हमारी जो संवैधानिक व्यवस्था है, उसके तहत प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख होते हैं और न्यायपालिका कार्यपालिका से स्वतंत्र और समानांतर संस्था है। लेकिन उसमें भी प्रधानमंत्री की तस्वीर को घुसा दिया जाना न केवल अशोभनीय है, बल्कि बहुत ही आपत्तिजनक है। इससे यह पता चलता है कि न्यायपालिका कार्यपालिका के अधीन है और जजों या सुप्रीम कोर्ट के अन्य स्टाफ जो कोर्ट के डोमेन नेम वाला ईमेल इस्तेमाल करते हैं, वे प्रधानमंत्री का प्रचार कर रहे हैं।

बात बात में प्रधानमंत्री को प्रचारित करने की प्रवृति बहुत ही ज्यादा मजबूत है। इस तरह की सनक न तो भारत में कभी देखी गई है और न ही दुनिया के अन्य देशों में कहीं देखी जा सकती है। हालांकि यह सच है कि शासक अपने प्रचार माध्यमों से अपना प्रचार करता और करवाता है और सत्ता में होने के कारण प्रचार के अन्य स्रोतों से भी उसका प्रचार अपने आप हो जाता है। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने प्रचार का एक ऐसा विश्व कीर्तिमान स्थापित कर दिया है, जो आने वाले समय में शायद ही कोई तोड़ पाए। बात बात में उनका प्रचार होता है और प्रचार के लिए न्यायपालिका का भी इस्तेमाल कर लिया गया है।

वैसे डोमेन निर्माता एनआईसी(निक) ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है और कहा कि अनजाने में वह गलती हो गई, जिसे वह सुधार लेगी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह गलती शायद सुधार ली गई होगी, लेकिन क्या वह गलती अनजाने में हुई या जानबूझकर की गई या उसे डोमेन बनाने वाले गलती मान ही नहीं रहे थे। इसकी संभावना भी हो सकती है कि किसी नीति विशेष के तहत वैसा किया गया होगा। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से वह प्रकरण समाप्त हो गया है।

लेकिन कोरोना महामारी के लिए वैक्सिनेशन का जो टीका लगने का जो प्रमाण पत्र जारी किया जाता है, उस पर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर है। उस पर भी आपत्ति उठाई गई है। जब विधानसभा के कुछ राज्यों में चुनाव हो रहे थे, तो चुनाव आयोग से उस पर शिकायत की गई थी औ कहा गया था कि वह आदर्श चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन है। निर्वाचन आयोग ने उस पर तात्कालिक रोक भी लगा दी थी। एक समय ऐसा आया था कि केन्द्र सरकार ने 45 साल से कम उम्र के लोगों को टीका लगवाने और उसके खर्च उठाने का जिम्मा प्रदेश सरकारों पर छोड़ दिया था। तब झारखंड सरकार ने फैसला किया था कि सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री मोदी का नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की तस्वीर जाएगी। यह खासकर 45 साल से कम उम्र के लोगो के सर्टिफिकेट के लिए किया गया था।

पर सुप्रीम कोर्ट में हो रही एक सुनवाई के दबाव में केन्द्र सरकार ने 75 फीसदी टीकाकरण का खर्च अपने ऊपर लेने की घोषणा कर दी और फिर सर्टिफिकेट के साथ प्रधानमंत्री की तस्वीर का खेल सभी जगह जारी है। सवाल उठता है कि इस सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री का फोटो क्यों? सरकारें अन्य अनेक किस्म का सर्टिफिकेट जारी करती हैं। जन्म प्रमाण पत्र जारी किया जाता है और मृत्यु प्रमाण पत्र भी क्या उन पर भी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या स्थानीय निकायों के प्रमुख की तस्वीर डाली जाए? क्या प्रमाण पत्र जारी करने वाला अधिकारी अपनी तस्वीर उस पर डाल दे? वैसे आमतौर पर होना यह चाहिए कि यदि संभव हो तो जिस व्यक्ति का सर्टिफिकेट जारी किया जाय, उसकी तस्वीर उस पर हो। ऐसा कुछ मामलों में किया भी जा रहा है। अनेक राज्य जाति या आय प्रमाण पत्र में उस व्यक्ति की तस्वीर डालते हैं, जिसका वह प्रमाण पत्र है।

दुनिया के अनेक देशों में ऐसा ही होता है। प्रमाण पत्र जिसके नाम से जारी होता है, उसी की तस्वीर उस पर होती है, ताकि किसी तरह की घपलेबाजी न हो और उस प्रमाण पत्र का इस्तेमाल कोई और न करे। इस प्रचलन के कारण ही विदेशों में भारत के वैक्सिनेशन प्रमाण पत्र धारकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जब वे प्रमाण पत्र विदेश के अधिकारियों को दिखाते हैं, तो उन्हें देखकर उस प्रमाण पत्र के असली होने पर उन्हें संदेह हो जाता है। वे प्रमाण पत्र धारक के चेहरे से सर्टिफिकेट पर नरेन्द्र मोदी की तस्वीर का मिलान करते हैं और कहते हैं कि तस्वीर में तो आप नहीं हैं, वह तो किसी और की तस्वीर है। फिर वे उस सर्टिफिकेट को ही फर्जी मान लेते हैं। उसके बाद सर्टिफिकेट धारकों को यह समझाने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ता है कि वह तस्वीर भारत के प्रधानमंत्री की है, उनकी नहीं। फिर समझाना पड़ता है कि भारत में सबके वैक्सिन सर्टिफिकेट पर वही तस्वीर होती है।

जाहिर है, प्रधानमंत्री की वह तस्वीर असुविधाजनक भी है। सुप्रीम कोर्ट को खराब और आपत्तिजनक लगा, तो उसने अपने ईमेल सिस्टम से उनकी तस्वीर हटाने का आदेश दे दिया। सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर वैक्सिनेशन सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री की तस्वीर के बारे में भी केन्द्र सरकार से सवाल पूछना चाहिए। केन्द्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि लोगो में टीकाकरण के प्रति चेतना जगाने और कोविड सावधानियां बरते जाने को प्रमोट करने के लिए ऐसा किया गया है, लेकिन इस तर्क में कोई दम नहीं है। इन प्रमाण पत्रों से भी तस्वीर हटाई जानी चाहिए। (संवाद)