जैसी कि आशंका थी, भारतीय जनता पार्टी इसका विरोध कर रही है। इस फैसले का विरोध किया ही जाना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी द्वारा ही क्या, सभी के द्वारा इसका विरोध किया जाना चाहिए। मुस्लिम संगठनों को भी इसका विरोध करना चाहिए, क्योंकि इसके कारण तो प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता का जो दौर शुरू होगा, उससे मुसलमानों को ही नुकसान होगा। गौरतलब हो कि भारतीय जनता पार्टी इसका सीधा सीधा विरोध नहीं कर रही है, बल्कि वह कह रही है कि हिन्दुओं को हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए विधानसभा भवन में ही 5 कक्ष उपलब्ध कराए जाएं।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन यहां धर्मो, संप्रदायों और पंथों की बहुलता है। धर्मनिरपेक्ष भारत सर्व धर्म समभाव में विश्वास करता है। इसका मतलब है कि राज्य सभी धर्मों को एक ही दृष्टि से देखेगा। वह किसी के साथ न तो विशिष्ट व्यवहार करेगा और न ही किसी के साथ सौतेला व्यवहार करेगा। लेकिन यहां एक संप्रदाय विशेष को कक्ष दे दिया गया है, तो सर्व धर्म समभाव का हवाला देते हुए अन्य संप्रदायों और पंथों के लोग भी अपने लिए अलग अलग कक्ष की मांग करेंगे।

भारत में तो विविधता है ही, खुद झारखंड में भी अनेक धर्मों और संप्रदायों के लोग हैं। वहां हिन्दुओं की संख्या सबसे ज्यादा है। उसके बाद दूसरे स्थान पर मुस्लिम हैं। ईसाइयों की भी अच्छी संख्या है। सिख भी हैं और कुछ लोग नवबौद्ध होने का दावा भी करते हैं। जैनियों का सबसे बर्ड़ा तीर्थ स्थल सम्मेद शिखर भी पारसनाथ, झारखंड में ही है। आदिवासियों के बीच सरना धर्म को मानने वाले लोग हैं, जो अपने को हिन्दुओं से अलग बताते हैं।

विधायकों और विधानसभा के कर्मचारियों में भी अनेक धर्मां और संप्रदायों के लोग कम या ज्यादा संख्या में होंगे। अब यदि सभी लोग विधानसभा भवन में अपने लिए अलग अलग कक्ष की मांग करने लगें, तो क्या सबको संतुष्ट किया जा सकता है? इसका सकारात्मक जवाब नहीं हो सकता। यह असंभव है। हिन्दुओं मे ही अनेक पंथों के लोग हैं। भाजपा नेता हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए पांच कक्ष की मांग कर रहे हैं, तो कोई गीता पाठ करने के लिए दो अतिरिक्त कमरों की मांग कर सकता है। हिन्दुओं में शक्ति के उपासक भी हैं। वे शक्ति की उपासना करने के लिए अलग से कमरे की मांग कर सकते हैं।

भारतीय जनता पार्टी द्वारा नमाज के लिए अलग कक्ष की प्यवस्था करने के विधानसभा स्पीकर के फैसले के विरोध के बाद स्पीकर ने एक सर्वदलीय समिति बना दी है, जो इस पर विचार करके अपनी रिपोर्ट देगी। लेकिन सर्वदलीय समिति को दिया गया समय बहुत ज्यादा है और इससे पता चलता है कि मामले को टरकाने के लिए ही समिति का गठन किया गया है। पर मामले को टाल देने से यह समस्या समाप्त नहीं हो जाएगी, क्योंकि इसके राजनैतिककरण की पूरी संभावनाएं इस नमाज कक्ष में मौजूद है।

देश का वातावरण पहले से ही सांप्रदायिक हो चुका है। मंदिर और मस्जिद के चक्कर में बड़े बड़े राजनैतिक मसले मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी मंदिर के मसले को गंभीरता से उठाती है। अभी वह राम मंदिर का निर्माण करवा रही है। बनारस की ज्ञापी मस्जिद का मामला भी अदालत में है और मथुरा में एक ईदगाह को लेकर विवाद चल रहा है। वह भी मामला अदालत में है। हिन्दू पक्ष का दावा है कि जिस जगह ईदगाह है, वहां कृष्ण का एक मंदिर था और वस्तुतः वह जगह कृष्ण का जन्म स्थान है।

राम जन्मभूमि के बाद कृष्ण जन्मभूमि और काशी का विश्वनाथ मंदिर देश की राजनीति की दिशा को पूरी तरह बदल देने की क्षमता रखते हैं। वैसे माहौल में किसी राज्य विधानसभा के एक कक्ष में नमाज के लिए स्थाई जगह देने का निर्णय राजनीति को उसी दिशा मे ले जाने वाला साबित होगा, जिस दिशा में राम जन्मभूमि आंदेलन देश की राजनीति को पहले भी ले जा चुका है।

जब नमाज के लिए कक्ष नहीं आबंटित किया गया था, तब भी विधायक या अन्य मुस्लिम अधिकारी और कर्मचारी नमाज पढ़ते ही होंगे। इसके लिए कोई विशेष जगह की आवश्यकता नहीं होती। वैसे वे मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ना पसंद करते हैं, लेकिन ऐसी कोई विवशता नहीं है कि नमाज मस्जिद में ही पढ़ी जाए और यही कारण है कि मुस्लिम अपने घर में या कहीं भी, जहां वे नमाज के समय में हां, जगह निकालकर वे नमाज पढ़ ही लेते हैं। तो फिर किसी सरकारी भवन के किसी कक्ष विशेष में ही नमाज पढ़ने की जिद उन्हें क्यों करनी चाहिए? इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्हें खुद अपने लिए किसी विशेष और निर्धारित कक्ष लेने से इनकार कर देना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो इसकी प्रतिक्रिया होगी और इससे जो खराब माहौल बनेगा, उससे मुस्लिम समुदाय को ही नुकसान होगा।

इस निर्णय को वापस नहीं लिया गया, तो इसका देश भर में असर होगा। अनेक विधानसभा भवनों और यहां तक कि संसद भवन परिसर में भी धार्मिक आयोजन होने लगेंगे। बड़े बड़े सरकारी भवनों में भी पूजा स्थल बनाए जाने लगेंगे और इससे भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप आहत होगा। कहने की जरूरत नहीं कि झारखंड विधानसभा के स्पीकर का यह फैसला असंवैधानिक तो है ही, अविवेकपूर्ण भी है।(संवाद)