शुक्रवार, 24 नवम्बर 2006
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दाव-पेंच
चुनाव संभवतः अप्रैल में होंगे
ज्ञान पाठक
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक पैंतरेबाजी दर्शनीय है, हालांकि अभी यह ठीक-ठीक मालूम नहीं कि विधान सभा के चुनाव कब होंगे। स्वयं समाजवादी पार्टी नेता और राज्य के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव ने चुनाव आयोग से मांग की थी कि चुनाव फरवरी-मार्च में करा लिए जायें। अन्य राजनीतिक पार्टियों की मांग है कि चुनाव अप्रैल महीने में कराये जायें। वैसे इस विधान सभा का कार्यकाल 14 मई को समाप्त हो रहा है जिसके पहले चुनाव हर हाल में करा लेने होंगे।
अभी चुनाव आयोग गंभीर स्थितियों में फंसा हुआ है। उसके समक्ष मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने से लेकर स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव कराना आज की परिस्थितियों में जटिल हो गया है। अभी मतदाताओं की संशोधित सूची तैयार नहीं है जिसके जनवरी माह के पहले सप्ताह तक तैयार होने की उम्मीद है, जैसा कि चुनाव आयोग ने कहा है। मतदाता सूचियों में पहली बार नाम डलवाने के लिए 50 लाख आवेदन अभी आये हैं तथा 10 लाख आपत्तियां भी चुनाव आयोग के सामने पेश की गयी है। लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने कहा है कि कानून और व्यवस्था की वर्तमान बदतर स्थिति में राज्य में स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं है और इसलिए उन्होंने केन्द्रीय सुरक्षा बलों की देखरेख में चुनाव कराने की मांग की है। उनका आरोप है कि हाल में ही राज्य में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में सत्तारुढ़ राजनीतिक पार्टी सपा ने भारी धांधली की और सरकारी मशीनरी का व्यापक दुरुपयोग किया। फिर भी यदि उसके चुनाव परिणाम कुछ संकेत देते हैं तो सिर्फ यह कि मुलायम सिंह को अपनी सरकार बचाने के लिए इस बाड़ एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय सत्ता की प्रबल दावेदार मायावती की बहुजन समाज पार्टी है। राज्य की जनता के समक्ष मुलायम सिंह और मायावती में ही एक का चुनाव करना है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अभी तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। हरित प्रदेश की राजनीति करने वाले अजित सिंह की पार्टी एस क्षेत्र विशेष में सिमटी हुई है।
उत्तर प्रदेश की जनता के सामने इस तरह जो विकल्प हैं उनमें मुलायम सिंह और मायावती ही हैं जो स्वयं अपने बल-बूते या अन्य राजनीतिक पार्टियों के सहयोग से सराकर बना सकते हैं। इसलिए इस समय सवाल इस बात का नहीं है कि राज्य की जनता कोई स्वच्छ छवि वाले नेता को कैसे चुने क्योंकि मुख्य मंत्री पद के इन दोनों दावेदारों की छवि बहुत खराब है। दोनों पर भ्रष्टाचार करने और अपने वैध स्रोतों से ज्यादा धन रखने के मुकदमें चल रहे हैं और दोनों राजनीतिक पार्टियों पर घोर जातिवादी होने के आरोप लगते रहे हैं, और दोनों के साथ अपराधकर्मियों की भारी संख्या है। आम जन इसमें पिस रहे हैं, इसलिए उन्हें तो सिर्फ यह देखना है कि दोनों में कौन उनके लिए अपेक्षाकृत बेहतर है। स्वाभाविक तौर पर मतदादाओं के स्तर पर इन पार्टियों की निकटता ही सिद्धांतों के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
उत्तर प्रदेश में आज विकास की बात कोई नहीं करता क्योंकि यह राजनीतिक तौर पर भावनात्मक लाभ नहीं देता। इसलिए पूरा ध्यान इस बात पर लगाया जा रहा है कि चुनाव मुलायम सिंह की सरकार के तहत हों या केन्द्रीय शासन में। आरोप है कि राज्य में कानून और व्यवस्था इतनी खराब है कि मुलायम सिंह की सरकार में चुनावी धाधली होनी ही है।
अब मुलायम सिंह की सरकार को समर्थन देने वाली कांग्रेस भी रास्ते ढूंढ़ रही है। वह मुलायम सिंह सरकार को अपदस्त करने का इरादा रखती है लेकिन शहीद हो जाने का लाभ उन्हें मिल जाने के डर से वैसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। वह राज्य में विकास नहीं होने और कानून व्यवस्था जर्जर होने को मुद्दा बनाने की कोशिश में है। स्वयं राहुल गांधी और सोनिया गांधी इन मामलों में मुलायम सरकार की सार्वजनिक आलोचना कर चुके हैं और अब पासा राज्यपाल टी वी राजेश्वर की ओर फेंक दिया गया है।
राज्यपाल ने भी राजनीतिक बयान दे दिया और इसके लिए उन्होंने पुलिस सप्ताह समारोह का इस्तेमाल अपनी बात सार्वजनिक करने के लिए किया। उन्होंने राज्य में सुधरती कानून व्यवस्था के मुलायम सिंह के दावों को झुठलाते हुए कहा कि हाल मे स्थानीय निकायों के चुनावों में पुलिस प्रशासन ने पक्षपातपूर्ण ढंग से काम किया। उन्होंने पुलिस बल को सचेत किया कि आने वाले विधान सभा चुनावों के दौरान ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि उनको पिछले चुनाव के दौरान लगभग 1000 शिकायतें मिलीं थीं जिन्हें कार्रवाई के लिए अधिकारियों के पास भेज दिया गया था, और जिनपर कार्रवाई रपट अब तक उन्हें नहीं भेजी गयी है। उन्होंने यह भी कहा कि 8,40,000 आग्नेयास्त्रों के लाइसेंस राज्य में दिये गये हैं जिनमें 360 कार्बाईन के लाइसेंस हैं। चौदह सांसद और 81 विधायक भी कार्बाईन हासिल करने वालों में हैं। ढाई हजार लोगों को सुरक्षा गार्ड दिये गये हैं। अपहरण आम हो गया है जिसका केन्द्र बुलंदशहर, एटा और गाजियाबाद जिले हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में अपहरण उद्योग 200 करोड़ रुपये का है।
स्थित वास्तव में खराब है और कहा जा सकता है कि राज्य संवैधानिक दायित्वों के निर्वाह में विफल है। लेकिन क्या चुनाव के पहले मुलायम सिंह की सरकार को हटा दिया जायेगा? कहा नहीं जा सकता। सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि इस आधार पर यदि मुलायम सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी गयी तो दिल्ली की कांग्रेस सरकार और मुंबई की सरकार को भी बर्खास्त करना होगा जहां अपराध के स्तर उत्तर प्रदेश से ज्यादा हैं।
यही कारण है कि मुलायम सिंह ने राज्यपाल और केन्द्र को चेतावनी दे डाली। उन्होंने कहा कि तीनों स्थानों में अपराध का तुलनात्मक अध्ययन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के नेतृत्व में कराया जाये। उन्होंने राज्यपाल को अपनी संवैधानिक सीमा में रहने और राजनीति न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को यह जानना चाहिए कि कार्बाईन रखने की इजाजत केन्द्र देता है, और इसके लिए राज्य की आलोचना नहीं की जानी चाहिए।
कुल मिलाकर बदतर कानून और व्यवस्था सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरता दिख रहा है। यदि ऐसा हुआ तो मुलायम सिंह के मुकाबले मायावती फायदे में रहेंगी क्योंकि उनकी छवि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने की है। यह अलग बात है कि उनके खेमें में संरक्षित अपराधियों की भी कोई कमी नहीं है।
मुलायम सिंह ने अपनी सरकार की कमजोरियों को छिपाने के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं शुरु की हैं जिनमें बेरोजगारी भत्ता देना और लड़कियों तथा बृद्धों के लिए आर्थिक सहायता का प्रबंध करना भी शामिल है। जातिवादी और धर्मवादी राजनीति में उनका जनाधार यादवों, पिछड़ों और मुसलमानों में बरकरार दिखता है।
लेकिन मायावती भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने अपने दलित जनाधार में ब्रह्मणों को जोड़ा है तथा रणनीतिगत मुस्लिम मत तो उनके हैं ही। भाजपा और कांग्रेस का पुनरुज्जीवित होने के संकेत अबतक नहीं हैं। महज थोड़ी बढ़ोतरी की ही वे उम्मीत कर सकती हैं और बाद में शायद सपा या बसपा के साथ जाना उनकी विवशता बन जाये। #
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक ...
System Administrator - 2007-10-20 04:57
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक पैंतरेबाजी दर्शनीय है, हालांकि अभी यह ठीक-ठीक मालूम नहीं कि विधान सभा के चुनाव कब होंगे। स्वयं समाजवादी पार्टी नेता और राज्य के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव ने चुनाव आयोग से मांग की थी कि चुनाव फरवरी-मार्च में करा लिए जायें।