आज हम उन्हीं विशेष परिस्थितियों से गुजर रहे हैं जो आज से दो सदी पहले थे। समाज पूंजीवाद में बदल रहा था। वित्त पूंजी भी बहुत पीछे नहीं नहीं रह गई थी। इस द्वन्द्वात्मक परिस्थिति को उजागर किया था हमारे पथप्रदर्शक कार्ल मार्क्स ने। आज प्रत्येक कदम पर वही पुरानी विशेषताएं नए रूप में आ रही है। निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्रों का विकेन्द्रीकरण चल रहा है, कार्पोरेट घरानों का ही वर्चस्व है। सारा रेवेन्यू उन्हीं के हाथों जा रहा है जबकि करदाता सारा कुछ खर्च करने के बाद भी खाली हाथ है। न तो उनकी क्षतिपूर्ति होती है, न ही उन्हें अपने व्यय पर मुआवजा मिलता है। इस सबका हानिकारक प्रभाव उत्पादन पर पड़ता है। इसलिये जीडीपी नीचे जा रही है। कृषि क्षेत्र में कुछ सफलताएं मिली थी पर इस क्षेत्र में भी कारपोरेटाइजेशन करने के लिये तीन कानून कृषि पर भी लाए गये हैं जो विध्वंस की ही सूचना देते हैं। इन कानूनों के विरूद्ध किसान पिछले दस महीनों से दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे हैं।
निवेश एक ऐसा क्षेत्र है जहां वित्तीयकरण का प्रभाव शीघ्र दिखाई देता है। 2020-21 में, हमारे देश में व्यक्तिगत स्तर पर पूंजी निवेश में भारी कमी आई है। इस गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ पैनडेमिक के साथ। इसी दौरान जब आम आदमी अभाव के भयानक दौर से गुजर रहा था, कारपोरेट घरानों को प्रचुर मात्रा में लाभ हुआ। इसके विपरीत प्रवासी मजदूर भोजन, आश्रय और रोजगार की खोज में हजारों मील पैदल चले जा रहे थे, निष्फल, निराश। बैंकों ने सिर्फ 220 प्रोजेक्ट्स को ही अनुमति दी। यह अब तक के इतिहास में सबसे कम था। जो प्रोजैक्ट पूरे भी हुए, वे समुचित आर्थिक सहायता के बिना बहुत अधिक समय ले रहे थे पूरा होने में या फिर अधूरे ही रह जाते थे।
2008-9 में एक समय ऐसा आया जब पूरा विश्व एक भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा था। लेकिन आज 2020-21 में यह गिरावट और भी तेजी से चलती रही। प्रोजेक्ट्स पर लगने वाले खर्च में भी कमी कर दी गई।
यह खर्च 2019-20 में 1,75,830 रूपये तक गया था, जबकि 2020-21 में यह गिरावट 75822 पर आ गया। जहां तक प्रोजेक्ट्स के पूरे होने के समय का प्रश्न है, इमें अभावनीय देर होती गई। कुछ अधूरे ही छोड़ दिये गयें इसी तरह की एक परिस्थिति आर्थिक संकट के समय में आई थी। आर्थिक कष्ट के दौर में ही प्रोजेक्ट्स का देर से पूरा होना शुरू हो गया था। यह 2014-15 में भी था। वैश्विक आर्थिक कष्ट के दौर में प्रोजेक्ट्स को पूरा होने में अत्यंत ही देर होने लगी। इस तरह वित्त पूंजी का विकास तेज होता रहा, जबकि निवेश में भारी कमी होती रही। 2017-18 में प्रोजेक्ट्स के पारित होने में अत्यंत देर भी होने लगी और कई बार तो इन्हें रोक भी दिया गया। इससे देश के विकास में शिथिलता आती रही। विकास अपने आप में अंधा होता है, यह सत्य एक बार और उजागर हुआ। संगठित मजदूरों के साथ ही असंगठित भी जुड़ गए जिनकी संख्या कहीं अधिक है। इनमें लाखों मजदूर श्रम बाजार की अनिश्चितता के शिकार बने। रोजगार में भयानक कमी और शोषण के बाजार में गर्मी के कारण मजदूरों के कष्ट का अंत नहीं है। वेतन इतना कम हैं कि इससे पूरा परिवार तो क्या, एक व्यक्ति भी अपना खर्च पूरा नहीं कर सकता। घटते निवेश और कम होते उत्पादन के साथ ही बढ़ती कीमतों के कारण जिन्दगी को चला पाना ही कठिन हो चला है।
छोटे और मझोले उद्योग भी आज बंद हो चले हैं। गिरावट तेजी से हो रही है। यहां तक कि सिर्फ चंद कारपोरेट घरानों के पास ही सारा कुछ इकट्ठा होता जा रहा है। बाकी सारी आर्थिक यूनिट्स बुलडोज कर दी गई है। इन सबके साथ ही सामाजिक सुरक्षा नहीं दी गई है। इन सबको बचाना बहुत जरूरी है। मजदूरों के काम का चरित्र बदल चुका है, काम के घंटे बढ़ गए हैं, और निवेश के अभाव में रोजगार में टिके रह पाना भी कठिन हो चला है।
2020 से 72 प्रतिशत परिवारों के पास रोजगार नहीं है। इनके पास नियमित आय का स्रोत भी नहीं है। यही हाल कृषि क्षेत्र में 87.1 प्रतिशत परिवारों का है। 56.9 प्रतिशत परिवारों का शहरी इलाकों में यही हाल है। यह 2019-20 के सर्वे के अनुसार है और इस समय भारत में 80 प्रतिशत मजदूर बेकार थे। आर्थिक व्यवस्था में भी एक अनौचारिकता आ गई है। प्रायः काम देने में मजदूर की कुशलता का ध्यान नहीं रखा जाता। उन्हें अकुशल मजदूरों की श्रेणी में ही रखा जाता है और कोई कानूनी मान्यता भी इनकी नहीं है।
यह वित्तीय पूंजी का प्रारंभ है-निषेघात्मकता के साथ। इसे ऐसा ऊपरी ढांचा चाहिये जो इसके अन्याय भरे कदमों को वैधता प्रदान करे। ध्वंस के दिन आ गए हैं। अब इसे पराजित करने की नीतियां भी तैयार होनी है। (संवाद)
बुनियादी परिवर्तनों के दौर में
ध्वंस के दिन आ गए हैं
कृष्णा झा - 2021-09-24 09:48
आज हम बुनियादी परिवर्तनों के दौर से गुजर रहे हैं। जब बुनियाद बदल जाती है तो ऊपरी ढांचे को भी बदलना पड़ता है। पूंजीवादी समाज टिका होता है मालिक और मजदूर के कंधों पर और वही उत्पादन का भी दायित्व निभाते हैं। उनमें से एक उत्पादन को व्यवस्थित करता है, जिसके लिये निवेश का होना अनिवार्य है, और इस निवेश को ही वैज्ञानिक शब्दों में पूंजी कहते हैं। यह पूंजी निकलती है जब उत्पादन अधिक होता है और अतिरिक्त मुनाफे के साथ अधेशेष मूल्य मिलता है। इस सत्य की खोज मार्क्स ने की थी जब वह अपने राजनैतिक अर्थशास्त्र की रचना कर रहे थे। अधिशेष तभी होता है जब मजदूर अपने मुआवजे के अतिरिक्त काम करता है। यह अतिरिक्त श्रम ही अधिशेष का स्रोत है और पूंजी की भूमिका भी निभाता है। समाज के विकास के साथ ही पूंजी भी विकसित होती है और इस सबकी चरम परिणति होती है वित्त पूंजी में। औद्योगिक पूंजी और बैंक का परस्पर में मिल जाना होता है और निवेश में भारी कमी आ जाती है।