सबसे आम समस्या यह है कि भिखारी भीख मांगने के इतने आदी हो चुके हैं कि वे वास्तव में काम करना पसंद नहीं करते। इसके अलावा उनमें से कई लोग भीख मांगकर काम करने की तुलना में अधिक पैसा कमाते हैं। ऐसे में भिखारियों से मुक्त देश का सपना पूरी तरह सच होना अभी एक बहुत बड़ा लक्ष्य है। हालांकि इसकी शुरुआत हो चुकी है। मध्य प्रदेश का इंदौर देश का पहला भिखारी-मुक्त शहर बन चुका है। वहीं, सांची के अधिकारियों के अधिकारियों के अनुसार उनके क्षेत्र में एक भी भिखारी नहीं है। कुछ वर्ष पहले केंद्र सरकार ने भिक्षावृत्ति मुक्त भारत अभियान के तहत 30 प्रमुख पर्यटन स्थलों और धार्मिक शहरों को मुक्त बनाने की योजना लागू की थी। इनमें उत्तर प्रदेश के अयोध्या और मध्य प्रदेश के उज्जैन जैसे 10 धार्मिक स्थल शामिल हैं। सामाजिक न्याय मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार वर्ष 2026 तक यहां से भिखारियों को विस्थापित किया जाएगा।

भारत के कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में भिखारियों की संख्या अधिक है। सरकारी जनगणना (2011) के अनुसार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक भिखारी हैं। उत्तर प्रदेश में बाल भिक्षावृत्ति विशेष रूप से प्रचलित है , जबकि पश्चिम बंगाल में विकलांग भिखारियों की संख्या अधिक है। आंध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान , महाराष्ट्र, असम और ओडिशा में भी भिखारियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है।समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने संसद में जो आंकड़े दिए है उसके अनुसार 23 अक्टूबर .2023 से अब तक, भिक्षावृत्ति में लगे कुल 31,055 व्यक्तियों की पहचान की गई है। इनमें से 9,855 व्यक्तियों को जिसमें 2,480 बच्चे शामिल हैं, स्माइल (सपोर्ट फॉर मार्जिनलाइज्ड इंडिविजुअल्स फॉर लाइवलीहुड एंड एंटरप्राइज) की उप-योजना "भिक्षावृत्ति में लगे व्यक्तियों का व्यापक पुनर्वास’’ के द्वारा उन सबको पुनर्वासित किया गया है।
इसी मंत्रालय द्वारा 24 से 26 अप्रैल 2026 तक चंडीगढ़ में राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के साथ आयोजित चिंतन शिविर के दौरान स्माइल-बेगरी सर्वे मोबाइल एप्लिकेशन का शुभारंभ भी किया गया।यह मोबाइल एप्लिकेशन स्माइल-भिक्षावृत्ति उप-योजना (भिक्षावृत्ति में संलग्न व्यक्तियों का व्यापक पुनर्वास) के अंतर्गत विकसित की गई है। इस ऐप पर भिक्षावृत्ति में लिप्त पाए जाने वाले लोगों की पहचान कर उसे अपडेट किया जाएगा।

भारत में भिखारियों की स्थिति गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जुड़ी है। यह समस्या गरीबी, बेरोजगारी, शारीरिक अक्षमता और कभी-कभी संगठित आपराधिक गिरोहों (माफिया) द्वारा शोषण का परिणाम है, जो कमजोर लोगों और बच्चों से जबरन भीख मंगवाते हैं। भिक्षावृत्ति के मुख्य कारण गरीबी और बेरोजगारी है। गांवों से शहरों की ओर पलायन करने वाले कई लोग जब आजीविका पाने में असफल रहते हैं, तो भीख मांगना उनके लिए मजबूरी बन जाता है।अक्षमता और बीमारी के कारण भी भीख मांगना किसी की मजबूरी बन जाती है।शारीरिक रूप से विकलांग या मानसिक रूप से बीमार लोग, जिन्हें अन्य रोजगार नहीं मिल पाते, वे अक्सर भीख पर निर्भर हो जाते हैं। बड़े शहरों में कई संगठित गिरोह भी सक्रिय होते है। बच्चों और महिलाओं का अपहरण करके या उन्हें नशीली दवाएं देकर संगठित माफिया द्वारा भीख मंगवाई जाती हैे।

सामान्य तौर पर, भिखारियों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। एक वे जो मजबूरी में भीख मांगते हैं, और दूसरे वे जिन्होंने भीख मांगने की कला में महारत हासिल कर ली है और इससे अच्छी खासी रकम कमाते हैं। किसी विशेष क्षेत्र में भीख मांगने का अधिकार पाने के लिए, प्रत्येक भिखारी अपनी कमाई गिरोह के सरगना को सौंप देता है, जो उसका एक बड़ा हिस्सा अपने पास रख लेता है। यहां तक कि भिखारियों द्वारा अधिक पैसे पाने के लिए जानबूझकर खुद को घायल और कुरूप करने के मामले भी सामने आए हैं। भिखारी अपनी भीख मांगने को और अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए माताओं से प्रतिदिन शिशुओं को किराए पर लेते हैं। वे इन शिशुओं (जो बेहोश होते हैं और उनकी बाहों में बेजान लटके रहते हैं) को बीमार बता कर भीख मांगते हैं।

इसके अलावा, भारत में कई बच्चों का अपहरण कर उन्हें भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। भारतीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार , हर साल 40,000 तक बच्चों का अपहरण होता है। इनमें से 10,000 से अधिक बच्चों का कोई पता नहीं चल पाता। इतना ही नहीं, अनुमान है कि पूरे भारत में बच्चों को नशीली दवाएं दी जाती हैं, पीटा जाता है और उनसे भीख मंगवाई जाती है। यह करोड़ों का धंधा है जिस पर मानव तस्करी गिरोहों का नियंत्रण है। पुलिस इस समस्या को सुलझाने के लिए कुछ खास कदम नहीं उठाती क्योंकि वे अक्सर मान लेते हैं कि बच्चे अपने परिवार के सदस्यों या उन्हें जानने वाले अन्य लोगों के साथ हैं। साथ ही, बाल भिखारियों से निपटने के कानूनों में भी विसंगतियां हैं। कई बच्चे इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सजा नहीं दी जा सकती।

भारत में भिक्षावृति को रोकने के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं है। केंद्र शासित प्रदेश और कई राज्य बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट जैसे अपने राज्य-विशिष्ट कानूनों के तहत भीख मांगने को दंडनीय अपराध मानते है। भारत के सर्वाेच्च न्यायालय ने वर्ष 2021 में सार्वजनिक स्थानों से भिक्षुकों को प्रतिबंधित किये जाने की मांग वाले एक लोकहित मुकदमे को खारिज़ कर दिया और निर्णय सुनाया कि भिक्षावृत्ति एक आपराधिक मुद्दा नहीं अपितु सामाजिक-आर्थिक समस्या है।

सरकारी आंकड़े में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है और वो ये कि भिखारियों की कुल जनसंख्या में हर चौथा भिखारी मुसलमान है। यानी भिखारियों की कुल जनसख्या में 25 फीसदी मुस्लिम हैं। आंकड़ो के मुताबिक भिखारियों में से 72.2 फीसदी हिंदू हैं और कुल जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी 79.8 फीसदी है।इसके अलावा धार्मिक आधार पर आंकड़ो की बात करें तो भारत की आबादी में ईसाईयों की जनसंख्या 2.3 फीसदी है और भिखारियों की जनसंख्या 0.88 फीसदी है। इसके अलावा कुल 3.7 लाख भिखारियों में 0.25 फीसदी बौद्ध, 0.45 फीसदी सिख और 0.06 फीसदी जैन हैं। आंकड़ो के मुताबिक मुस्लिम भिखारियों में महिलाओं की जनसंख्या सबसे ज्चादा है जबकि बाकी धर्मों के भिखारियों में मर्द ज्यादा हैं। औसतन कुल भिखारियों में 53.13 फीसदी पुरुष हैं और 46.87महिलाए हैं जबकि मुस्लिम भिखारियों में 43.61 फीसदी पुरुष और 56.38 फीसदी महिलाए हैं।

भिखारियों से मुक्त देश का सपना सपना कब साकार होगा? यह एक बहुत बड़ी और गहरी समस्या है। इसे खत्म करने के लिए गरीबी, अशिक्षा और रोजगार जैसे बड़े मुद्दों को सुलझाना जरूरी है।विभिन्न राज्यों में चल रही योजनाओं से रास्ता साफ हो रहा है, लेकिन पूरे देश को भिखारी-मुक्त बनाने के लिए अभी और समय और ठोस प्रयासों की जरूरत है।