समझौते पर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने 7 अगस्त को हस्ताक्षर किए थे, जो अपने आप में बहुत स्पष्ट है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक-दूसरे पर हमले को सभी पर हमला मानने का वादा किया है। मिस्र इस विचार पर बिना कोई पक्का वादा किए चर्चा कर रहा है, क्योंकि वह ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने उलझावों को लेकर सतर्क है। बांग्लादेश अब सार्वजनिक रूप से दिलचस्पी दिखाने वाला दूसरा देश बन गया है। मुश्किल से दो हफ़्ते पुराने गुट के लिए यह दिल्ली में किसी की भी उम्मीद से कहीं ज़्यादा तेज़ी से अपनी ओर ध्यान खींचने वाली बात है।

यह सब अचानक नहीं हुआ। मक्का समझौते से बहुत पहले से ही बांग्लादेश में तुर्की का प्रभाव बढ़ रहा था। अंकारा अब ढाका को सैन्य उपकरण आपूर्ति करने वाला चौथा सबसे बड़ा देश है। पिछले साल के आखिर में पाकिस्तान की सेना ने बांग्लादेशी सेना को प्रशिक्षण देना शुरू किया। 1971 के बाद से यह ऐसी पहली व्यवस्था थी, और यह बात उस देश के लिए बहुत मायने रखती है जिसने आज़ादी की लड़ाई पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ी गई थी।

खबरों के मुताबिक, तुर्की की खुफिया एजेंसी ने जमात-ए-इस्लामी के ढाका कार्यालय के नवीनीकरण के लिए पैसे दिए हैं और इस्लामी हस्तियों के लिए तुर्की के हथियार कारखानों के दौरे का इंतज़ाम किया है। विवरण चाहे जो भी हों, रूझान साफ है: अंकारा ने ढाका में रिश्ते बनाने में दो साल लगाए हैं, और रक्षा समझौता बस उन्हें औपचारिक रूप देता है।

यही वजह है कि भारत में अब पाकिस्तान को ही एकमात्र अहम कारक मानने के बजाय तुर्की को ज़्यादा बड़ी और तत्काल समस्या के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का यह कहना कि दक्षिण एशियाई चर्चाओं में तुर्की "नया ईरान" बन रहा है, दिल्ली के रणनीतिक समुदाय की अंकारा के बारे में सोच में आए बदलाव को दिखाता है। अब उसे स्वतंत्र सोच वाले दूर के नाटो सदस्य के तौर पर नहीं, बल्कि भारत के पूर्वी पड़ोस को नया रूप देने वाले एक सक्रिय खिलाड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। यह चिंता की एक नई श्रेणी है, और यह उस तरीके से मेल नहीं खाती जिसे दिल्ली दशकों से भारत-पाकिस्तान के मामलों में अपनाती रही है।

इस बात से ज़्यादा परेशानी इसलिए हो रही है क्योंकि मामला भूगोल से जुड़ा है। पाकिस्तान भारत के पश्चिम में है, उस सीमा के पार जिसे संभालना भारत ने पचास सालों में सीखा है - प्रतिरोध, राजनयिकता और लंबे समय के अनुभव के ज़रिए।

बांग्लादेश पूर्व में है और भारत के सबसे कमज़ोर इलाके 'चिकन्स नेक' गलियारे को घेरे हुए है: जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है, और उग्रवाद-प्रभावित राज्यों की एक पट्टी जो शांति बनाए रखने के लिए ढाका के सहयोग पर निर्भर रही है। भारत ने इस तरफ़ के दुश्मन बनने की स्थिति के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनायी थी, क्योंकि शेख हसीना के शासनकाल में पंद्रह सालों तक इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अगस्त 2024 में हसीना के सत्ता से हटने पर यह सोच रातों-रात बदल गई।

मक्का समझोते के बाद जो स्थिति बनी है, वह भारत के ख़िलाफ़ कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है, और इसमें शामिल कोई भी पक्ष इसे ऐसा नहीं बताता, और समझौते की भाषा भी यही कहती है कि यह किसी देश के ख़िलाफ़ नहीं है। लेकिन इरादा और असर एक ही चीज़ नहीं होते। अंकारा, इस्लामाबाद और ढाका की अंतरिम सरकार भारत के ख़िलाफ़ मिलकर काम कर रही हैं या नहीं, इसका व्यावहारिक नतीजा यह है कि भारत के पूर्वी सीमा पर एक ऐसा सुरक्षा ढांचा बन गया है जिसे भारत ने नहीं तैयार किया, जिस पर उसका नियंत्रण नहीं है और जिसका मुकाबला वह पुराने दौर के तरीकों से आसानी से नहीं कर सकता।

दिल्ली की अब तक की प्रतिक्रिया बहुत ज़्यादा आक्रामक नहीं रही है, और यह संयम जानबूझकर बरता गया है, न कि इसलिए कि भारत कुछ कर नहीं सकता। ज़्यादा शोर मचाने से ढाका और अंकारा को उनके दुष्प्रचार अभियान में जीत मिल सकती है, और उस "घेराबंदी" वाली बात को बल मिल सकता है जिसे पाकिस्तानी टिप्पणीकार पहले से ही फैला रहे हैं।

शांत राजनयिकता से विकल्प बने रहते हैं: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ बातचीत जारी रखना, खाड़ी देशों के साथ मज़बूत संबंध बनाना (जिनके पास आक्रामक अंकारा से निपटने के अपने कारण हैं), और - जैसा कि विश्लेषकों ने बताया है - इज़राइल के साथ बेहतर तालमेल बिठाना, क्योंकि सुन्नी-पहचान वाले गुट के संस्थागत रूप लेने को लेकर भारत और इज़राइल दोनों को ही चिंता है। इस दौरान मोदी और नेतन्याहू के बीच हुई बातचीत कोई आम बातचीत नहीं थी। दोनों देश इसी बदलाव को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति पर फिर से विचार कर रहे हैं।

बहुत ज़्यादा प्रतिक्रिया न देने की भी एक वजह है। मक्का समझौते की असलियत उसकी भाषा की तुलना में कमज़ोर है। नाटों का आर्टिकल 5 इसलिए काम करता है क्योंकि उसमें समेकित कमान ढांचा, संयुक्त सैन्य अभ्यास, और सात दशकों का संस्थागत भरोसा शामिल है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान में ऐसी कोई बात नहीं है। उनके खतरे को लेकर तीन अलग-अलग नज़रिए हैं - रियाद को ईरान की चिंता है, इस्लामाबाद का पूरा ध्यान भारत पर है और अंकारा पूर्वी भूमध्य सागर पर केंद्रित है - और वे किसी साझा दुश्मन के बजाय सुन्नी एकजुटता की वजह से साथ आए हैं।

साझा खतरे के बजाय साझा पहचान पर बने समझौते अक्सर तब कमज़ोर पड़ जाते हैं जब कोई असली संकट उनकी परीक्षा लेता है। मिस्र का इसमें शामिल होने से हिचकिचाना ही इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय देश इसकी सीमाएं समझते हैं।

लेकिन भारत किसी ऐसे समझौते के कमज़ोर बने रहने के भरोसे अपनी योजना नहीं बना सकता। उसे इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि अगर बांग्लादेश औपचारिक रूप से इस पर दस्तखत कर देता है, अगर ढाका को तुर्की से हथियारों की बिक्री और बढ़ती है, या अगर पाकिस्तानी सैन्य प्रशिक्षक सिर्फ़ एक बार की गतिविधि के बजाय स्थायी रूप से वहां मौजूद रहने लगते हैं, तो क्या होगा। इनमें से हर एक स्थिति को अलग-अलग संभाला जा सकता है। लेकिन एक साथ मिलकर, ये पूर्वी मोर्चे की एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो अब पहले जैसी स्थिर स्थिति नहीं रही।

इससे मिलने वाला बड़ा सबक भारत की अपने पड़ोस को लेकर बनी सोच के बारे में है। सालों तक, दिल्ली की क्षेत्रीय रणनीति यह मानकर चलती रही कि पाकिस्तान ही मुख्य दुश्मन बना रहेगा और बाकी सभी देश - बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका - भूगोल और आर्थिक निर्भरता के कारण अपने आप भारत के प्रभाव क्षेत्र में बने रहेंगे।

यह धारणा अब साफ़ तौर पर टूटती दिख रही है। छोटे देशों को पता चल रहा है कि उनके पास दूसरे साथी भी हो सकते हैं, और वे साथी - जिनमें तुर्की सबसे आगे है - उनके साथ जुड़ने के लिए राजनीतिक दांव लगाने को तैयार हैं। कबीर का बहुत सोच-समझकर दिया गया जवाब किसी गुट में शामिल होने का ऐलान नहीं है। यह एक देश द्वारा यह परखने की कोशिश है कि कई विकल्प होने से उसे कितना फ़ायदा मिल सकता है, और यही बात दिल्ली को किसी औपचारिक समझौते से कहीं ज़्यादा परेशान करने वाली होनी चाहिए।

यहां एक व्यापक रूझान भी है, जिसे समझने में भारत की पश्चिम एशिया नीति धीमी रही है। दिल्ली की खाड़ी नीति काफ़ी हद तक यूएई और इज़राइल पर टिकी रही है, और इसे मुख्य रूप से अमेरिका के साथ आईटूयूटू समूह के ज़रिए चलाया गया है। उस ढांचे में यह मान लिया गया था कि खाड़ी क्षेत्र का केंद्र-बिंदु मोटे तौर पर वहीं बना रहेगा जहां वह पिछले एक दशक से रहा है।

मक्का समझौता कुछ और ही संकेत देता है। सऊदी अरब अब तुर्की और पाकिस्तान - दो ऐसे देश जिनसे भारत ने ऐतिहासिक रूप से दूरी बनाए रखी है - के साथ मिलकर एक रक्षा ढांचा तैयार कर रहा है। इसका मतलब है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, वहां रहने वाले भारतीयों के हित और उसके व्यापारिक रास्ते - ये सभी और भी जटिल हो गये हैं। आर्थिक साझेदारी का मतलब रणनीतिक अहमियत नहीं होता, और इन दोनों के बीच के अंतर को अब नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।

भारत की प्रतिक्रिया सिर्फ़ जवाबी बयानबाज़ी या दबी-छुपी कूटनीति तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए ज़रूरी है कि बांग्लादेश और उसके पीछे चल रहे व्यापक पश्चिम एशियाई बदलाव को महज़ एक अस्थायी परेशानी के बजाय एक गंभीर रणनीतिक चुनौती के तौर पर देखा जाए। इसका मतलब है कि यूएई-इजरायल गठजोड़ से आगे बढ़कर खाड़ी देशों के सहयोगियों के साथ सुरक्षा के मामले में और गहरे संबंध बनाना; चुनाव का इंतज़ार करने के बजाय ढाका की अंतरिम सरकार से लगातार संपर्क बनाए रखना; और तुर्की के इरादों को पाकिस्तान से जुड़े पुराने नज़रिए से देखने के बजाय उन्हें सही ढंग से समझना। यह इलाका दिल्ली के आगे बढ़ने का इंतज़ार नहीं कर रहा है, और ऐसा लगता है कि बांग्लादेश भी नहीं। (संवाद)