राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव दिन-ब-दिन और तीखा होता जा रहा है। ऐसा पहले भी हुआ करता था परंतु टकराव इस स्तर का नहीं होता था जिससे देश का संघीय ढांचा कमजोर हो जाए। इसलिए इस विषय पर चिंतन आवश्यक है। क्या कोई ऐसा तरीका हो सकता है जिससे चुनी हुई सरकारों और राज्यपालों के बीच संबंध मधुर बने रहें।
जिन मुद्दों पर टकराव होता है वे मुख्य रूप से चार हैं। पहला, जब सरकार चुनी जाती है उसके बाद नई विधानसभा के पहले सत्र में राज्यपाल का भाषण होता है। दूसरा, प्रत्येक वर्ष बजट सत्र के पहले दिन भी राज्यपाल का भाषण होता है। इसमें होता यह है कि चुनी हुई सरकार भाषण में ऐसी चीजें डाल देती है जो केन्द्र सरकार को पंसद नहीं होतीं। राज्यपाल चूंकि केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है और लगभग केन्द्र सरकार का एजन्ट होता है इसलिए राज्यपाल को भाषण का वह हिस्सा पढ़ने में दिक्कत होती है। वे कहते हैं कि यह हिस्सा काट दो और चुनी हुई सरकार कहती है कि यह हिस्सा नहीं काटा जाएगा, यह हमारी नीति है, यह हमारे उद्देश्य हैं। ऐसी स्थिति बंगाल में भी हुई, तमिलनाडु में भी हुई और बहुत पहले जवाहरलाल नेहरू के समय केरल में हुई थी। इस स्थिति का निवारण कैसे हो इस पर विचार आवश्यक है। क्या राज्यपाल, केन्द्र सरकार के एजन्ट बने रहें? या वे चुनी हुई राज्य सरकार की इच्छानुसार चलें?
संविधान के निर्माता अम्बेडकर की राय थी कि राज्यपाल को बिना किसी काटछांट के वह भाषण पढ़ना चाहिए जो उन्हें सरकार ने सौंपा है। इस विषय पर कई बार चर्चा हो चुकी है। कई बार सुप्रीम कोर्ट में भी यह विषय आ चुका है। उसका निवारण आवश्यक है ताकि हमारे देश का संघीय ढांचा बना रहे।
विवाद का दूसरा क्षेत्र है, विधेयक। संविधान में प्रावधान है कि राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक उस समय तक कानून का रूप नहीं लेगा जब तक उसपर राज्यपाल के हस्ताक्षर न हो जाएं। यह भी प्रावधान किया गया है कि राज्यपाल यदि विधेयक की कुछ बातों को पसंद नहीं करते तो वे उस विधेयक को फिर से राज्य सरकार के विचारार्थ भेजेंगे। यदि राज्य सरकार उस विधेयक पर विचार करके फिर से राज्यपाल को भेज देती है तो राज्यपाल के लिए उस विधेयक पर हस्ताक्षर करना लगभग अनिवार्य होता है।
कुछ मामलों में यदि राज्यपाल चाहें तो ऐसे विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज सकते हैं। परंतु स्थिति तब बहुत उलझ जाती है जब राज्यपाल न तो हस्ताक्षर करते हैं और ना ही विधेयक को फिर से विचारार्थ भेजते हैं। ऐसी उलझन को कैसे सुलझाया जा सकता है? अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपनी राय दी है। यदि यह राय सभी राजनीतिक पार्टियों को पसंद आती है तो हमारा संघीय ढांचा बना रहेगा और यदि पसंद नहीं आती तो निश्चित रूप से हमारे संघीय ढांचे को चोट पहुंचेगी।
तीसरा मसला है राज्यों के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति का। राज्यपाल मानते हैं कि कुलपति कौन बने इस मामले में उनकी चलनी चाहिए। राज्य सरकार को इसमें दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह की स्थितियां भी कई राज्यों में आईं हैं। कुछ दिन पहले केरल में ऐसी स्थिति आई। विश्वविद्यालयों के खर्च की पूर्ति राज्य सरकार करती है। विश्वविद्यालय पर नियंत्रण राज्य सरकार का रहता है। मगर कुलपति की नियुक्ति राज्यपाल करता है। इस स्थिति का भी निवारण होना चाहिए। यह भी किया जा सकता है कि राज्यपाल को न सिर्फ नियुक्ति करने का अधिकार हो बल्कि विश्वविद्यालय को कितना पैसा दिया जाए, कितनी सुविधाएं दी जाएं, इन मामलों में भी अंतिम निर्णय उनका ही हो।
कभी-कभी ऐसी स्थिति आ जाती है कि राज्य सरकार को त्वरित कोई कदम उठाने की आवश्यकता होती है। इस तरह का कदम उठाने के लिए उसके पास विधानसभा का सत्र बुलाने का समय भी नहीं होता। ऐसी स्थिति में अध्यादेश जारी किये जाते हैं। अध्यादेश एक सीमित समय के लिए ही होता है। कई मामलों में राज्यपाल अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से ही मना कर देते हैं। कुछ मामलों में यदि वे हस्ताक्षर करते भी हैं तो जब अध्यादेश को कानून बनाकर फिर उनके सामने पेश किया जाता है तो वे उस पर हस्ताक्षर करने से मना कर देते हैं। कभी-कभी राज्यपाल हस्ताक्षर कर भी देते हैं और इस तरह के अध्यादेश जारी किए जाते हैं।
कभी-कभी टकराव की स्थितियां उस समय भी बन जाती हैं जब दिल्ली और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हो। मुझे ऐसी कुछ स्थितियां याद आ रही हैं। जब मध्यप्रदेश में श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री और सत्य नारायण सिन्हा राज्यपाल थे उस दरम्यान ऐसे अवसर आए जब दोनों के बीच टकराव की स्थिति बन गई। यहां तक कि दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के लिए निर्धारित कक्ष का आवंटन श्यामाचरण शुक्ल, सत्यनारायण सिन्हा के लिए नहीं करते थे और उन्हें मजबूरन या तो राष्ट्रपति भवन या किसी दूसरी जगह ठहरना पड़ता था।
उत्तरप्रदेश में मोतीलाल वोरा राज्यपाल थे और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे। एक दिन मुलायम सिंह की प्रेस कान्फ्रेंस थी। उस समय मैं मोतीलाल वोरा का मेहमान था और राजभवन में रुका हुआ था। मैंने उनसे पूछा कि क्या आप मेरा प्रेस कान्फ्रेंस में जाने का इंतजाम कर देंगे? उन्होंने कहा कि कोई समस्या नहीं है। प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान एक पत्रकार ने मुलायम सिंह यादव से पूछा कि राज्यपाल वोरा जी प्रदेश का भ्रमण करते हैं, अधिकारियों को बुलाते हैं, उन्हें आदेश देते हैं और जब उनके आदेश आपकी मंशा के विपरीत होते है तो आपको कैसा लगता है? तब मुलायम सिंह ने संविधान की प्रति मंगायी और संविधान के उस प्रावधान को पढ़ा जिसमें यह कहा गया है कि मुख्यमंत्री और उनका मंत्रिमंडल उस समय तक अस्तित्व में रहेगा जब तक राज्यपाल की मर्जी है।
मुलायम सिंह ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर वे राज्यपाल की इस व्यवस्था को पसंद करते हैं। यदि राज्यपाल जनहित में प्रदेश का शासन चला रहे हैं तो मुझे क्या दिक्कत है। मुझे अच्छा लगता है कि राज्यपाल मेरी दिक्कतों को कम कर रहे हैं, प्रशासन चलाने में मेरी सहायता कर रहे हैं। इससे मुझे राजनीति करने की फुर्सत मिल जाती है। तो आप लोग इस सवाल को लेकर चिंतित न हों, आखिरकार राज्यपाल मेरे बॉस हैं और यदि वे मेरे हित में अच्छा काम करते हैं तो मुझे क्या आपत्ति है।
कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि राज्यपाल की क्या हैसियत हो, उसके क्या अधिकार हों, कौन उसे नियुक्त करे, और कैसे यह सुनिश्चित हो कि अगर राज्य में दूसरी पार्टी की सरकार है तो सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव की स्थिति न बन जाए। इन सभी मुद्दों पर विचार की जरूरत है। मेरी राय में राज्यपाल को बहुत विद्वान व्यक्ति होना चाहिए। परंतु इन सभी मुद्दों पर विचार करने के लिए आवश्यकता है। संविधान के प्रावधान और व्यवहार में उनके अनुपालन में आने वाली समस्याओं का हल खोजा जाना जरूरी है। (संवाद)
दिनोदिन तीखा होता जा रहा है राज्यपालों और विपक्षी राज्य सरकारों के बीच टकराव
देश के संघीय ढांचे को बचाने के लिए इस समस्या का समाधान होना चाहिए
एल.एस. हरदेनिया - 2026-02-03 11:16 UTC
इन दिनों कई राज्यों के राज्यपाल महोदयों और वहां की चुनी हुई सरकारों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। ये राज्य मुख्यतः वे हैं जहां केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी का राज नहीं है और उसकी विरोधी पार्टियों की सरकार है। ऐसे राज्यों में इस समय तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्य शामिल हैं।