फिर भी तेज प्रताप का आत्मविश्वास देखते बनता है। उनकी समझ की भी दाद देनी पड़ेगी। वे न तो तेजस्वी के खिलाफ एक शब्द अपने मुह से निकालते हैं और न ही अपने पिता लालू यादव के खिलाफ, जबकि वे अपनी लड़ाई उन दोनों के खिलाफ ही लड़ रहे हैं। वे लालू के बड़े बेटे हैं और राजशाही के जमाने में बड़ा बेटा ही अपने पिता की गद्दी का हकदार होता था। पर अब भारत मे राजशाही नहीं है। यहां लोकशाही है, पर लोकशाही में भी राजशाही के गुण आ ही गए हैं। क्षेत्रीय व जाति- संप्रदाय आधारित दलों में उत्तराधिकार परिवार में से ही किसी को सुरक्षित हो गया है।
राष्ट्रीय स्तर की कांग्रेस पार्टी में भी यही रोग है। पंजाब के अकाली दल में सुखवीर सिंह बादल अपने पिता का स्थान प्राप्त कर चुके हैं। जम्मू और कश्मीर में महबूबा मुफ्ती अपने पिता की उत्तराधिकारी बनीं। वहीं के उमर अब्दुल्ला अपने दादा शेख अब्दुल्ला और पिता फारुक अब्दुल्ला के बाद पार्टी पर काबिज हैं। उत्तर प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र उड़ीसा और अन्य किसी भी प्रदेश में जहां मजबूत क्षेत्रीय दल हैं, वहां पार्टी का उत्तराधिकार परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी का जाता है।
इसलिए राजद में भी उत्तराधिकार परिवार की अगली पीढ़ी को जा रहा है। लालू यादव ने युवराज के रूप में अपने छोटे बेटे तेजस्वी को नामित कर दिया। बड़े बेटे को खुश करने के लिए कह दिया कि तेजस्वी अर्जुन है, तो तुम कृष्ण हो और तुम्हारा काम अर्जुन की रक्षा करना है। इस तरह बड़े बेटे को उन्होंने छोटे बेटे का वर्चस्व मानने के लिए मना लिया और बड़े बेटे ने मान भी लिया। वह खुश था कि कृष्ण है, लेकिन उसने देखा कि पांडवों के खेमे में उसका वह सम्मान नहीं है, जो कृष्ण का हुआ था। अर्जुन कृष्ण के भक्त थे और उनका कहा मानते थे, लेकिन तेज प्रताप की बात उनके अर्जुन यानी तेजस्वी नहीं मानते थे। और असंतोष की शुरुआत यहीं से हुई।
लोकतंत्र में भी राजनीति बहुत क्रूर होती है। तेज प्रताप इसी क्रूरता के शिकार हो गए। वे पार्टी में लगातार हाशिए की ओर धकेले जाने लगे और पार्टी के केन्द्र में बने रहने के लिए वे व्याकुल प्रयास करने लगे। इसी प्रयास का परिणाम है छात्र जनशक्ति परिषद का गठन। इसके द्वारा उन्होंने अपने भाई और पिता को संदेश दे दिया है कि वे आसानी से हार मानन वाले नहीं हैं। राजद का अपना छात्र संगठन है। वे उसके पार्टी प्रभारी हैं। पता नहीं हैं भी या नहीं, क्योंकि राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह का कहना है कि तेज प्रताप पार्टी के किसी पद पर नहीं है। फिर भी उन्होंने किसी आकाश यादव को छात्र राजद का अध्यक्ष बना रखा था। उस पर किसी ने एतराज नहीं किया। लेकिन आकाश यादव ने जब एक होर्डिंग में तेजस्वी की तस्वीर नहीं डाली तो हंगामा खड़ा हो गया, क्योंकि उसमें तेज प्रताप की तस्वीर थी। वह होर्डिंग पार्टी के मुख्यालय में लगाया गया था। उसे तेज प्रताप की महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखा गया।
प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह तेजस्वी और तेज प्रताप के शीतयुद्ध के बीच में आ गए। चूंकि वे तेजस्वी के पक्ष में हैं, इसलिए तेज के हमले का शिकार हो गए। उन्होंने भी तेज पर हमला करते हुए किसी गगन यादव को राजद छात्र विंग का अध्यक्ष बना दिया और तेज प्रताप को उनकी जगह बताते हुए कह दिया कि वे पार्टी में कुछ नहीं हैं और जिस आकाश यादव को वे छात्र राजद का अध्यक्ष मानते हैं, वे कभी उस पद पर थे ही नहीं, क्योंकि प्रदेश अघ्यक्ष ने उन्हें अध्यक्ष बनाते हुए कोई अधिसूचना ही जारी नहीं की थी। फिर तेज ने अपने पिता से जगदानंद के खिलाफ ही कार्रवाई करने की मांग कर दी और धमकी भी दे दी कि यदि जगदानंद के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, तो वे पार्टी की किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। यह धमकी तेजस्वी और उनके खेमे को अच्छी लगी होगी, क्योंकि वे चाहते ही यही हैं कि तेज खुद पार्टी से बाहर चले जाएं और मथुरा- बृंदावन जाकर कृष्णभक्ति में लीन हो जाएं।
तेज प्रताप कृष्ण के भक्त हैं या नहीं, इसपर सवाल किए जा सकते हैं, लेकिन उनके पूरी तरह से राजनीतिज्ञ होने पर सवाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी राजनैतिक गतिविधि चलाने के लिए एक मंच तैयार कर लिया है और उसका नाम रख दिया है छात्र जनशक्ति परिषद। सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे इसे राजद का ही हिस्सा मानते हैं और इसका घोषित उद्देश्य राजद को मजबूत करना है। प्रकटतः वे अभी भी तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की कसमें खाते हैं, हालांकि वे जो राजनीति कर रहे हैं, उससे अंततः तेजस्वी का ही नुकसान होना है। जब राजद की दो छात्र ईकाई हो गई है। एक तो वह ईकाई है, जिसका गठन जगदानंद सिंह करते हैं और दूसरी ईकाई की घोषणा तेज प्रताप ने कर दी है, जिसके सर्वेसर्वा वे ही हैं।
लेकिन इसके गठन से टकराव के आसार बढ़ गए हैं। जगदानंद सिंह की समस्या और भी बढ़ सकती है। पार्टी के ऑफिस का इस्तेमाल तेज प्रताप अपनी राजनैतिक गतिविधियों के लिए करते हैं और यदि नव गठित परिषद की गतिविधियां भी उसी दफ्तर से चलाई और उसके पोस्टर- बैनर वहां डाले, तो फिर दफ्तर में तनाव पैदा हो सकता है और तेज प्रताप अपनी वाणियों से वृद्ध जगदानंद सिंह को और भी घायल कर सकते हैं। तेज और तेजस्वी के इस झगड़े का जगदानंद सिंह नाहक शिकार होते रहेंगे।(संवाद)
लालू के बेटों में घमसान
तेज प्रताप ने बनाया समानांतर छात्र संगठन
उपेन्द्र प्रसाद - 2021-09-07 09:41
लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप ने छात्र जनशक्ति परिषद के नाम से एक अलग संगठन का गठन कर लिया है और इसके साथ ही राजद अध्यक्ष के दोनों बेटों के बीच चल रहा शीतयुद्ध एक नये दौर में पहुंच गया है। कहने की जरूरत नहीं कि इस युद्ध में छोटे भाई तेजस्वी अपने बड़े भाई पर बहुत ज्यादा भारी पड़ रहे हैं, क्योंकि पिता लालू ने अपना पूरा वजन उनके साथ कर रखा है। यही कारण है कि तेज प्रताप एक हारती हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसमें उनकी जीत की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है।