समाज के हर तबके में आय के सारे स्रोत सूख चुके हैं, मात्र कॉरपोरेट ही इस भयानकता से लाभन्वित हो रहे हैं। गरीब जनता तो बुनियादी जरूरतों के लिये भी अपनी बचत को लगा रही है जो उसके संकट के दिनों के लिये था। यह तो मध्यम वर्ग की स्थिति है, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं, उनके लिये तो बस निराशा ही बची है। कोई टैक्स से छूट नहीं दी गई है और न ही किसी रिलीफ की बात की गई है। पूरी अर्थव्यवस्था में मांगों का स्रोत अर्थात आय का स्रोत ही जब सूख रहा है तो उपभोक्ता बचा ही कहां है? इस विषम परिस्थिति से जब जनता गुजर रही है तो बजट सिर्फ स्याह अंधेरा ही लाया है, और इसमें हमारे हुक्मरानों की निष्ठुरता ही दीखती है।

जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, उन्हें ही कुचलने की कवायद है यह बजट। सारे सार्वजनिक क्षेत्रों को कुछ हाथों में बेचने की जल्दी में वे आज जनता द्वारा दिये करों से निर्मित इन उपक्रमों से, जनता का ही धन उठाने की कोशिश में है, स्पष्ट रूप से बजट में यह मांग की गई है कि निजी क्षेत्र में निवेश के लिये धन यहीं से लिये जाने की व्यवस्था की जा रही है। स्थायी विकास के नाम पर आर्थिक व्यवस्था में भारी परिवर्तन के लिये भी कदम उठाए जा रहे हैं।

इसके लिये विभिन्न योजनाओं में हवाई अड्डा, सड़कें, जलमार्ग, बंदरगाह, जन उपयोग के लिये, उनकी आवाजाही के लिये भी विभिन्न ठोस कदमों की चर्चा की गई है, पर वास्तव में पिछले साल से लेकर आज तक सिर्फ थोड़े से ही कदम उठाए गए हैं। इस विकास में सार्वजनिक इकाईयों को जगह मिलना भी कठिन है क्योंकि वे प्रायः सभी बिक चुके हैं। आर्थिक विकास के लिये ठोस कदमों के बारे में भी खामोशी ही है। सिर्फ रास्तों और रेलवे की ही चर्चा है। बुनियादी ईकाइयों को हाशिये में भी जगह नहीं मिली है। स्वास्थ्य सेवाएं, राष्ट्रीय ग्रामीण विकास की योजनाएं और रोजगार की संभावनाओं को दूर ही रखा गया है।

समाज के विकास के इन बुनियादी खंभों के 2023 के आर्थिक नक्शे से बाहर ही रखा गया है। इस अंधेरे में आज साठ लाख एमएसएमई डूब चुके हैं, उबरने की संभावना बजट में ता नहीं दिखाई देती और न ही इनमें मिलने वाले रोजगार कभी वापस मिल सकते हैं। समाज की चौरासी प्रतिशत जनता आज विनाश की कगार पर पहुंच चुकी है और 4.6 करोड़ जनता इसमें प्रायः समा चुकी है। उम्मीदें थी कि ग्रामीण रोजगार योजनाओं के ही समान शहरी जनता के लिये भी वैसे ही उपक्रम किये जायंगे, लेकिन इसके विपरीत नरेगा या ग्रामीण रोजगार येजना में ही 25 प्रतिशत की कटौती की गई है। इसका अर्थ है 73,000 करोड़ रु. से 98,000 करोड़ रुपए की कटौती। यह कदम गरीब ग्रामीण जनता के लिये तो भयानक है ही, उन प्रवासी मजदूरों के लिये भी, जिनके कारखानों में तालाबंदी हो चुकी है, अत्यंत निराशाजनक है। इन सारी अभावग्रस्त जनता के लिये संभावनाएं नहीं के बराबर है।

इस अर्धमुक्त बेरोजगार जनता के लिये जहां किसी भी आपूर्ति के रास्ते बंद हैं, वहीं उन्हें महामारी से भी लड़ना पड़ रहा है। आर्थिक व्यवस्था की धीमी गति का पूरो असर इन्हें ही ढोना पड़ रहा है। यह ‘‘धीमी गति’’ ही बजट के मूल स्वर में ध्वनित हो रही है, और इसीलिये बजट में वंचितों की अधिकाधिक संख्या बढ़ाने का ‘‘रोड मैप’’ ही बनाया गया है। सरकारी सूत्रों के ही अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण इलाके की एक-तिहाई जनता आज किसी भी प्रकार के आय के स्रोतों से वंचित है। फसलों की वृद्धि में या प्राकृतिक आपदा से उपजे संकट से निवारण के लिये किसी भी तरह के कदम सरकार नहीं उठा रही।

इस सबके साथ ही गिरती अर्थव्यवस्था की विपत्ति भी उन्हें जीने नहीं दे रही। देश की दो-तिहाई से अधिक जनता पिछले पांच सालों से किसी भी प्रकार के वेतन या आय से मेहरूम है। एक-चौथाई मजदूरों को वास्तविक वेतन नहीं मिलता। खेतों में खटते मजदूर, छोटे किसानों में जो असंतोष सुलग रहा था, आज क्रमशः वह प्रतिरोध का रूप लेता जा रहा है। शोषक नीतियों के एक स्पष्ट प्रतिबिंब के ही रूप में आज बजट में मूल समस्याओं के प्रति उपेक्षा दिखाई देती है। नरेगा को तोड़ना परिस्थिति की विकटता को ही उजागर करता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के प्रति लापरवाही, उसके खर्च में कटौती, जो पिछले बजट से ही चल रही हे, आज 2022-23 में भयानक स्तर पर पहुंच चुकी है। सरकार ने ‘‘जनकल्याण’’ का मुखौटा इस बार उतार फेंका है। इस मद में होने वाले आवंटन में 107 लाख करोड़ रु. की कटौती उस समय की गई है जब सरकार को इस पूरी विपत्ति से लड़ने के लिये जनता का साथ देना चाहिये था और जनकल्याण में दिल खोल कर खर्च करना चाहिये था।

जब जनता को बेरोजगारी, असमानता और अंत में जीवन से ही वंचित होने की स्थिति से गुजरना पड़ता है, और इन सबसे निजात पाने के हर रास्ते बंद हो चुके होते हैं, तो उन्हें सिर्फ निराशा ही नहीं घेरती, बल्कि वे प्रतिरोध में पूरी ताकत से खड़े होते हैं, उन्हें काबू में लाना असंभव है, किसानों का तेरह महीनों का धरना उसका एक ज्वलंत उदाहरण है। (संवाद)