभा चुनाव के पहले अमित शाह ने वायदा किया था कि चुनाव जीतने के बाद भाजपा और शिवसेना के मुख्यमंत्री ढाई ढाई साल के लिए होंगे, लेकिन चुनावी नतीजे निकलने के बाद उसने अपने चुनाव पूर्व वायदे को निभाने से साफ इनकार कर दिया और कह दिया कि उनकी पार्टी के पास ज्यादा सीटें हैं, इसलिए मुख्यमंत्री भी उसी का होगा और पूरे पांच साल के लिए होगा।

अब यदि बिहार में भी ज्यादा सीटें लाकर उसी तरह पलट जाती है, तो फिर नीतीश कुमार की स्थिति बेहद कमजोर हो जाएगी। यही कारण है कि नीतीश कुमार ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहेंगे। वह ऐसा चाह भी रहे हैं और इसके कारण सीट के फॉर्मूले को लेकर गतिरोध बना हुआ है। भारतीय जनता पार्टी नीतीश पर दबाव बनाने के लिए रामविलास पासवान का इस्तेमाल कर रही है। पासवान का पुत्र धमकी दे रहे हैं कि उनकी पार्टी को यदि 40 या 42 सीटें नहीं मिलीं, तो वह अकेले चुनाव लड़ेंगे। जहां तक नीतीश कुमार की बात है, तो यह उनको सूट करेगा कि पासवान अकेले चुनाव लड़ लें और 2010 के फॉर्मूले के आधार पर जदयू और भाजपा का गठबंधन हो जाए, क्योंकि नीतीश को पता है कि रामविलास पासवान का प्रदेश में कहीं जनाधार नहीं है। उनकी जाति की आबादी प्रदेश की कुल आबादी का 5 फीसदी है और उसके 30 से 40 फीसदी लोग उन्हें सपोर्ट करते हैं। यानी यदि पासवान अकेले चुनाव लड़े तो उनका कोई उम्मीदवार नहीं जीतेगा और अधिकांश उम्मीदवारों की जमानतें तक जब्त हो जाएंगी।

पर भारतीय जनता पार्टी किसी भी तरह रामविलास पासवान की पार्टी को एनडीए मे रोकना चाहेगी और खुद रामविलास भी ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर गठबंधन में ही रहना पसंद करेंगे। इसलिए एनडीए में बिखराव की संभावना नही ंके बराबर है। भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकती और रामविलास पासवान वहीं करेंगे, जो भाजपा उनको करने के लिए कहेगी, क्योंकि एनडीए से पासवान के बाहर होने का मतलब है केन्द्र की सरकार से उनका बाहर जाना और केन्द्र की सरकार से बाहर जाने की वे सोच भी नहीं सकते। (संवाद)