उत्तराखंड में भाजपा की सरकार के खिलाफ असंतोष था और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के कारण कांग्रेस के कंधे पर ही उसे सत्ता से बाहर करने का जिम्मा था, लेकिन वहां भी कांग्रेस हार गई। सबसे गौर करने लायक बात यह है कि जिस हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस लड़ रही थी, वह हरीश रावत खुद अपना चुनाव हार गए। गोवा में पिछले चुनाव में कांग्रेस 40 में 17 सीटें लाकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन दल बदल कराकर भाजपा ने सरकार बना ली थी। अंत में कांग्रेस के पास सिर्फ दो ही विधायक बचे थे। इस चुनाव में भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल था। लेकिन कांग्रेस उसका फायदा नहीं उठा सकी। चुनाव के पहले कांग्रेस अपने नेताओं के दलबदल को भी नहीं रोक सकी। उसके कई नेता तृणमूल कांग्रेस में चले गए। वहां कांग्रेस की कमजोरी का फायदा उठाते हुए भाजपा ने 40 में से 20 सीटों पर जीत हासिल कर ली।

मणिपुर में तो कांग्रेस का और भी बुरा हुआ। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस न केवल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, बल्कि उसकी संख्या बहुमत से 3 या 4 ही कम थी। लेकिन इस बार तो वह मुख्य विपक्षी दल तक नहीं रही।

इन पांच राज्यों में पंजाब एक ऐसा राज्य था, जहां उसकी दो तिहाई बहुमत से सरकार थी। अमरीन्दर सिंह मुख्यमंत्री थे। उनके मुख्यमंत्री रहते जितने भी उपचुनाव या स्थानीय निकायों के चुनाव हो रहे थे, सभी में कांग्रेस जीत रही थी। कांग्रेस के फिर सत्ता में आने की पूरी संभावना थी। सभी सर्वे फिर से अमरीन्दर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के फिर से सत्ता में आने की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन राहुल प्रियंका को अमरीन्दर सिंह रास नहीं आ रहे थे। इसलिए उन्होंने पहले तो अमरीन्दर विरोधी नवजोत सिंह सिधू को पंजाब की कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष बना दिया और फिर सिधू की सहायता से अमरीन्दर सिंह की जड़ खोदते रहे। फिर उन्हें लगा कि अब खुदाई का काम पूरा हो गया है, तो उन्हें अपमानित कर मुख्यमंत्री पद से हटा दिया। वे बिना अपमानित किए हुए भी अमरीन्दर सिंह से इस्तीफा ले सकते थे, लेकिन नेतृत्व कला से वंचित दोनों भाई-बहन ने अमरीन्दर हो हटाने का वह तरीका अपनाया, जिससे अमरीन्दर सिंह की इज्जत धूल में मिली ही, खुद दोनों भाई-बहन की राजनैतिक समझ पर भी सवाल उठे।

इसमें कोई दो मत नहीं कि कांग्रेस की इस दुर्गति के लिए सिर्फ और सिर्फ सोनिया और उनके दोनों बच्चे ही जिम्मेदार है। पार्टी की पूरी कमान उनके हाथ में थी। पार्टी की नीति, रणनीति और जो कुछ भी हो सकती है, उनपर पूरा उनका नियंत्रण था। जो कुछ भी पार्टी में हो रहा था, वे तीनों ही कर रहे थे और आरोप लग रहे हैं कि वे अपने निर्णयों में किसी की सलाह भी नहीं लेते थे। हरीश रावत और अजय माकन जैसे लोग वही करते थे, जो उन्हें राहुल-प्रियंका और सोनिया को खुश करने वाला दिखाई देता था। पंजाब में तो कर्नाटक के एक विफल नेता को मोर्चे पर लगा रखा था, जिन्हें पंजाब की राजनीति के बारे में भी शायद पता नहीं हो। कहते हैं कि नवजोत सिधू प्रियंका गांधी की पसंद थे। प्रियंका की पसंद पार्टी के लिए कितने घातक साबित हुए, यह लोगों को पता चल चुका है। वे कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे, लेकिन अपनी ही पार्टी की पंजाब सरकार की आलोचना करना उनका सबसे प्रिय शगल था। बिना मुख्यमंत्री का चेहरा घाषित किए हुए ही वे जनता के सामने खुद को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर रहे थे। दाजजब राहुल गांधी ने भावी मुख्यमंत्री के रूप में चन्नी को पेश करने की घोषणा की तो सिधू ने अपने इर्द गिर्द जो आभा तैयार की थी, वह एकाएक गायब हो गई। फिर पार्टी की पंजाब में जो दुर्गति होनी थी, वह हो गई। अब कांग्रेस की सरकार सिर्फ छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ही रह है। वहां भी यदि भाई-बहन ने कोई प्रयोग किया, तो कांग्रेस वहां भी समाप्ति की ओर चली जाएगी।

चुनाव नतीजे आने के बाद सोनिया गांधी ने जो रवैया अपनाया है, वह कांग्रेस के भविष्य के लिए और भी भयावह है। उनका रवैया कांग्रेस पर कब्जा बनाए रखने का है, भले ही इस क्रम में देश की सबसे पुरानी पार्टी का वजूद समाप्त हो जाय। वह कांग्रेस के नेतृत्व को अपने बच्चो के लिए सुरक्षित रखना चाहती हैं अैर वह यह जानते हुए कि उनके बच्चों में कांग्रेस का नेतृत्व करने की योग्यता ही नहीं है। उन्हें न तो सही निर्णय करने आता है और न ही उन्हें सही और गलत की पहचान करने आती है। प्रियंका गांधी को सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश में पार्टी को मजबूत करने का जिम्मा दे रखा था। लेकिन पंजाब में जब चन्नी यूपी वाले भैया को पंजाब में घुसने नहीं देगें वाला भाषण कर रहे थे, तो प्रियंका गांधी खुशी से ताली बजा रही थीं। और बाद में चन्नी के भाषण और अपनी ताली बजाने को सही बताते हुए कह रही थी कि चन्नी का मतलब केजरीवाल से था। पूरी दुनिया को पता है कि केजरीवाल न तो यूपी से हैं और न बिहार से, बल्कि उस हरियाणा से हैं, जो कभी पंजाब का ही हिस्सा था। अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि कांग्रेस का नेतृत्व किस तरह के अयोग्य हाथों में है। इसलिए यदि सोनिया परिवार को कांग्रेस से प्यार है, तो इसका नेतृत्व उसे छोड़ ही देना चाहिए। (संवाद)