गौरतलब है कि टिंट स्वे म्यान्मार के निर्वाचित सांसद हैं, लेकिन वहां मिलिटरी जन्ता द्वारा सत्ता हथियाने के बाद वे अपना देश छोड़कर भारत में रह रहे हैं. उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि भारत के लोग लोकतंत्र प्रेमी हैं. अनेक राजनैतिक पार्टियां भी म्यान्मार में लोकतंत्र की कामना करती हैं और वे मिलिटरी जन्ता के पक्ष में नहीं हैं. इसके बावजूद भारत सरकार ने म्यान्मार की मिलीटरी जन्ता के साथ सहयोग का रवैया अपनाकर उसे मजबूती प्रदान करने का काम किया है.

भारत म्यान्मार के साथ अपना आर्थिक सहयोग बढ़ा रहा है. वह उसकी बंगाल की खाड़ी में गैस और तेल की खोज में मदद भी कर रहा है. यह सब हो रहा है लुक ईस्ट नीति के तहत. जब केन्द्र में एनडीए की सरकार थी और जार्ज फर्नांंडीज रक्षा मंत्री थे, तो दोनों देशों के संबंध सुधरने प्रारंभ हुए थे. बाद की यूपीए सरकार ने भी वह क्रम जारी रखा.

आखिर भारत एक सैनिक तानाशाह से अपना संबंध ठीक क्यों रखना चाहता है? इसका सबसे बड़ा कारण यही हो सकता है कि भारत इस मामले में चीन के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है. यह सच है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिशद ने म्यान्मार की मिलिटरी जन्ता के खिलाफ अबतक 30 प्रस्ताव पारित किए हैं. यह भी सच है कि अमेरिका तथा यूरोपीय संघ ने म्यान्मार पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा रखे हैं, लेकिन यह भी सच है कि चीन म्यान्मार के साथ अपना संबंध लगातार मधुर बना रहा है.

चीन ही नहीं, रूस और आस्ट्रेलिया भी म्यान्मार के साथ अपना संबंध प्रगाढ़ बना रहा है. इसका कारण यह है कि म्यान्मार के पास गैस और तेल का विपुल भंडार है. बांग्लादेश ने भी अपने संबंध बहुत ही बेहतर बना लिए हैं. वैसी हालत में भारत अपने आपको पीछे कैसे रख सकता है.

चीन भारत को चारों तरफ से घ्रेर रहा है. उसकी इस सामरिक नीति में म्यान्मार का प्रमुख स्थान है. वैसी हालत में भारत कैसे पीछे रह सकता है. जाहिर है चीन के साथ सामरिक प्रतिस्पर्धा भी भारत को म्यान्मार की मिलिट्री जन्ता के साथ अपना संबंध बेहतर बनाने के लिए बाध्य करता है. (संवाद)