हाल ही में राज्यसभा के हुए द्विवर्षीय चुनावों में यह देखने को मिला। सभी राजनीतिक दलों के लोकसभा चुनावों में हारे हुए चाहे वे कांग्रेस हो या फिर भाजपा या क्षेत्रीय दल उनके नेताओं ने इन चुनावों में अपना भाग्य आजमाया तथा विजयश्री प्राप्त की।

कई नेताओं ने अपनी छवि से ही पार्टी की छवि बरकरार रखी तथा धन की वर्षा और ताकत की जोर आजमाइश करके अपने आपको राजनैतिक तौर पर पुख्ता साबित किया। कई राजनीतिज्ञों ने अपनी वर्षों की बनाई पहचान कर भी भरपूर फायदा उठाया और निर्विरोध चुनाव जीत गए। पत्रकार, ओद्योगिक घरानों से, कानूनविद् तथा राजनीतिक तौर अपनी पहचान बनाने वाले या तो चुनकर आते है या फिर सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होकर संसद में प्रवेश करते हैं। लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने लोकसभा हार के बाद राजद व जनता दल यू के सहयोग से राज्य सभा का चुनाव जीता। कई विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति में सबकुछ चलता है। इन चुनावों में चुनावी विष्लेशणों को भी झूठा साबित कर राम जेठमलानी और राम विलास पासवान अपनी जीत हासिल करने में कामयाब हुए यह बात दीगर है कि यह सब कैसे हुआ?

अब राम विलास पासवान की निगाहें मंत्री पद पर हैं। लेकिन देखना यह है कि यूपीए के नेता उन्हें अब इस बात के लिए वाजिब मानते हैं या नहीं। डा0 मनमोहन सिंह जब जुलाई में अपने मंत्रीमण्डल का विस्तार करेंगे तभी यह पता चलेगा कि उनकी इस टीम में रामविलास पासवान शामिल होंगे या नहीं। वैसे भी ममता का मन अब केन्द्र में नहीं लग रहा है और पश्चिम बंगाल की राजनीति में वे अपना सिक्का जमाने के लिए अपनी पूरी राजनीतिक ताकत उसी राज्य में लगा देने के लिए पूरा समय उसमें लगाए और सरकार से अपनी विदाई मांगे।

पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा पर ममता बनर्जी की निगाहें टिकी होने के कारण भी मन्त्रिमण्डल से विदाई ले ले और रामविलास पासवान के जगह खाली कर दे। दूसरी तरफ रामविलास भी अपने पूर्व मन्त्रालय या फिर रेल मन्त्रालय पर अपनी निगाहें टिकाए हुए हैं। ये उनका सपना कब पूरा होगा यह आने वाले विस्तार पर ही निर्भर करता है।