उत्तराखंड क्रांति दल के अप्रासंगिक हो जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी ने चुनावी माहौल को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश की। उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था और उत्तर प्रदेश में बसपा एक बड़ी पार्टी थी। 2007 से 2012 तक यह प्रदेश की सत्ता में थी। जाहिर है, उत्तर प्रदेश के प्रभाव में उत्तराखंड में भी बसपा चर्चा का विषय बन जाती थी। इसके कुछ विधायक भी जीत जाते थे। लेकिन उत्तर प्रदेश में बसपा के पतन और मायावती के राजनीति से लगभग संन्यस्त हो जाने के बाद बसपा भी उत्तर प्रदेश में अप्रासंगिक हो गई है।

इसके बाद माना जा रहा था कि उत्तराखंड की राजनीति कांग्रसे बनाम भाजपा तक ही सीमित रहेगी, लेकिन आम आदमी पार्टी इस बार पूरी ताकत के साथ वहां चुनाव लड़ रही है और कांग्रेस व भाजपा- दोनों ने निराश मतदाताओं की गोलबंदी अपने साथ करने की कोशिश कर रही है। इस गोलबंदी के साथ इस बार मुकाबला त्रिकोणात्कम होने की संभावना है। किस हद तक त्रिकोणात्मक होगा, इसके बारेर में अभी दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। वैसे आम आदमी पार्टी की कोशिश रहेगी कि उसे इस चुनाव में कम से कम 6 फीसदी वोट मिले या कम से कम 3 सीटों पर जीत हासिल हो, ताकि आम आदमी पार्टी को भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा उत्तराखंड में मान्यता प्राप्त हो जाय। आप पहले से ही दिल्ली और पंजाब में मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय पार्टी है। यदि यह उत्तराखंड और गोवा में भी मान्यता प्राप्त करने लायक चुनावी सफलता पा लेती है, तो यह राष्ट्रीय पार्टी का रुतबा हासिल कर लेगी।

बहारहाल, हम उत्तराखंड के चुनाव की बात कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर सत्ता में आने की लड़ाई लड़ रही है। उसके खिलाफ प्रदेश में भारी असंतोष था। तराई इलाकों के किसान तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। लखीमपुर खीरी की घटना के बाद उत्तराखंड के तराई के किसानों का असंतोष और सातवें आसमान पर चढ़ गया था। दूसरी तरफ देवस्थानम बोर्ड के गठन के कारण पंडों-पुजारियों का गुस्सा भी भड़का हुआ था। गौरतलब है कि उत्तराखंड मंदिरों और तीर्थ स्थानों का प्रदेश है। वहां की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन और धार्मिक पर्यटन पर निर्भर करता है। उन धार्मिक तीर्थस्थलों का प्रबंधन वहां के स्थानीय लोगें के ही हाथों में है। लेकिन तीर्थस्थानम बोर्ड बनाकर स्थानीय लोगों के नियंत्रण को समाप्त करने की कोशिश की गई और इसके खिलाफ पंडा और पुजारी आंदोलन करने लगे।

चुनाव नजदीक आते ही भारतीय जनता पार्टी को अहसास हो गया कि पंडों-पुजारियों का गुस्सा उन्हें भारी पड़ सकता है। इसलिए उसकी सरकार ने बोर्ड के गठन का निर्णय वापस ले लिया है। इसके पहले ही उसने तीनों कथित कृषि कानूनों को भी वापस ले लिया था। इन दोनों निर्णयों के बाद भारतीय जनता पार्टी चुनाव में एक बार फिर सत्ता में आने की उम्मीद कर सकती है, अन्यथा उसका खेल खत्म हो चुका था।

चुनाव की तिथियों की घोषणा के पहल्र प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड के विकास की एक से एक ताबड़तोड़ घोषणाएं कर डालीं और पुरानी चल रही विकास की योजनाओं की याद भी ताजा करा दी। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पलड़ा भारी लग रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों की समस्याएं बहुत बढ़ गई हैं। कोरोना ने लोगों का भारी नुकसान कर डाला है और इस संकट के दौरान लोगों को सरकार से जो उम्मीद थी, वे पूरी नहीं हुई। जाहिर है कि लोगों में सरकार के खिलाफ नाराजगी है और उसका फायदा कांग्रेस को हो रहा है।

एक अन्य कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बदलती छवि भी है। आबादी के एक बड़े हिस्से में मोदी की छवि एक ऐसे सुपरमैन की थी, जो खुद सभी समस्याओं समाधान माने जा रहे थे। लेकिन कोरोना संकट के दौरान लोगों के बीच यह छवि पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। अब लोग नहीं मानते कि वे सभी समस्याओं के समाधान हैं, बल्कि उनकी छवि समस्या खड़ी करने वाले नेता की बन गई है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का ऐसा कद नहीं बन सका है कि वे कांग्रस के नेता हरीश रावत की बराबरी कर सकें, इसलिए नरेन्द्र मोदी के नाम और चेहरे पर भी वोट मांगे जा रहे हैं और मोदी की छवि धूमिल होने का लाभ कांग्रेस को मिलता दिख रहा है।

यदि मुकाबला सीधा होता, तो भारतीय जनता पार्टी तो चुनाव के पहले ही आत्मसमर्पण कर देती, लेकिन आम आदमी पार्टी की उपस्थिति ने उसे अपनी उम्मीद पाने रखने का मौका दिया है। भाजपा विरोधियों का एक हिस्सा आम आदमी पार्टी को मत देगा और यह भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा है। जितने ज्यादा मत आम आदमी पार्टी को मिलेंगे, उतना ही ज्यादा भाजपा को फायदा होगा। लेकिन फिलहाल तो उत्तराखंड में परिवर्तन के संकेत दिख रहे हैं। (संवाद)