महीना खत्म होने में बमुश्किल एक पखवाड़ा बचा है, अभी भी अंतिम पदधारी के नाम की घोषणा का इंतजार है। यह अभी भी रहस्य है कि क्या दोनों गुटों के नेता एक ही नाम पर सहमत हुए हैं? न तो आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नये चेहरे के बारे में कोई संकेत दिया है, न ही नरेंद्र मोदी ने मौजूदा भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के उत्तराधिकारी के नाम का प्रस्ताव दिया है।

फिर भी वरिष्ठ भाजपा नेता इस बात पर एकमत हैं कि यह आरएसएस या भाजपा के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं है और भागवत और मोदी दोनों को स्वीकार्य एक साझे उम्मीदवार की घोषणा जल्द ही की जायेगी। वे बताते हैं कि मोदी अंतिम दिनों से पहले अपना दिमाग नहीं खोलने के लिए जाने जाते हैं। मोदी ने हरियाणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में दो बिल्कुल अज्ञात लोगों को चुना। बाकी भाजपा नेताओं को उनके नाम सार्वजनिक होने के बाद ही पता चला।

इन नेताओं को यकीन है कि मोदी ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे आरएसएस को ठेस पहुंचे या उसके मिशन और दर्शन के खिलाफ जाये। वह बस समय ले रहे हैं। लेकिन मोदी की इस रणनीति ने आरएसएस के कार्यकर्ताओं को उनके इरादों के संदर्भ में संदेहास्पद बना दिया है। भगवा हलकों में व्यापक धारणा है कि वर्चस्व का संघर्ष और भगवा पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करने की इच्छा एक नये चरण में प्रवेश कर गयी है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ताजा घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि चुनावी नतीजे अब अडानी फैक्टर के आधार पर तय होंगे।

अमेरिका के आक्रामक रवैये पर भगवा नेतृत्व ने ध्यान दिया है और नोट किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय कारोबारी गौतम अडानी के खिलाफ लक्षित हमलों के पीछे अमेरिकी विदेश विभाग का हाथ है। अमेरिका के इस रुख ने मोदी के लिए राजनीतिक स्थिति को कमजोर बना दिया है। जाहिर है, इस पृष्ठभूमि में मोदी को अमेरिकी प्रशासन के साथ अपने संबंधों को सुधारने और मजबूत करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा। इसके लिए उन्हें भाजपा के एक मजबूत संगठन और आरएसएस के साथ बहुत ही सौहार्दपूर्ण संबंध की आवश्यकता है। एक ऐसे चेहरे का चयन करना जो उनके साथ दोस्ताना हो और मोहन भागवत को भी स्वीकार्य हो, महत्वपूर्ण मुद्दा है।

इंडिया ब्लॉक के सदस्यों, खासकर टीएमसी और समाजवादी पार्टी के हाल ही में संसद में इस मुद्दे को लगातार उठाने पर मतभेद भाजपा, खासकर मोदी, के लिए एक बड़ी राहत के रूप में आया है। अडानी पर राहुल के रुख का टीएमसी और सपा के विरोध ने वास्तव में कांग्रेस को पिछले दो दिनों में संसद परिसर में अपने सुबह के प्रदर्शन के दौरान अडानी पर सीधे हमले से दूर रहने के लिए मजबूर किया है। हालांकि, स्वर थोड़ा कमजोर है, लेकिन जोर जारी है।

अडानी आरएसएस के चहेते हैं, लेकिन जिस तरह से मोदी ने उन्हें और उनके कारोबार को बचाने के लिए अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगायी है, वह भागवत को पसंद नहीं है। आरएसएस मोदी से अडानी के मामले में अधिक सामरिक दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है, न कि यह आभास देने की कि भाजपा सरकार अडानी के हितों की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। सच तो यह है कि भागवत से अन्य गैर-गुजराती व्यापारिक घरानों ने भी संपर्क किया है, जो इस बात से व्यथित हैं कि केंद्र की मौजूदा सरकार दूसरों के हितों की अनदेखी करते हुए अडानी समूह को बहुत अधिक सुविधाएं दे रही है। आरएसएस को इसका ध्यान रखना होगा, क्योंकि ये घराने भी हिंदुत्व के समर्थक हैं और भाजपा-आरएसएस को धन देते हैं।

2019 में अमित शाह के अध्यक्ष पद से हटने से काफी पहले ही सबको पता चल गया था कि अगले अध्यक्ष के तौर पर जे पी नड्डा को लाया जायेगा। लेकिन इस बार किसी को भी नये अध्यक्ष के बारे में कोई जानकारी नहीं है। आरएसएस प्रमुख द्वारा आरएसएस की छवि और प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए अपनी शक्ति और अधिकार का प्रयोग करने से स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। अपने दस साल के शासन के दौरान मोदी ने आरएसएस के अधिकार को नजरअंदाज किया और नड्डा ने प्रधान मंत्री के निर्देशों के अनुसार काम किया।

लोकसभा चुनाव के बीच में नड्डा ने भाजपा के लिए आरएसएस की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाये थे। मोदी ने इन दस सालों में तीन तत्वों - व्यक्तित्व, विचारधारा, संगठन - के इर्द-गिर्द व्यक्ति आधारित तंत्र का निर्माण किया है। वह अपने तंत्र से इतने आत्ममुग्ध हैं कि वह भागवत को उनके करीबी सहयोगी को नया अध्यक्ष बनाने की अनुमति नहीं देना चाहते। पार्टी के घेरे में जो नाम चल रहे हैं उनमें विनोद तावड़े, सुनील बंसल, शिवराज सिंह चौहान, मनोहर लाल खट्टर, वसुंधरा राजे और संजय जोशी के नाम शामिल हैं। जोशी को मोदी का दुश्मन माना जाता है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आरएसएस किसी मुखर और स्वतंत्र व्यक्ति (जो मोदी-शाह से भयभीत न हो) में रुचि रखता है। यह आरएसएस नेताओं के हालिया दावों तथा आरएसएस और भाजपा नेताओं के बीच बैठकों से भी स्पष्ट है। आरएसएस और भाजपा नेता पार्टी संगठन को पुनर्गठित करने की योजना बना रहे हैं। इसलिए सिर्फ भाजपा अध्यक्ष का पद ही नहीं, अन्य संगठनात्मक पद भी रडार पर हैं।

जैसे-जैसे नये पार्टी अध्यक्ष के नाम की घोषणा करने का समय करीब आ रहा है, अगला अध्यक्ष कौन होगा, इस पर चर्चा तेज होती जा रही है। रहस्य बढ़ रहा है। वर्चस्व की जंग कौन जीतेगा - भागवत या मोदी? स्थिति इतनी खराब नहीं होती अगर मोदी ने खुद को भगवा सुप्रीमो के रूप में पेश करने की हिम्मत नहीं की होती, जिससे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की स्थिति और अधिकार कम होने का खतरा है।

एनडीए नेता के रूप में अपने चयन के बाद मोदी ने पार्टी को मजबूत करने और कुछ आरएसएस नेताओं को अपने पक्ष में करने की पहल की। सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस का सदस्य बनाने की अनुमति देने जैसे उनके कुछ कदम केवल मतभेदों को पाटने और उनकी आहत भावनाओं को शांत करने के उद्देश्य से थे। महाराष्ट्र में मोदी का हालिया कदम मतभेदों को कम करने का एक और प्रयास है। वास्तव में मोदी खुद को मुश्किल स्थिति में पा रहे हैं। महाराष्ट्र प्रकरण ने भागवत की पकड़ और अधिकार को मजबूत किया है। भगवा ब्रिगेड में हाल ही में हुए घटनाक्रम को अगर संकेतक के तौर पर देखा जाये तो ऐसा लगता है कि सत्ता का संतुलन भागवत के पक्ष में झुक गया है। मोदी सिर्फ़ अपने सिपहसालार को ही अगला पार्टी अध्यक्ष नहीं बना सकते। नये अध्यक्ष को मोहन भागवत के प्रति भी वफ़ादार होना होगा। अब बड़ा सवाल यह है कि वैसे भाजपा नेता पर सवारी कौन करेगा? (संवाद)