कविताएं समकालीन जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को रेखांकित करती हैं। कहीं चरम आशावादिता है तो कहीं घोर निराशा। लेकिन इस संग्रह की खास बात है कवि की अंतरमन की खोज।
समाज की विषमताओं के प्रति स्वाभाविक आक्रोश अनेक कविताओं में देखने को मिलता है। कहीं विषाद ने अपना स्थान बनाया है तो कहीं सब कुछ नष्ट हो जाने की आशंका है। बदहाली पर भी कवि दुखी नजर आते हैं। लेकिन जीने की अदम्य आकांक्षा और कवि की संवेदनाएं एक गहरी अंतरकथा की ओर पाठकों को खींच ले जाती हैं।
इसके पूर्व 'क्योंकि आशंका सार्थक है' नाम से प्रकाशित काव्य-संग्रह कवि के शुरुआती आत्म मंथन के दौर से जुड़ा था जबकि यह कविता संग्रह उसी आंतरिक खोज का विस्तार है।
इस कविता संग्रह का प्रकाशन अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर ने किया है।
पिरामिड और एक परछाईं
आशा और निराशा के बीच
पाठकों से सीधी बात करती कविताएं
ज्ञान पाठक - 2008-02-21 17:47
पिरामिड और एक परछाईं रांची विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के पूर्व प्राध्यापक केशव प्रसाद की हाल की कविताओं का संग्रह है जिसमें कवि अपने पाठकों से सीधी बातचीत करते हैं।