साधारणतः प्रधानमंत्री निचले सदन अर्थात् लोक सभा का सदस्य रहते हुए ही प्रधानमंत्री रहते हैं। दुनिया के लगभग सभी ऐसे राष्ट्रों में जहां संसदीय प्रणाली है वहां हाउस ऑफ द पीपुल्स, भारत में लोक सभा, जिसे निम्न सदन भी कहते हैं, के सदस्य को सामान्यतः प्रधानमंत्री बनाया जाता है। ब्रिटेन में तो लगभग उसके पूरे संसदीय इतिहास में कभी भी हाउस ऑफ लार्ड के सदस्य को प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया।

हमारे देश का ही उदाहरण लें। हमने भी संसदीय प्रणाली को अपनाया है। हमारी संसद के दो सदन हैं एक राज्यसभा और दूसरा लोकसभा। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग सभी प्रधानमंत्री लोकसभा के सदस्य रहे हैं। यदि किसी विशेष परिस्थिति में प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्ति के लिए थोड़े समय के लिए राज्यसभा का सदस्य बनाया गया है तो वह शीघ्र ही लोकसभा में चुनकर आ गया।

ऐसा पहला मौका उस समय आया जब इंदिरा गांधी को लालबहादुर शास्त्री की आकस्मिक मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके लिए उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया। जब वह राज्यसभा का सदस्य बनकर प्रधानमंत्री की हैसियत से लोकसभा में आयीं तो डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने व्यंग्य की भाषा में कहा कि आप ‘‘हमारे घर’’ (लोकसभा) में कैसे? शायद उस समय हमारे देश की यह अपेक्षा थी कि लोकसभा का सदस्य ही प्रधानमंत्री बनेगा। वह हमारे देश में लोकतंत्र का शुरूआती दौर था।

पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू लगातार लोकसभा के सदस्य रहे। दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री भी लोकसभा के सदस्य थे। शायद किसी को यह अपेक्षा नहीं थी कि किसी ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया जायेगा जो लोकसभा का सदस्य नहीं
होगा। परंतु जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हुईं उनमें इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। जब लोहिया जी ने उनसे यह कहा कि आप हमारे घर में कैसे? तो उन्होंने उनको जवाब दिया था कि मैं शीघ्र ही इस घर की सामान्य सदस्य हो जाऊंगी। उन्होंने अपना यह वायदा पूरा किया और शीघ्र ही लोकसभा में चुनकर आ गयीं। इस अंतराल में वह थोड़े समय ही राज्यसभा की सदस्य रहीं।

उसके बाद तो यह सिलसिला कई मामलों में अपनाया गया। न सिर्फ प्रधानमंत्री बनने के लिए बल्कि कई जानेमाने नेताओं, जिनको उनकी पार्टी किसी भी सदन में रहना आवश्यक समझती है, को लगभग असत्य का सहारा लेकर राज्यसभा में भिजवाया जाता रहा है। यह रास्ता लगभग अनेक प्रमुख नेताओं ने अपनाया है। इनमें भाजपा के प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं। सीपीएम के नेता स्वर्गीय श्री सीताराम येचुरी ने भी यह रास्ता अपनाया था।

देश की अनेक राजनीतिक पार्टियों ने यह रास्ता अपनाया। इनमें अनेक बड़े-बड़े वकील और विद्वान शामिल हैं। वे भले ही मूलनिवासी किसी राज्य के हों परंतु जिस राज्य से उन्हें राज्यसभा में पहुंचने की संभावना है वहां के निवासी बनकर वे उस राज्य के वोटर बन जाते हैं और वोटर बनने के बाद उस राज्य से राज्यसभा में पहुंच जाते हैं। स्वयं श्री मनमोहन सिंह अपने पूरे प्रधानमंत्रित्व काल में असम से राज्यसभा में पहुंचते रहे। प्रधानमंत्री के पद को त्यागने के बाद भी वे अपनी मृत्यु तक असम से राज्यसभा के सदस्य रहे।

साधारण स्थिति में इसमें कोई खतरा नहीं। परंतु जिस देश में यदि ऐसी परिस्थिति पैदा होती है कि ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना पड़ता है जिसका लोकसभा में चुना जाना लगभग असंभव होता है, उस व्यक्ति में तानाशाही प्रवृत्तियां भी हो सकती हैं। अपनी पार्टी के ऊपर भी उसका जबरदस्त नियंत्रण होता है। पार्टी का बहुमत भी उसे प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहता परंतु उसका इतना दबदबा रहता है कि पार्टी के रूझान के बावजूद वह राज्यसभा में चुना जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर देश के ऊपर तानाशाही भी लाद सकता है।

इस तरह की संभावनाओं को समाप्त करने के लिए मेरी राय में हमारे देश के संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए और इस बात का प्रावधान होना चाहिए कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो लोकसभा का सदस्य नहीं है किसी भी हालत में प्रधानमंत्री नहीं बन सके। ऐसे प्रावधान से हमारे देश में लोकतंत्र कायम रह सकेगा।

असम जहां से मनमोहन सिंह राज्यसभा में चुनकर आते थे वहां एक अनोखी स्थिति पैदा हो गयी थी। असम में वहां के समस्त मतदाताओं को वोटर और डी-वोटर में बांट दिया गया था। ‘डी’ मतलब डाउटफुल अर्थात शंकास्पद। यह विभाजन लगभग मजाक की हद तक था। बाप वोटर और बेटा डी-वोटर, पति वोटर तो पत्नी डी-वोटर। कौन सही वोटर है यह निर्णय करने के लिए वहां न्यायिक प्राधिकरण बनाये गये। प्रत्येक डी-वोटर को न्यायाधिक प्राणिकरण के सामने यह सिद्ध करना पड़ता था कि वह सही वोटर है।

यह विभाजन इसलिए किया गया कि वहां पर बांग्लादेश से भारी संख्या में लोग आकर बस गये थे और वे वोटर भी हो गये थे। परंतु क्या इस तरह का विभाजन बाप और बेटे में संभव है? क्या इस तरह का विभाजन बरसों से बने पति और पत्नी में संभव है? यह सोचने की बात है, परंतु ऐसा हुआ। उस समय मजाक में यह कहा जाने लगा था कि असम में कोई यदि डी-वोटर है तो वे मनमोहन सिंह हैं।

इस गुत्थी को मैंने स्वयं असम में जाकर देखा है। जिस देश में इस तरह की स्थिति निर्मित हो सकती है उसमें क्या किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजकर प्रधानमंत्री बनाना खतरे से खाली नहीं है? यह सोच का विषय है जिस पर निर्णय लेना आवश्यक है? (संवाद)