चुनावों के बीच इस मामले का उठना कुछ आश्चर्यजनक भी लगता है। इसका कारण यह है कि उडुपी के जिस स्कूल से यह मामला शुरू हुआ, वहां पिछले एक साल से हिजाब पहनने पर रोक लगी हुई थी और इस बीच लड़कियों ने उस रोक का पालन किया था। लड़कियों के अभिभावकों को भी इस पर एतराज नहीं था। लेकिन यह मामला दिसंबर से परेशानी का सबब बनने लगा। मुश्किल लड़कियां हिजाब पहन कर आने लगीं। जनवरी महीने में स्कूल प्रशासन ने कुछ हिजाबधारी लड़कियों का कक्षा में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया और उसके बाद से ही हंगामा शुरू हो गया।

सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये मुस्लिम लड़कियां और उनके अभिभावक पिछले एक साल से स्कूल ड्रेस कोड का पालन क्यों कर रहे थे, यदि उन्हें उस कोड पर आपत्ति थी? और उन्होंने चुनावों के समय को ही इस विवाद को उठाना क्यों जरूरी समझा, जबकि उन्हें पता था कि इससे चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो सकता है। मजे की बात यह है कि इस ध्रुवीकरण से भाजपा को फायदा होता है और भाजपा के सत्ता में आने से मुसलमान अपने को प्रताड़ित महसूस करते हैं। ऐसा क्यों होता है, यह तो मुस्लिम समाज के लोग ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन एक बात तय है कि मतांध प्रवृतियों का समर्थन नहीं किया जा सकता, भले वे किसी भी संप्रदाय से संबंधित हों।

हिजाब पहनना कुरान का आदेश है और वह मुसलमानों की धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। ऐसा कहा जा रहा है। भारतीय संविधान धार्मिक आस्था के मानने की आजादी देता है, इसलिए हिजाब पहनना उनका संवैधानिक अधिकार है, यह भी कहा जा रहा है। लेकिन ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि उनको यह अधिकार भारत के उस संविधान से मिला है, जो धर्मनिरपेक्ष है। यदि उन्हें संविधान से अधिकार लेना हो तो उसे संविधान की मूल भावना को भी समझना चाहिए।

संविधान द्वारा दी गई धार्मिक आजादी निर्बंध नहीं हो सकती, उस आजादी को धर्मनिरपेक्षता की सीमा में ही देखा और समझा जाना चाहिए। वैसे यह मामला कोर्ट का है और हाई कोर्ट इस पर फैसला करेगा और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी जा सकता है, लेकिन यह तो स्पष्ट समाज में देखा जा सकता है कि बुरका और हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं की संख्या बहुत कम हैं। कहने का मतलब है कि ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं बुरका और हिजाब नहीं पहनती और यदि पहनती भी है, तो खास मौके पर ही पहनती हैं, हमेशा नहीं पहनती। इसका मतलब है कि हमेशा हिजाब या बुरका पहने रहना मुस्लिम महिलाओं के लिए अनिवार्य नहीं हैं। महिलाएं अपने विवेक या पसंद का इस्तेमाल करते हुए इन्हें कभी पहनती है और कभी नहीं पहनती हैं।

अब स्कूलों की बात करते हैं। मुसलमानों की अपने शिक्षा संस्थान हैं, जहां धार्मिक शिक्षाओं के साथ साथ सेक्युलर शिक्षाएं भी दी जाती हैं। वहां के स्कूल ड्रेस कोड में बुरका और हिजाब पहनना शामिल हैं, इसलिए वहां महिलाओं को बुरका में देखा जा सकता है। लेकिन विवाद मुस्लिम शिक्षा संस्थानों को लेकर नहीं है। वहां महिलाओं को बुरका और हिजाब पहनने से कोई नहीं रोक रहा है। यह पूरा विवाद सेक्युलर शिक्षा संस्थानों का है, जहां सभी संप्रदायों की लड़कियां और लड़के पढ़ते हैं।

यह मामला स्कूल का ही है। कॉलेज की भी चर्चा हो रही है, लेकिन वे कॉलेज प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज हैं, जो स्कूलों की तरह 11वीं और 12वीं की शिक्षा देते हैं। और हम जानते हैं कि देश के लगभग सभी स्कूलों में स्कूल ड्रेस कोड है। लड़कों के लिए भी कोड है और लड़कों के लिए भी है। उसके पीछे एक खास दर्शन है और वह यह है कि सभी लड़के और लड़कियों में ड्रेस की एकरूपता दिखे और अपने पोशाकों से कोई अपने को अमीर या दूसरों से ज्यादा दौलतवाला न दिखाए। सब बराबर दिखें, इसलिए उस पोशाक को यूनिफॉर्म भी कहा जाता है। उसके नहीं रहने पर हो सकता है अमीर परिवार का लड़का लाखों की पोशाक अपने शरीर पर लादकर आए और दूसरों से अलग दिखे। इसके कारण कुछ छात्रों में हीन भावना भी आ सकती है या अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि पर अफसोस हो सकता है। और भी मनोवैज्ञानिक समस्या आ सकती है, इसलिए सबको एक तरह के कपड़े पहनने को कहा जाता है। यूनिफॉर्म कैसा हो, वह स्कूल ही तय करते हैं और छात्रों के माता-पिता भी अपनी ओर से राय दे सकते हैं और देते हैं, हालांकि अंतिम फैसला स्कूल का ही होता है।

इसी के तहत लड़कियों को हिजाब या बुरका पहनने की इजाजत नहीं दी गई। बुरके में तो पूरे शरीर को ढक कर रखा जाता है, जबकि हिजाब से सिर और चेहरा ढककर रखते हैं। फिलहाल हिजाब पहनने की ही जिद है। हंगामा इसी को लेकर है। यदि स्कूल इसकी इजाजत दे भी दे, तो दूसरी तरफ भगवा ब्रिगेड है, जो स्कूल से भगवा गमछा कंधे पर रखने या भगवा पगड़ी बांधने की इजाजत मांगेगा। और यदि उसे इजाजत नहीं मिली, तो फिर हंगामा शुरू होगा और फिर यूनिफॉर्म को ही समाप्त किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

फिलहाल यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट में है और जिस तत्परता से कोर्ट इस मामले को देख रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि उसका फैसला जल्द ही आ जाएगा। लेकिन इस बीच हिजाब पर हो रही राजनीति कौन-सा रूप लेगी यह कहना मुश्किल है। फैसले के बाद क्या स्थिति होगी, दसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तो जरूर कहा जा सकता है कि किसी भी प्रकार की मतांधता को समर्थन नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि एक संप्रदाय की मतांधता दूसरे संप्रदाय की मतांधता को जन्म देती है। (संवाद)