जब से भाजपा 2014 में सत्ता में आयी है उसके बाद से ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी समय-समय पर एक राष्ट्र, एक चुनाव की बात करते रहे हैं। उन्होंने 2020 में कहा था कि यह "बहस का विषय नहीं बल्कि भारत के लिए एक आवश्यकता है"। भाजपा नेता एक साथ चुनाव की आवश्यकता पर घिसे-पिटे तर्क दे रहे हैं: कि इससे बार-बार चुनावों के कारण होने वाले बहुत सारे खर्च बच जाएंगे; बार-बार चुनाव होने से आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है जिससे विकास कार्य बाधित होते हैं इत्यादि।

मोदी के सत्ता में आने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर तीन समितियां बनी हैं।

2015 में, कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति ने इस मामले पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। 2017 में, नीति आयोग ने 'एक साथ चुनाव का विश्लेषण' पर अपने चर्चा पत्र में प्रस्तावों का एक सेट बनाया और अगस्त 2018 में, विधि आयोग ने एक साथ चुनावों पर अपनी मसौदा रिपोर्ट प्रकाशित की। उन सभी ने मौजूदा राज्य विधानसभाओं में से कुछ का कार्यकाल छोटा करने या कुछ का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, ताकि उनका लोकसभा चुनावों के साथ तालमेल बिठाया जा सके।

कुछ लोगों ने पांच साल की अवधि में केवल दो बार चुनाव कराने का सुझाव दिया है - एक सेट लोकसभा और आधी राज्य विधानसभाओं के साथ और दूसरा मध्यावधि में बाकी विधानसभाओं के साथ। यदि राज्य विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनावों के अनुरूप लाने के लिए प्रस्तावित कदम अलोकतांत्रिक हैं और प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के संवैधानिक आधार की जड़ पर हमला करते हैं, तो यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाये जायें कि एक साथ चुनावों से कोई विचलन न हो।

सिंक्रोनाइज़ेशन के अर्थात् एक साथ चुनाव लागू करने के बाद की अवधि बदतर है। विधायिका या सरकार के कार्यकाल को कम करना या बढ़ाना, दोनों ही पार्टी-आधारित संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांत और विधायिका के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही के खिलाफ हैं। इसके अलावा, एक साथ चुनाव कराने और इसे बनाये रखने के लिए विधायिका के प्रति सरकार की जवाबदेही की संवैधानिक योजना में छेड़छाड़ की आवश्यकता होगी।

संविधान के तहत, यदि कोई सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर वोट से बाहर हो जाती है, या धन विधेयक पर वोट हार जाती है, तो वह इस्तीफा देने के लिए बाध्य होती है और यदि कोई वैकल्पिक सरकार नहीं बन पाती है, तो सदन भंग कर दिया जाता है और मध्यावधि चुनाव आयोजित किया जाता है। संविधान में लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के लिए कार्यकाल की कोई निश्चितता नहीं होगी। कार्यकाल की निश्चितता का मतलब यह होगा कि एक सत्तारूढ़ दल, जिसके पास सदन में स्थिर बहुमत है, वह सदन को भंग कर समय से पहले चुनाव कराने की सिफारिश नहीं कर सकता है।

विधि आयोग की रिपोर्ट में यह भी प्रस्तावित है कि यदि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो उसके साथ वैकल्पिक सरकार चलाने के लिये नये नेता के नाम का प्रस्ताव भी होना चाहिए। इसे "रचनात्मक अविश्वास मत" कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि भले ही किसी सरकार को सदन के बहुमत वोट से बाहर कर दिया जाये, उसके बदले कोई वैकल्पिक सरकार होनी चाहिए, जो वास्तव में विपक्ष ही होगा जो लोगों की पसंद का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। कार्यकाल की निश्चितता के माध्यम से स्थिरता को प्रधानता दी जायेगी और चुनावी विकल्प अप्रासंगिक हो जायेगा। यह सत्तारूढ़ दल के पक्ष में काम करेगा।

एक राष्ट्र एक चुनाव के प्रस्ताव को लागू करने के निहितार्थ केंद्र में शक्तियों का केंद्रीकरण और एकाधिकार है, और संक्षेप में कहें तो यह संघवाद को नष्ट करना है। भारत के राष्ट्रपति यानी केंद्र सरकार को राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को कम करने या बढ़ाने का अधिकार राज्यों और उसके निर्वाचित विधायकों के अधिकार को पूरी तरह से कमजोर कर देगा। एक साथ चुनाव होने के बाद, राज्य विधानसभाओं के प्रति जवाबदेह सरकारों का सिद्धांत और लोगों को अपनी पसंद की सरकार बनाने का अधिकार प्रतिबंधित हो जायेगा।

हम देख रहे हैं कि विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपाल राज्य सरकारों और राज्य विधानसभाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते हुए कैसा व्यवहार कर रहे हैं। एक साथ चुनाव के नाम पर लाये गये बदलावों के साथ, केंद्रीकृत नियंत्रण का मतलब होगा कि राज्यपाल केंद्र के लिए वायसराय के रूप में कार्य करेंगे।

भारत में व्यापक रूप से भिन्न राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों वाले 28 राज्य हैं (जम्मू और कश्मीर को छोड़कर, जिसे विघटित कर दिया गया है)। अलोकतांत्रिक एकरूपता लागू करने का प्रयास आरएसएस/भाजपा गठबंधन का आदर्श है। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा उनके 'एक राष्ट्र, एक भाषा, एक संस्कृति' के नारे के समान है।

संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए एक बड़ा संवैधानिक बदलाव करना होगा। संविधान में अनुच्छेद 83 (सदन की अवधि), अनुच्छेद 85 (लोकसभा का विघटन), अनुच्छेद 172 (राज्य विधानमंडलों की अवधि), अनुच्छेद 174 (राज्य विधानमंडलों का विघटन), अनुच्छेद 356 (राज्यों में संवैधानिक मशीनरी का फेल हो जाना) में संशोधन करना होगा। इसके अतिरिक्त लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और अन्य नियमों में संशोधन भा आवश्यक होगा।

यह स्पष्ट है कि राम नाथ कोविन्द के नेतृत्व वाली समिति चाहे जो भी सिफारिश करे, इन संवैधानिक और कानूनी कदमों के कार्यान्वयन में समय लगेगा और इन्हें आगामी लोकसभा चुनावों के लिए समय पर लागू नहीं किया जा सकेगा। लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि सरकार इसकी प्रक्रिया शुरू करने जा रही है। 18 से 22 सितंबर तक बुलाये गये संसद के विशेष सत्र में इस संबंध में कुछ घोषणा हो सकती है। विपक्षी दलों को सतर्क रहना चाहिए और मोदी सरकार के अगले कदम के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्हें तुरंत एक बड़े अभियान के साथ लोगों के पास जाना चाहिए और बताना चाहिए कि एक राष्ट्र एक चुनाव लोकतंत्र और संघवाद के लिए कितना खतरनाक है। (संवाद)