लोकिन नीतीश कुमार मानने को तैयार नहीं। पहले तो उन्होंने रात्रिभोज ही वापस ले लिया और फिर गुजरात द्वारा बिहार को मिली कोसी बाढ़ सहायता वापस कर दी। 12 जून के अपमान के बाद भाजपा द्वारा नाराजगी दिखाने का एक तरीका नीतीश सरकार से अपने मंत्रियों का इस्तीफा दिलाना हो सकता था, लेकिन भाजपा ने वैसा नहीं किया। मंत्री जब सरकार छोड़ने के लिए तैयार नहीं हों तो उनसे इस्तीफा दिलाना आसान नहीं होता है, हालांकि झारखंड जैसे राज्य में वह काम बहुत आसानी से हो गया था। वैसे भाजपा के पास मंत्रिमंडल से इस्तीफ दिए बिना अपनी नाराजगी दिखाने का एक और रास्ता था। 17 जून को राज्य सभा के लिए मतदान हो रहा था। छठे उम्मीदवार की उपस्थिति के कारण मतदान हो रहा था और भाजपा के उम्मीदवार को छोड़कर अन्य शेष उममीदवार घबराए हुए थे। खूद जनता दल (यू) को लग रहा था कि कहीं उसके कुछ विधायक बगावत न कर दें, इसलिए उसे भाजपा के श्ेाष 13 मतों के समर्थन की जरूरत थी। यदि भाजपा चाहती तो अपने सरप्लस 13 मत निर्दलीय उम्मीदवार को देकर अपनी नाराजगी दिखा सकती थी, लेकिन उसने वे मत जनता दल(यू) उम्मीदवार को दिए और अपने सहयोगी दल को उपकृत किया, लेकिन सहयोगी दल के मुखयमंत्री ने राज्यसभा चुनाव के अगले दिन ही बाढ़ राहत की 5 करोड़ राशि का चेक गुजरात सरकार को भेज दिया। यानी 17 जून को जनता दल(यू) ने भाजपा के विधायको का मत भी अपने उम्मीदवारों के लिए लिया और उसके अगले ही दिन भाजपा को एक बार फिर अपमानित किया।
अपने स्वाभिमान की रक्षा का दंभ भरने वाली भाजपा ने उसके बाद भी अपना पुराना रुख बरकरार रखा। भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष सीपी ठाकुर जनता दल (यू) के सामने गिड़गिडाते दिखाई दिए कि हमें अपमानित नहीं करो, हम तुम्हारे साथ हैं। केन्द्रीय नेताओं के आदेश पर सुशील कुमार मोदी ने नीतीश के साथ विश्वाय यात्रा में नहीं रहने की घोषणा कर दी, लेकिन फिर बाद में वह घोषणा वापस भी ले ली। जब भाजपा के नेता बिहार में हुए अपमान पर अपना रुख तय करने के लिए दिल्ली में बैठकों का दौर चला रहे थे, उसी समय नीतीश कुमार ने एक जांच टीम सूरत भेज दी, जो विज्ञापन देने वालों से पूछताछ करने करना चाहती थी। यानी वह भाजपा के लिए अपमान की तीसरी धूंट थी। बातचीत के दौर के बीच में ही भाजपा नेताओं ने याचना करके सूरत गई जांच की उस टीम को वापस बुलाने की घोषणा करवा दी।
जाहिर है, भारतीय जनता पार्टी का उस तरह का अपमान हुआ, जितना आजतक किसी पार्टी का अपने सहयोगी दल के हाथों नहीं हुआ था। उन अपमानों के बीच अपने स्वाभिमान की रक्षा करने का भाजपा नेताओं का बयान बहुत ही मार्मिक हुआ करता था। हालांकि नीतीश कुमार ने राहत राशि को लौटाने का जो निर्णय किया था, उसकी राज्य भर में चौतरफा निंदा हुई। सभी राजनैतिक पार्टियों ने एक स्वर में राहत राशि लौटाने को गलत बताया। बाढ़ पीड़ित लोगांे को नीतीश सरकार का वह निर्णय नागवार गुजरा और कोसी बाढ़ का राहत कार्य एक राजनैतिक मुद्दा भी बन चुका है, जो शायद आगामी विधानसभा चुनाव तक जीवित भी रहे, लेकिन भाजपा फिर भी नीतीश कुमार पर अपनी निर्भरता दिखाती रही।
बिहार में अपने सहयोगी दल के हाथों घोर अपमान सहने के बाद भी भाजपा उसके साथ है और सरकार में सत्ता का सुख भोग रही है, लेकिन बिहार से कुछ साल पहले अलग हुए झारखंड में उसका रवैया कुछ और रहा। नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ किया, उसकी तुलना में झारखंड मुक्ति मार्चा के शीबू सोरेन ने तो भाजपा के साथ कुछ किया ही नहीं था। उन्होंने सिर्फ लोकसभा में भाजपा द्वारा लाग गए कटौती प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया था। भाजपा के साथ झारखंड में उनकी सरकार बनी थी और वह विशेष परिस्थितियों के कारण बनी थी। झामुमो और भाजपा ने विधानसभा का चुनाव एक साथ नहीं लड़ा था, बल्कि एक दूसरे के खिलाफ लड़ा था। जाहिर है झामुमों और भाजपा की मिलीजुल सरकार एक अवसरवादी सरकार थी, जिसमें दोनों पार्टियां अपने अपने फायदे को देखते हुए शामिल हुई थीं। दोनों में से किसी ने दूसरे पर अहसान नहीं किया था। लोकसभा चुनाव झामुमो ने कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था, इसलिए यदि वह केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के पक्ष में मतदान भी कर दिया तो भाजपा को उतना नाराज क्यों होना चाहिए था कि सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा ही कर दे? लेकिन फिर भी भाजपा ने वैसा किया। शीबू सोरेन ने भाजपा के कटौती प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने के लिए माफी भी मागी। उसके बावजूद भाजपा नेताओं का गुस्सा शांत नहीं हुआ। और उन्होेने झारखंड की सरकार ही गिरा दी और ,खुद भी सरकार को गंवा दिया।
दूसरी तरह अभूतपूर्व अपमान के बाद भी वह बिहार में नीतीश कुमार से चिपकी हुई है। शीबू सोरेन से माफी मंगाकर अपमानित करने के बावजूद उसने सोरेन सरकार को गिरा दिया, जब नीतीश से अपमानित होने के बावजूद वह उनसे अलग होने को तैयार नहीं है। अपमानित करने और अपमानित होने की भाजपा के ये दो उदाहरण उसके असली संकट की पोल खोल देते हैं। भारतीय जनता पार्टी का संकट सिर्फ राजनैतिक ही नहीं, बल्कि नैतिक भी है। उसने झारखंड और बिहार में नैतिकता के दो पैमाने बना रखे हैं। इस तरह की नैतिकता के दोहरेपन का कारण पार्टी में व्याप्त व्यक्तिवाद है। बिहार भाजपा अध्यक्ष सीपी ठाकुर और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी केन्द्रीय नेतृत्व पर ज्यादा दबदबा रखते हैंण् इसलिए वे केन्द्रीय नेत्त्व से अपनी बात मनवा सकते हैं, लेकिन झारखंड भाजपा के अध्यक्ष रधुबर दास, जो सोरेन सरकार में मुख्यमंत्री थे, केन्द्रीय नेत्त्व पर दबदबा नहीं रखतें, इसलिए सोरेन सरकार से समर्थन वापसी पर फैसला लेने के पहले पार्टी के केन्द्रीय नेताओं ने उनकी राय लेने की भी जरूरत महसूस नहीं की। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के इस दोहरे चरित्र का आखिर क्या मतलग हो सकता है। (संवाद)
झारखंड के आइने में भाजपा का बिहार संकट
इस दोहरे मानदंड का क्या मतलब है?
उपेन्द्र प्रसाद - 2010-06-23 11:09
बिहार में नीतीश कुमार द्वारा अपमानित किए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थिति अत्यंत ही उपहासजनक हो गई है। 12 जून को नीतीश कुमार ने भाजपा नेताओं को दी गई भोज पार्टी को निरस्त कर दिया था। आमंत्रण देकर भोज नहीं देना भारतीय संस्कृति में बहुत ही अपूानजनक माना जाता है, लेकिन भाजपा अपमान का वह घूंट पीकर रह गई। सच कहा जायध् तो भाजपा नेताओं को अपनी नाराजगी दिखाने की हिम्मत तक नहीं हुई। अपनी नाराजगी दिखाने के लिए उनके पास यह कहने से ज्यादा कुछ नहीं था कि वे स्वाभिमान की कीमत पर किसी से गठबंधन नहीं करेंगे। उस स्वाभिमान की रक्षा की रट वे वही भी लगा रहे हैं, लेकिन वह रट लगाने में भी उनकी लाचारी के अलावा और कुछ भी नहीं दिखाई देती। अपने स्वाभिमान बचाने की बात वे कुछ इस तरह कर रहे हैं मानों वह नीतीश कुमार से कह रहे हों कि हम आपके साथ हैं, लेकिन कृपया करके मेरी बेइज्जती मत कीजिए।