अब विधानसभा के आमचुनाव सिर पर हैं, लेकिन कांग्रेस की स्थिति सुधरने के बजाय और भी बिगड़ी हुई दिखाई दे रही है। इस महीने की 5 और 10 तारीख को बंद का आयोजन किया गया था, दोनों बंद महंगाई के खिलाफ ही थे और दोनों में मुख्य निशाना कांग्रेस ही बनी। दो सफल बंदों ने कांग्रेस को जमीनी स्तर पर कमजोर करने का ही काम किया है और लोगों में यह अहसास जोर पकड़ रहा है कि कमरतोड़ महंगाई के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। लोगों के इस अहसास के कारण विपक्ष में होने के बावजूद कांग्रेस विपक्षी दल को मिलने वाला फायदा नहीं उठा पा रही है।

पिछले लोकसभा चुनाव के समय अनिल कुमार शर्मा पार्टी के अध्यक्ष थे। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी का बिहार प्रभारी जगदीश टाइटलर को बनाया गया। गिरीश संघी बिहार के पीआरओ बने, जिनका काम राज्य में संगठन के चुनाव करवाना था। तीनों मिलकर कांग्रेस के लिए उपयुक्त माहौल बनाने मे जुटे हुए थे, लेकिन पार्टी के अंदर से ही तीनों के खिलाफ विद्रोह के स्वर उभरने लगे।

सबसे ज्यादा विरोध अनिल शर्मा का ही हो रहा था। वे पार्टी को लोगों के स्तर पर तो विश्वसनीय विकल्प के रूप मे पेश करने के लिए प्रयत्नशील थे, लेकिन अपनी पार्टी के प्रदेश नेताओं के साथ ही उनका तालमेल बिगड़ गया। इसके कारण उनका विरोध तेज हो गया। पार्टी के लगभग सभी नेता उनके खिलाफ हो गए। वैसे माहौल में उन्हें बनाए रखना कांग्रेस आलाकमान के लिए संभव ही नहीं था।

इसलिए उन्हें हटाना कांग्रेस की मजबूरी थी, लेकिन उन्हें हटाकर जिस व्यक्ति को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया, वे अब तक कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए हैं और बिहार की राजनीति मे अभी तक अपनी कोई खाय पहचान भी नहीं बना पाए हैं। इसके कारण कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं में उत्साह का वह माहौल नहीं बन पा रहा है, जो पार्टी के प्रति मतदाताओं में विश्वास पैदा कर सके।

आखिर कांग्रेस बिहार में कमजोर क्यों पड़ रही है? लोकसभा चुनाव के बाद जो माहौल बनता जा रहा था, वह क्यों बिगड़ रहा है? क्या इसके लिए प्रदेश पार्टी का अंतर्कलह ओर नेतृत्व में किया गया बदलाव है? इसमें दो मत नहीं कि पार्टी के अंतर्कलह ने उका बहुत नुकसान किया है। गुटबंदी के कारण राहुल गांधी भी बिहार में बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। लेकिन नेताओं के अंतर्कलह और गुटबंदी के अलावा अन्य अनेक कारण भी हैं, जिन्होंने कांग्रेस का बुरा हाल कर रखा है।

पार्टी फिर से मजबूत बने, इसके लिए मुसलमानों का समर्थन मिलना उसे जरूरी है। लालू के बिहार की सत्ता से हटने के बाद मुसलमान कांग्रेस की ओर मुखातिब होने लगे थे। लोकसभा चुनाव में यह साफ तौर पर देखा जा सकता था। कांग्रेस की ओर मुसलमानों के मुखातिब होने से भी जो प्रवृत्ति ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी, थी, उनका लालू यादव से दूर भागना। मुसलमान लालू से जितना दूर भागते कांग्रेस को उतना ही फायदा होता, क्योंकि नीतीश के लाख प्रयासों में बाद भी वे उनकी पार्टी से भाजपा के कारण जुड़ नहीं सकते।

लेकिन कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक राज्य सभा में पारित करवाकर बिहार के मुसलमानों को एक बार फिर लालू यादव की ओर धकेल दिया। राज्य सभा में जिन सांसदों को मार्शल की सहायता से उठाकर बाहर फेंका गया था, उनमें से दो सांसद बिहार के मुसलमान ही थे। दरअसल मुस्लिम समुदाय महिला आरक्षण का सख्त विरोधी है। कहने को तो वे आरक्षण के वर्तमान विधेयक का विरोध करने की बात करते हैं और कहते हैं कि महिलाओं के आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण किया जाय, लेकिन एक औसत मुसलमान महिला आरक्षण का ही विरोधी है। महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने के लिए कांग्रेस जितनी कोशिश कर रही थी, उतनी ही कोशिश लालू यादव इसे पारित होने से रोकने के लिए कर रहे थे। जाहिर है मुसलमानों ने फिर लालू यादव को ही अपना मुख्य हितैषी मानान शुरू कर दिया है।

बिहार मे मुस्लिम आबादी 2001 की जनगणना के अनुसार कुल आबादी का साढ़े 16 प्रतिशत है। अनेक विधानसभा क्षेत्रों मे उनकी संख्या 33 फीसदी से भी ज्यादा है। मुस्लिम यादव गठजोड़ बनाकर लालू यादव उनकी सहायता से चुनाव जीतने की रणनीति बनाते रहे हैं और जब तब उन्हें अन्य पिछड़्रे वर्गों का समर्थन मिलता था, तो यह गठबंधन उन्हें भारी जीत दिलाता था। जब से गैर यादव पिठड़े वर्गो का विश्वास लालू ने गंवाया हैख् तब से उनकी एमवाई गठबंधन पहले की तरह काम नहीं करता, लेकिन उनकी राजनीति का मुख्य आधार अब यही गठबंधन रह गया है। मुसलमानों के दूर जाते दिखाई देने के बाद लालू की राजनीति भी खत्म होती दिखाई पड़ रही थी, लेकिन महिला आरक्षण विधेयक ने लालू की राजनीति को फिर से जिंदा कर दिया है, क्योंकि बिहार के मुसलमानों की पहली पसंद फिर से राजद अध्यक्ष ही बन गए हैं। इसके साथ ही कांग्रेस की हवा खराब हो गई है।

पार्टी को मुसलमानों का समर्थन मिले, इसके लिए ही कांग्रेस ने अपना नया अध्यक्ष एक मुसलमान को ही बनाया, लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि उन्होंने अब तक अपना कोई करिश्माई रूप नहीं दिखाया है और महिला आरक्षण पर मुसलमानों की कांग्रेस से नाराजगी को वे दूर कर भी नहीं सकते।

मुसलमानों के अलावा अगड़ी जातियों के फिर से कांग्रेस में आने की संभावना भी बनने लगी थी। अगड़ी जाजियों के लोग लालू के विराध में वोट डालते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होने भाजपा और नीतीश के गठबंणन का साथ दिया था। अब वे नीतीश से भी नाराज हैं, इसलिए वे कांग्रेस की ओर फिर से वापस लौटने का संकेत दे रहे थे। लेकिन वे कांग्रेस की ओर तभी आएंगे, जब उन्हें कांग्रेस जीतती दिखाई देगी। यदि मुसलमान कांग्रेस की ओर लौटंे, तभी वे उनके साथ मिलकर कांग्रेस का जिता सकते हैं। अब जब मुसलमान ही कांग्रेस से मुह मोड़ रहे हैं, तो फिर उनके कांग्रेस के साथ जुड़ने की संभावना पर कौन यकीन करेगा?

यानी कांग्रेस आज वहीं खड़ी है जहां वह पिछले 15 सालों से बिाहर में खड़ी है। अब तो उसके साथ लालू यादव भी नहीं हैख् जिनकी सहायता से वह पिछले कुछ चुनावों में कुछ सीटें जीत लेती थीं। उसके पास चुनाव जीतने के लिए कोई सामाजिक आधार भी नहीं है। कुछ ही महीनों के अंदर बिहार विधानसभा का चुनाव होने वाला है। वैसी हालत में कांग्रेस क्या कुछ कर पाएगी, इसके बारे मंे अनमान लगाना कठिन नहीं है। (संवाद)