हाल ही में आयोजित 'ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2025' में कृषि आधारित उद्योगों में निवेश की कमी ने कई सवाल खड़े किए हैं। समिट का उद्देश्य राज्य में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना और निवेशकों को आकर्षित करना था। हालांकि, कृषि आधारित उद्योगों में अपेक्षित निवेश नहीं हुआ, जिससे सरकार को इस क्षेत्र को प्राथमिकता देने की आवश्यकता महसूस हो रही है।

समिट में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार की विभिन्न पहलों को प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ‘एक जिला-एक उत्पाद’ योजना के तहत 52 जिलों की विशिष्ट फसलें चिन्हित की गई हैं और उनके प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए गए हैं। इसके अलावाकृषि निर्यात को बढ़ाने के लिए ठोस रणनीतियां भी अपनाई गई हैं, फिर भीनिवेशकों की उदासीनता चिंता का विषय बनी हुई है।

मध्यप्रदेश की कृषि क्षमता को देखते हुए यह समझना आवश्यक है कि निवेशक कृषि आधारित उद्योगों में रुचि क्यों नहीं दिखा रहे हैं। प्रदेश में 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है, जिसे अगले पांच वर्षों में 32 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने और उत्पादन को 500 लाख टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। प्रदेश के कुछ उत्पाद, जैसे रियावन लहसुन और सुंदरजा आम, वैश्विक बाजार में पहचान बना चुके हैं। जैविक खेती के क्षेत्र में भी इसकी हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक है। इसके बावजूदइस क्षेत्र में निवेशकों की भागीदारी नहीं दिख रही, जबकि कृषि और कृषि आधारित उद्योग जीआईएस का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था।

राज्य सरकार ने निवेश आकर्षित करने के लिए सिंगल विंडो प्रणाली लागू की है और कई नीतियां बनाई हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव निवेशकों को लुभाने में सफल नहीं हो पा रहा है। निवेशकों के लिए आवश्यक अधोसंरचना और सुविधाओं की कमी भी एक प्रमुख कारण है। अन्य राज्यों में बेहतर नीतियां, सुविधाएं और प्रोत्साहन योजनाएं निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं, जिससे मध्यप्रदेश पिछड़ रहा है। इस प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए राज्य को अपनी नीतियों में सुधार करना और निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण बनाना जरूरी है।

कृषि आधारित उद्योगों में निवेश की कमी का एक अन्य कारण किसानों और उद्योगपतियों के बीच समन्वय की कमी है। फसल उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और विपणन तक की प्रक्रिया में विभिन्न चुनौतियां मौजूद हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सरकार को मध्यस्थ की भूमिका निभानी होगी। किसानों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान करने के साथ-साथ उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि क्षेत्र में नवाचार और आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए किसानों को सब्सिडी दी जा रही है, जिससे कृषि कार्य अधिक कुशल और उत्पादक बन सके। जैविक खेती को बढ़ावा देने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही, औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि किसानों की आय बढ़ाई जा सके।

इन सभी प्रयासों के बावजूद कृषि आधारित उद्योगों में निवेशकों की रुचि कम बनी हुई है। सरकार को न केवल अपनी नीतियों की समीक्षा करनी होगी, बल्कि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ठोस कदम भी उठाने होंगे। उन्हें बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा देने के साथ-साथ कृषि आधारित उद्योगों की संभावनाओं से भी अवगत कराना आवश्यक है।

प्रदेश के कृषि क्षेत्र में निरंतर सुधार हो रहा है, लेकिन कृषि आधारित उद्योगों में निवेश की कमी राज्य की आर्थिक संभावनाओं को सीमित कर रही है। कृषि विकेंद्रीकृत क्षेत्र है, जिसमें ग्राम स्तर पर बड़े पैमाने पर श्रम बल लगता है, जिससे रोजगार का सृजन होता है। कृषि आधारित उद्योगों को क्लस्टर आधारित बढ़ावा देने से ग्रामीण युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।

सरकार को चाहिए कि वह निवेशकों के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएं लेकर आए और उन्हें राज्य में निवेश करने के लिए प्रेरित करे। किसानों और उद्यमियों के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए नए मंचों का निर्माण करना आवश्यक है, जिससे कृषि उत्पादन और औद्योगीकरण के बीच संतुलन स्थापित हो सके। सरकार को नीतिगत सुधार, अधोसंरचना विकास, निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण और किसानों एवं उद्योगपतियों के बीच समन्वय बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। तभी राज्य की कृषि क्षमता का पूर्ण उपयोग हो सकेगा और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। (संवाद)