इसके पहले जहां कहीं भी मुख्यमंत्री हटाए गए, उसमें किसी में भी कांगेस के नेतृत्व ने हटाने के लिए सफाई पेश नहीं की और न ही मुख्यमंत्री के खिलाफ अपनी तरफ से कोई माहौल खड़ा किया गया। कांग्रेस के मुख्यमंत्रियो के खिलाफ राज्यों में विक्षुब्ध गुटों का अस्तित्व बराबर रहा करता था और कांग्रेस आलाकमान अपने हिसाब से उनसे निबटती थी और मुख्यमंत्री भी बदला करती थी, लेकिन कभी भी यह नहीं कहा गया कि विक्षुब्धो की संख्या मुख्यमंत्री समर्थको की संख्या से ज्यादा है, इसलिए उन्हें हटाया जा रहा है। कहना क्या, इस तरह को कोई संदेश भी कांग्रेस नेतृत्व नहीं दिया करती थी। मुख्यमंत्री को कहा जाता था इस्तीफा दे दें और मुख्यमंत्री इस्तीफा दे देते थे। अधिकांश मामलों में मुख्यमंत्री को कहीं और एडजस्ट कर दिया जाता था और कुछ मामलों में नहीं भी किया जाता था, लेकिन कैप्टन सिंह के मामले में तो कांग्रेस नेतृत्व ने एक नया इतिहास गढ़ दिया है और वह इतिहास ऐसा है, जिसपर कांग्रेस गर्व नहीं कर सकती।
कैप्टन पर आरोप लगे कि उन्होंने चुनाव घोषणा पत्र में किए गए वायदों को पूरा नहीं किया। यह आरोप सही हो सकते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री को हटाने के लिए इस तरह के आरोपों का किसी पार्टी ने आजतक इस्तेमाल नहीं किया है। यह सच है कि कैप्टन की सरकार बादल परिवार के खिलाफ नर्म रही। जूनियर बादल के साले मजीठिया पर नशीली दवाओं के व्यापार का गंभीर आरोप विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने लगाया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह सिद्धू का कैप्टन के ऊपर सबसे बड़ा आरोप था। आरोप बहुत पहले से लग रहे थे। सवाल उठता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने कैप्टन को आदेश देकर बादल परिवार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए क्यों नहीं कहा? अब जब अगले चुनाव की तिथियां जारी होने के 100 से भी कम दिन रह गए हैं, नया मुख्यमंत्री बादल का क्या बिगाड़ लेंगे।
सारी परिस्थितियां बताती हैं कि कैप्टन को राहुल गांधी ने हटाया और इसमें सिद्धू का इस्तेमाल किया गया। सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के बावजूद उन्हें कैप्टन के खिलाफ लगातार बढ़ावा दिया जाता रहा और ऐसी स्थितियां पैदा कर दी गईं कि कैप्टन को खुद इस्तीफा देना पड़ा। कहते हैं कि कैप्टन के समर्थकों की संख्या उनके विरोधियों से ज्यादा हो गई थी। सवाल उठता है कि जब कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व ही किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री को हटाना चाहे, तो ज्यादातर विधायक या लगभग सभी विधायक केन्द्रीय नेतृत्व की मर्जी के साथ ही खड़े होंगे। कांग्रेस की यही संस्कृति रही है, लेकिन कांग्रेस की यह संस्कृति कभी नहीं रही कि किसी मुख्यमंत्री को हटाने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व उसके खिलाफ साजिश रचे।
बहरहाल, बदलाव हो चुका है। एक दलित चन्नी मुख्यमंत्री बन चुके हैं और चुनाव सिर पर है। क्या यह स्थिति कांग्रेस के अनुकूल है? भाजपा अकाली गठबंधन समाप्त होने और किसान आंदोलन के कारण पंजाब में भाजपा का सफाया हो जाने के बाद कांग्रेस की स्थिति बहुत मजबूत थी और उसकी सरकार बनने की संभावना बहुत ही प्रबल थी, हालांकि आम आदमी पार्टी द्वारा उसे चुनौतियां भी मिल रही थीं, लेकिन अब मुख्यमंत्री बदलने के बाद स्थिति बिल्कुल उलटी हो गई है। कांग्रेस के फिर से चुनकर आने की संभावना बेहद कम हो गई है। 32 फीसदी दलित आबादी वाले प्रदेश में दलित मुख्यमंत्री कांग्रेस के लिए बहुत फायदेमंद नहीं होने वाले हैं, क्योंकि पंजाब में जातीय उन्माद उतनी तीव्र नहीं है, जितनी हिन्दी और अन्य प्रदेशों में हैं। कांशीराम पंजाब के ही थे। उनकी दलित राजनीति उत्तर प्रदेश में तो सफल हुई, लेकिन उनके खुद के पंजाब में कभी सफल नहीं हुई। पिछले विधानसभा चुनाव में कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी को 2 फीसदी मत भी नहीं मिले थे।
कांग्रेस को कैप्टन के अगले निर्णय से भी डरना चाहिए। वह कह चुके हैं कि उनको अपमानित किया गया। एक बार राजीव गांधी ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री को हैदराबाद हवाई अड्डे पर अपमानित किया था, उसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस वहां से साफ हो गई थी और एनटीआर की नवनिर्मित पार्टी सत्ता में आ गई थी। अब पंजाब के कैप्टन सिंह का अपमान हुआ है। इसे वह पंजाब और पंजाबियों का अपमान बताते हुए राजनीति करने लगे, तो सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि कांग्रेस का क्या हाल होगा। उसका दलित कार्ड तो पंजाब में चलने वाला नहीं है, लेकिन अमरीन्दर सिंह का पंजाबी सम्मान का कार्ड जरूर चलेगा।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कैप्टन अपनी पार्टी बनाएंगे या किसी अन्य पार्टी में शामिल होंगे। वे अपनी खुद की पार्टी बनाकर किसी अन्य पार्टी से गठबंधन भी कर सकते हैं। इस दौरान उनको कितना राजनैतिक लाभ मिलेगा, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इससे कांग्रेस के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती चली जाएगी और खिसकती जमीन को न तो राहुल रोक पाएंगे, न सोनिया रोक पाएंगी, न सिद्धू रोक पाएंगे और न ही चन्नी रोक पाएंगे। जाहिर है, चुनाव से ठीक पहले अपमानित कर मुख्यमंत्री को हटाने का कांग्रेस का निर्णय आत्मघाती निर्णय है। (संवाद)
पंजाब में मुख्यमंत्री परिवर्तन
आत्महंता प्रवृति से ग्रस्त हो गई है कांग्रेस
उपेन्द्र प्रसाद - 2021-09-20 11:22
पंजाब विधानसभा के चुनाव सिर पर हैं और इस बीच अमरीन्दर सिंह को मुख्यमंत्री पद से कांग्रेस द्वारा हटा दिया जाना इस बात का संकेत है कि सोनिया गांधी परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस आत्महंता प्रवृति से ग्रस्त है। कैप्टन सिंह को हटाने का जो तरीका अपनाया गया है, वह तो और भी ज्यादा खराब है और उससे पता चलता है कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व पार्टी का सही तरीके से नेतृत्व करने में विफल है। कांग्रेस आलाकमान ने अबतक अनेको राज्यों में दर्जनो मुख्यमंत्री हटाए है, लेकिन जिस तरह से अपमानित कर कैप्टन को पद से हटाया गया है, उसकी कोई और दूसरी मिसाल नहीं है। हटाए जाने का जो तरीका अपनाया गया है, वह भी बहुत ही कायरतापूर्ण है। एक कॉमेडियन का इस्तेमाल उन्हें हटाने के लिए किया गया। उनके खिलाफ केन्द्रीय द्वारा विक्षुब्ध तैयार किए गए। असंतुष्टों की संख्या बढ़ाई गई और बाद में उन्हें हटा दिया गया।