राजस्व के लिए तेल उत्पादों पर अतिशय निर्भरता ने केन्द्र सरकार की नजर में इन उत्पादों को दुधारू गाय बना दिया है। जब सरकार की इच्छा होती है इन उत्पादों पर टैक्स बढ़ा दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों ने सरकार को बार बार तेल उत्पादों खासकर डिजल और पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाने का मौका दिया है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो तेल कंपनियां अपने उत्पादों को महंगा कर देती है। जब कच्चा तेल सस्ता हो जाता है तो केन्द्र सरकार (और राज्य सरकारें भी) टैक्स बढ़ा देती हैं और कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं को राहत मिलनी चाहिए, वह सरकार के खजाने में चली जाती है। और इधर डीजल पर टैक्स इतना बढ़ा दिया गया है कि दिल्ली में ज्ञात इतिहास में पहली बार डीजल पेट्रोल से महंगा हो गया है।

केन्द्र सरकार पेट्रोल पर टैक्स लगाने के विचित्र तर्क देती है। एक बार गडकरी ने कहा कि यदि उन पर टैक्स नहीं लगाया गया, तो फिर देश में रोड कैसे बनेगा। अब सरकार के लोग कह रहे हैं कि सरकार तेल को महंगा करके ही तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को वित्त पोषित कर रही है। कभी कहा जाता है कि सस्ते इंटरनेट पैक के लिए तेल का महंगा होना जरूरी है। एक मंत्री ने तो कुछ दिन पहले ही कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स लगाकर महंगा करने से गरीबों को नुकसान नहीं होता, बल्कि जो संपन्न व्यक्ति हैं, वे ही इससे प्रभावित होते है।

मंत्री के इस बयान में तनिक भी सच्चाई नहीं, क्योंकि तेल की कमतें बढ़ने से देश में सभी वस्तुओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है, क्योंकि उत्पादन प्रक्रिया में तेल इनपुट की तरह इस्तेमाल होता है। इसके कारण माल की ढुलाई बढ़ जाती है और सारे माल महंगे होने लगते हैं। आज जब कोरोना के कारण लोगों की क्रयशक्ति बहुत कम हो गई है, तो वस्तुओं को महंगा कर उनकी क्रयशक्ति को कम करने में कहां की समझदारी है। इससे अंततः गरीब पर ही सबसे ज्यादा मार पड़ती है।गरीबों और अन्य लोगों की क्रयशक्ति कम होने से बाजार में प्रभावी मांग में गिरावट आती है। मांग गिरने से सप्लाई को रोककर रखना पड़ता है और सकल उत्पादन भी घट जाता है। उत्पादन घटने का मतलब रोजगार का सिकुड़ना होता है। और आज तब चुनौती रोजगार बढ़ाने की है, तो फिर रोजगार विरोधी इस नीति को अपनाना देश को महंगा ही साबित हो रहा है।

दरअसल केन्द्र सरकार को डीजल और पेट्रोल से अधिक राजस्व प्राप्त करने की लत लग गई है। लेकिन कोविड संकट के बीच लॉकडाउन के कारण गाड़ियां बहुत कम चल रही थीं। अभी भी कम ही चल रही हैं। इसके कारण पेट्रोल और डिजल की खपत घटी। खपट घटने का मतलब बिक्री घटना भी होता है और जब बिक्री घटेगी, तो सरकार का राजस्च भी घट जाएगा और उसकी क्षतिपूर्ति के लिए ही केन्द्र सरकार ने लॉकडाउन के दौरान डीजल और पेट्रोल पर लगने वाले टैक्स की दरों में भारी इजाफा कर दिया, हालांकि पहले लगे टैक्स भी बहुत ज्यादा था।

पेट्रोल और डिजल पर टैक्स जीएसटी की विफलता के कारण भी बढ़ाया जा रहा है। सरकार ने जो जीएसटी की व्यवस्था तैयार की है, उससे अपेक्षित राजस्व हासिल नहीं हो रहे हैं। वह व्यवस्था ही दोषपूर्ण है और कर दाताओं के लिए दुःस्वप्न अभी भी बना हुआ। जीएसटी की विफलता के कारण भी केन्द्र सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए डीजल और पेट्रोल पर निर्भर हो गई है। एक आकलन के अनुसार डीजल और पेट्रोल के बेस प्राइस पर 200 फीसदी से भी ज्यादा टैक्स लग रहे हैं। इसे जीएसटी से बाहर रखा ही इसीलिए गया है, ताकि मनमाना टैक्स लगाते रहें, क्योंकि जीएसटी का जो ऊपरी स्लैब है, उससे भी 8 गुना ज्यादा टैक्स पेट्रोल और डीजल पर लगाए जा रहे हैं।

आज दुनिया में भारत डीजल और पेट्रोल पर सबसे ज्यादा टैक्स लगाने वाला देश हो गया है। चूंकि इनकी कीमतें बाजार के पूरे मूल्य स्तर को प्रभावित करती है और उत्पादन की लागत को बढ़ा देती है, इसलिए यह न सिर्फ महंगाई बढ़ाने का काम कर रहा है, बल्कि देश को चीन जैसे देशों के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में कमजोर कर दिया है। चीन ही नहीं, बांग्लादेश भी आज अनेक क्षेत्रों में पछाड़ रहा है, तो उसका कारण है भारत के महंगे तेल उत्पाद, जो सब कुछ महंगा कर देते हैं।

एक समय था, जब बजट घाटा पूरा करने के लिए सरकार रूपया छाप देती थी। लेकिन इस प्रवृत्ति पर अब रोक लगी हुई है, क्योंकि इसके कारण मुद्रास्फीति बढ़ जाती है। लेकिन भारत को कम उत्पादन लागत वाली अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सरकार को तेल उत्पादों के टैक्स पर से निर्भरता हटानी होगी। इसे जीएसटी में लाने की मांग भी तेज हो रही और उसे लाया भी जाना चाहिए। लेकिन सवाल उठता है कि सरकार राजस्व में होने वाली क्षति को पूरा कैसे करेगी? तो इसका जवाब यही हो सकता है कि सरकार सुपर रिच टैक्स लगाए और वहां से राजस्व उगाहे, जहां टैक्स की चोट सबसे कम होती है। (संवाद)