यह एक कटु सत्य है कि चुनाव के पहले कर्नाटक में साम्प्रदायिक जहर घोलने की पूरी कोशिश की गई। अनेक बातें कही गईं जैसे हिन्दू भाईयों से कहा गया कि वे मुसलमान दुकानदारों से कोई सामान न खरीदें और यहां तक कि उन मुस्लिम दुकानदारों को हटने के लिए कहा गया जो मंदिरों के परिसर में बरसों से पूजन सामग्री बेच रहे थे।

हिजाब को लेकर पूरे राज्य में दूषित प्रचार किया गया। मुस्लिम लड़कियों को हिजाब पहनकर शिक्षण संस्थाओें में आने से रोका गया। यहां तक भी कहा गया कि यदि तुम हिजाब पहनकर आओगी तो हिन्दू छात्र-छात्राएं धार्मिक अंग वस्त्र पहनकर आएंगे। इस मुद्दे को अदालतों तक में ले जाया गया।

अनेक हिन्दू संगठनों ने हिन्दू लड़कियों से मुसलमान युवकों से किसी तरह का संबंध न रखने का आव्हान किया और उन्हें इसके लिए बाध्य भी किया। यदि रेस्टोरेंट, पार्कों या बसों में हिन्दू लड़की मुसलमान लड़के के साथ दिखती तो मारपीट तक की जाती।

टीपूसुल्तान को लेकर इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। टीपूसुल्तान को पूरी तरह से हिंदू-विरोधी बताया गया। अजान को भी मुद्दा बनाया गया।

भाजपा ने पूरी तरह स्वतः को हिंदू पार्टी के रूप में पेश किया। कांग्रेस ने ज्योंही बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात कही भाजपा ने उसे बजरंग बली पर हमला बताया और इस आधार पर कांग्रेस को हनुमान विरोधी बताना शुरू कर दिया। उनके द्वारा किया गया यह दुष्प्रचार भी काम न आया।

भाजपा द्वारा बार-बार यह प्रचारित किया गया कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का कोई प्रभाव नहीं हुआ है। परंतु कर्नाटक के चुनाव परिणामों ने इसे गलत साबित कर दिया है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कर्नाटक में 20 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 500 किलोमीटर घूमी जिसमें 22 दिन लगे। इन 20 विधानसभा क्षेत्रों में से भाजपा केवल दो सीटें जीत सकी।

भाजपा को पूरा भरोसा था कि नरेन्द्र मोदी का जादू उनकी नैया को पार लगाएगा। पर ऐसा नहीं हुआ और कांग्रेस ने इस मामले में भी बाजी मार ली।

बात यहां तक ही नहीं रही। स्वयं केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भविष्यवाणी की थी कि यदि कांग्रेस की सरकार बनी तो कर्नाटक में साम्प्रदायिक दंगे होंगे।

मोदी के नारे वोकलफॅार लोकल का सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस ने उठाया। उसके पास दो प्रभावशाली स्थानीय नेता - डी के शिवकुमार और सिद्धारमैया तो थे ही उसने स्थानीय मुद्दों पर जोर दिया। राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस ने भाजपा पर खूब हमला किया। यहां तक कि भाजपा के कुछ नेताओं और भाजपा से जुड़े अनेक संगठनों ने ही भाजपा सरकार के भ्रष्ट कारनामों की पोल खोली। इन संस्थाओं में कान्ट्रेक्टर एसोसिएशन और स्कूल एसोसिएशन शामिल हैं।

भाजपा का प्रमुख नारा है ‘कांग्रेस मुक्त भारत’। उसका यह सपना कब पूरा होगा यह कहना मुश्किल है परंतु कर्नाटक की जनता ने भाजपा के विरूद्ध भारी भरकम मतदान कर भाजपा मुक्त दक्षिण भारत का तोहफा भाजपा को दे दिया। कर्नाटक की जीत ने देश की समस्त भाजपा-विरोधी पार्टियों ने कांग्रेस को लगभग ऐसी पार्टी के रूप में स्वीकार कर लिया है जिसे केंद्र में रखकर प्रतिपक्ष की एकता के प्रयास किए जा सकते हैं। जिस भाषा में भाजपा विरोधी नेताओं ने कर्नाटक की जीत को लेकर कांग्रेस को बधाई दी है उससे ऐसा ही प्रतीत होता है।

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से यह तो साफ जाहिर हो गया है कि आने वाले चुनावों में सिर्फ मोदी के सहारे भाजपा अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं रह सकती।

कर्नाटक के अलावा उत्तरप्रदेश के स्थानीय संस्था चुनाव परिणामों ने एक दूसरी तरह से यही संदेश दिया है। वहां भाजपा की जीत का श्रेय मोदी के स्थान पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिया जा रहा है।

परंतु कर्नाटक के चुनाव परिणामों से भाजपा विरोधियों को अति उत्साहित एवं अति आश्वस्त नहीं होना चाहिए। भाजपा की ताकत को कम करके आंकना बहुत बड़ी भूल होगा। भाजपा एक पार्टी तो है ही परंतु उसके साथ एक ऐसा संगठन है जो किसी अन्य पार्टी के पास नहीं है। यह संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। सन् 2025 में यह संगठन 100 वर्ष का हो जाएगा। संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है। इस उद्देशय की पूर्ति के लिए उसने कई अनुषांगिक संगठन बना रखे हैं। इनमें मुख्यतः विद्या भारती (जो देश में 12,000 सरस्वती शिशु मंदिरों का संचालन करता है), विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, भारतीय मजदूर संघ और कई अन्य संस्थाएं शामिल हैं।

इन संगठनों के अधिकांश कार्यकर्ताओं की अपनी कोई निजी महत्वाकांक्षा नहीं है। इसके अलावा संघ और भाजपा के पास अपार धन है और भवनों सहित विशाल संसाधन हैं। जहां कांग्रेस का दिल्ली तक में अपना भवन नहीं है वहीं भाजपा और आरएसएस के अलावा इन संगठनों ने जिला स्तर तक पर अपने-अपने भवन हैं। सरस्वती शिशु मंदिरों का जाल पूरे देश में फैला हुआ है। इसलिए भाजपा का मुकाबला करना आसान नहीं है। (संवाद)