इस उभरते हुए परिदृश्य में, यह विश्लेषण करना सार्थक है कि इस वर्ष के केंद्रीय बजट ने कृषि के मुद्दे को कैसे संभाला है क्योंकि इसमें कोविड के बाद भारत की विकास गाथा को गति देने के लिए एक खाका तैयार किया गया है।आईसीआरआईईआर के निदेशक दीपक मिश्रा का कहना है कि वित्त मंत्री निर्मलासीतारमण ने वैश्विक कमोडिटी की कीमतों में गिरावट और कोविड-19 के प्रकोप के नियंत्रण के साथ हर अवसर को कई सब्सिडियों को कम करने केलिए उपयोग किया है।खाद्य सब्सिडी पर खर्च 2022-23 में 2.87 खरब रुपये से घटाकर 2023-24 में 1.97 खरब रुपये कर दिया है। उर्वरक सब्सिडीभी 2.25 खरब रुपये से घटाकर 1.75 खरब रुपये किया गया है।इसी तरह मनरेगा के बजटको भी 894 अरब से घटाकर इस साल 600 अरब रुपये कर दिया गया है।हालांकि ग्रामीण गरीब व्यय आवंटन के दृष्टिकोण से नुकसान में हैं, लेकिन उन्हें नयी परियोजनाओं की अधिकता से लाभ होगा, मिश्रा ने जोर दिया।

गौरतलब है कि कृषि ने पिछले छह वर्षों में 4.6 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है, 45.6 प्रतिशतकार्यबल को रोजगार दिया है और 2021-22 में देश के सकल मूल्य वर्धन में 18.6 प्रतिशत का योगदान दिया है।आईसीआरआईईआर में कृषि प्रोफेसर अशोक गुलाटी के अनुसार, अभी भी एक व्यवसाय के रूप में इसकी व्यवहार्यता एक प्रमुख चिंता बनी हुई है।इसलिए, केंद्रीय बजट2023-24 में कृषि-खाद्य नीतियों के लिए घोषित बजटीय प्रावधानों को कृषि क्षेत्र के विकास के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से समझने की आवश्यकता है।

गुलाटी का विचार है कि बजट ने कृषि-खाद्य-ग्रामीण क्षेत्र में विकास को सबसिडीसमर्थन से दूर करने और विकास की दिशा में ले जाने के लिए एक 'साहसिक कदम' उठाया।खाद्य और उर्वरक सब्सिडी और मनरेगा परभारी कटौती की कुल राशि मोटे तौर पर 1.7 खरब रुपये है।इन अनुदानों से होने वाली बचत को रेलवे, सड़कों, ग्रामीण आवास और जलशक्ति पर अधिक उत्पादक व्यय की ओर पुनर्निर्देशित किया गया है जो 'गुणक प्रभाव' के माध्यम से ग्रामीण भारत की मदद करेगा।

वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में कृषि एवं किसान कल्याण के लिए कई प्रमुख प्रावधान किये गये हैं, जो किइस बार 1.25 लाख करोड़ (कृषि शिक्षा और अनुसंधान सहित) रुपये है।पीएम-किसान के लिए 60,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।केसीसी के लिए 23,000 करोड़ रुपये और पीएम फसल बीमा योजना के लिए 13,625 करोड़ रुपये।इसका मतलब है कि कृषि बजट आवंटन का 77 प्रतिशत सुरक्षा जाल के लिए है और केवल 23 प्रतिशत कृषि विकास गतिविधियों के लिए है।

गुलाटी ने कहा कि यह एक ऐसा पहलू है जो बजट में उत्साहजनक नहीं है।गुलाटी ने जोर देकर कहा कि कृषि बजट को कम से कम 50-50 के अनुपात में विकास की ओर फिर से उन्मुख करने की आवश्यकता है।गुलाटी ने इस बात पर भी खेद जताया कि बजट में 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने के प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में किसी महत्वपूर्ण नीति का वायदा नहीं किया गया।यह एक सपना बनकर रह गया है और किसानों की आय बढ़ाना अमृत काल की ओर बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है।

द स्टेट ऑफ फूडसिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड2022' के अनुसार, भारत में विश्व स्तर पर सबसे बड़ी कुपोषित आबादी है, जो 2019-21 में कुल 702.7 मिलियन वैश्वक गरीब आबादी में से 224.3 मिलियन थी। इस बात को भी व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि कृषि क्षेत्र में वृद्धि भी पर्यावरण की कीमत पर आयी है, विशेषकर हवा, पानी, मिट्टी और पर्यावरण के लिए ग्रीन-हाउस गैस (जीएचजी) के उत्सर्जन के लिए के कारण। गुलाटी ने बताया कि जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहा तो भोजन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए और अधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना होगा जो पारिस्थितिकी की क्षमता से अधिक होगा।

भारतीय कृषि को स्मार्ट बनाकर ही किसानों की आय में पर्याप्त वृद्धि की जा सकती है।इसके लिए संरचनात्मक सुधारों सहित तमाम प्रयासों की आवश्यकता है।आरंभ करने के लिए, बीजों की गुणवत्ता, मिट्टी की उर्वरता और विविधीकरण में सुधार के लिए अधिक अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता है।किसानों को भी अनाज उगाने से नकदी फसलें उगाने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए।निश्चित रूप से यह अनाज में उत्पादकता सुनिश्चित करके खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किये बिना किया जाना चाहिए।

किसानों को मुर्गीपालन, पशुपालन बढ़ाकर अपनी आय बढ़ाने की जरूरत है।ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ाने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कृषि क्षेत्र में अधिशेष श्रम को रोजगार प्रदान करने के अलावा कृषि क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या से निपटा जा सके, जहां मौसमी रोजगार भी है।हालांकि बजट में कई सकारात्मक बातें हैं, लेकिन इसने किसानों की आय में महत्वपूर्ण वृद्धि के मुद्दे से निपटने के लिए कोई भी लीक से हटकर प्रयास नहीं किया। हालांकिबजट ने भू-राजनीतिकसहित कुछ तात्कालिक समस्याओं को मान्यता दी थी परन्तु कृषि क्षेत्र में, ग्रामीण-शहरी विभाजन को पाटने के प्रयासों में भरोसे की कमी रही।(संवाद)