उस उम्र के बच्चों के पास धार्मिक मतभेदों की ऐसी कोई अवधारणा नहीं है, कम से कम धर्म, जाति, पंथ, जातीयता या लिंग के आधार पर,कि वे किसी से नफरत करने की बात करें।लेकिन निरंतर नकारात्मक चर्चाओं का बच्चे के विकासशील दिमाग पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।गुजरात में हुए दंगों के बाद भी ऐसी टिप्पणियां की गयी थीं।
7 मई, 2002 को द टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट किया था कि "धर्मनिरपेक्षता आशा की आखिरी सांस के लिए हांफ रही है।खासकर जब बच्चे विपरीत समुदाय के खिलाफ आग उगलने लगे।नफरत का बीज कम उम्र में और कुछ मामलों में तो बच्चे के यौवन तक पहुंचने से पहले ही बो दिया जाता है।एक बच्चे ने अपने पिता से, जो मुस्लिम परिवार की मदद करना चाहता था,कहा कि उसे दंगा पीड़ितों के लिए कोई दुख नहीं होता और उस मुस्लिम परिवार को साबरमतीएक्सप्रेस के यात्रियों को जिन्दा जलाने वालों से मदद लेनी चाहिए।बड़े पैमाने पर दंगों के कारण प्रभावित हुए मुसलमानों के बच्चे भी हिंदुओं से बदला लेने की बात करते हैं।”
हमारे समाज में जहां जाति और धर्म के आधार पर पहले से ही पूर्वाग्रह मौजूद थे, दूसरों के प्रति घृणा की भावना जगाना आसान है।जर्मन नाजी राजनेता पॉलजोसेफगोएबल्स, जो नाजी पार्टी के मुख्य प्रचारक थे, और उसके बाद रिक जो1933 से 1945 तक प्रचार मंत्री थे, ने इस सिद्धांत पर काम किया कि "यदि आप एक झूठ को बार-बार दोहराते हैं, तो लोग उस पर विश्वास करेंगे, और आप भी स्वयं इसे मानने के लिए आगे आ जायेंगे।एक बार बोला गया झूठ झूठ ही रहता है लेकिन हजार बार बोला गया झूठ सच हो जाता है।”
उन्होंने यहूदियों के खिलाफ एक व्यवस्थित प्रचार किया।यह प्रचारित किया गया कि यहूदी कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ते हैं और वे जर्मनी के सामने आने वाली समस्याओं का कारण हैं।उसके बाद नाजियों ने सफलतापूर्वक यहूदियों का नरसंहार किया। अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं, हुतुओं ने टुट्सियोंके खिलाफ जोरदार प्रचार किया जिसके कारण रवांडा में जनजातीय युद्ध हुआ, जिसमें 1994 में केवल 100 दिनों की अवधि में 800,000 से अधिक लोग मारे गये। भारत के विभाजन के दौरान भीड़ के उन्माद के परिणाम स्वरूप 25 लाख लोग मारे गये जिनमें हिंदू, सिख और मुसलमान शामिल थे।मणिपुर में हिंसा की हालिया घटनाएं आने वाले दशकों के लिए कुकी और मेइती को एक-दूसरे से दूर कर देंगी।
यह देखना बहुत ही घृणित था कि महामारी के दौरान भी जब लोगों को एकजुट होने की आवश्यकता थी, उस समय तबलीगियों के खिलाफ एक झूठा प्रचार शुरू किया गया था और बिना किसी सबूत के कोविड महामारी फैलाने का आरोप लगायागया था।हालांकि बाद में अदालत ने उन्हें दोषमुक्त करार दिया।
शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ जब कुछ महिलाओं ने धरना दिया तो उनका मजाक उड़ाया गया। कुछ महीने पहले ही बिलकिसबानो के परिवार के हत्यारों और बलात्कारियों को गुजरात सरकार ने ठीक उसी समय रिहा किया था जब प्रधानमंत्री 15 अगस्त 2022 को लाल किले से महिलाओं के सम्मान को बचाने की अपनी प्रतिबद्धता के बारे में बात कर रहे थे।
अब हम देख रहे हैं कि बृज भूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी की मांग को लेकर जंतर मंतर नई दिल्ली पर धरने पर बैठी महिलाएं, जोबृज भूषण पर महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रही हैं और जो महिलाएं किसी अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं हैं।ये जाट समुदाय से आते हैं।यह एक स्पष्ट संदेश है कि नफरत की कहानी को अंजाम देने वाले लोग किसी को नहीं बख्शते।
यह समझने का समय है कि नफरत की कहानी किसी एक समुदाय या जातीय समूह तक सीमित नहीं है।यह उन कमजोर वर्गों के खिलाफ एक मानसिकता बन जाती है जिन्हें सभी बुराइयों के लिए दोषी ठहराया जाता है और फिर उन्हें सताया जाता है।हिटलरयहूदियों को खत्म करना चाहता था और खुद को सच्चा ईसाई साबित करना चाहता था।लेकिन अंत में द्वितीय विश्व युद्ध में मारे गये 5.5 करोड़ से अधिक लोगों में से अधिसंख्य ईसाई ही थे।
कट्टरता मानव व्यवहार का हिस्सा नहीं है।लोग हमेशा शांति से रहना चाहते हैं।दूसरों के खिलाफ नफरत गलत मकसद से फैलाई जाती है।अंग्रेजों के भारत आने से पहले हिंदुओं और मुसलमानों के आपस में लड़ने की कुछ रिपोर्टें हैं।देश पर शासन करने के उद्देश्य से औपनिवेशिक सत्ता ने समाज को विभाजित करने के लिए सभी हथकंडों का इस्तेमाल किया ताकि वे देश पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकें।वे देश को विभाजित करने में भी सफल रहे।हालांकि यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विभाजन के दौरान हुए दंगों में 25 लाख से अधिक हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों की हत्या के बावजूद, भारत के लोगों ने नफरत की राजनीति को खारिज कर दिया था और स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव में सांप्रदायिक विभाजनकारी ताकतों को हराया।धर्म, जाति या लिंग के फैलाये गये नफरतों के बावजूद लोगों ने मानवतावाद और गरिमा के आदर्शों के आधार पर देश का निर्माण करने के लिए ऐसे किया।वह 'भारत का विचार' था और सामूहिक भाईचारे का प्रतिबिंब जो औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ एक आंदोलन था।
अब क्या हो गया है? यह बड़ा सवाल है। क्यों भारत के लोग उन ताकतों के बहकावे में आ रहे हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कभी कोई हिस्सा नहीं लिया, बल्कि औपनिवेशिक आकाओं का पक्ष लिया?
बड़े होने की प्रक्रिया में सामाजिक शिक्षा और मनोवैज्ञानिक बदलाव युवा मन के भविष्य के व्यवहार पैटर्न में बहुत बड़ा अंतर लाते हैं।वे अपने पालन-पोषण के दौरान पूर्वाग्रहों, घृणा और कई अन्य नकारात्मक विचारों से प्रभावित होते हैं।इसलिए यह जरूरी है कि इसका गंभीरता से अध्ययन किया जाये और इस तरह के उच्छृंखल व्यवहार को होने से रोका जाये।
जनता को अब तय करना है कि हमें किस प्रकार का देश चाहिए -विभाजित या अखंड?नफरत समाज को विभाजित कर देगी, एकता को तोड़ देगी, भारत और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के विचार को नष्ट कर देगी।ऐसी ताकतें पूर्ण रूप से युद्ध में प्रवेश करने से नहीं हिचकेंगी और लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को उच्च जोखिम में डाल देंगी, खासकर जब यह क्षेत्र परमाणु ऊर्जा से संचालित हो रहा होगा।(संवाद)
शांति, सद्भाव और स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा ला रही कट्टरता
नफरत से विभाजित हो रहा समाज, टूट रही एकता, विभक्त हो रहा राष्ट्र
डॉ. अरुण मित्रा - 2023-05-11 13:08
12 अप्रैल 2023 के नव भारत टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, एक पोस्ट का जिक्र है जिसमें एक बच्चे की मां ने जिक्र किया था कि उसकी बेटी आज रोते हुए घर आयी और मुझसे पूछा कि 'क्या हम मुसलमान इतने गंदे हैं'?6 वींकक्षा में उसके सहपाठी ने उस समय उसके चेहरे पर थूक दिया था, जब उसने कहा कि वह मुस्लिम है।यह बहुत चिंता का विषय है और कुछ घरों में लगातार जो चर्चा हो रही है और बच्चों के दिमाग में बैठायी जा रही है, उसका प्रतिबिंब है।