सरकार का कहना है कि देश के सभी जिलों में किए गए हालिया सर्वेक्षण में हाथ से मैला ढोने वाला कोई व्यक्ति नहीं मिला, लेकिन सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) का दावा है कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर के कम से कम 46 जिलों में आज भी लोग सूखे शौचालयों से हाथ से मानव मल साफ कर रहे हैं।

इस विरोधाभास को दिल्ली में सफाई कर्मचारी आंदोलन के ‘इंडिया @ 80 : एंड मैनुअल स्कैवेंजिंग’ अभियान की शुरुआत के दौरान सामने आई गवाहियों ने फिर उजागर किया। इसमें अलग-अलग राज्यों से आए लोगों ने बताया कि वे आज भी सूखे शौचालयों की सफाई कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर की 70 वर्षीय मुसी देवी ने बताया कि उनका लगभग पूरा जीवन यह काम करते बीता है और आज भी उन्हें शौचालय साफ करने के लिए बुलाया जाता है। ऐसी गवाहियों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया ने अपने न्यायिक अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि इस मामले में सबसे बड़ी समस्या सरकारी तंत्र का इसके अस्तित्व से इनकार रही है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी. लोकुर भी अधिकारियों द्वारा समस्या के अस्तित्व से इनकार को गंभीर चिंता का विषय बताते हैं। उनका कहना है कि जहां भी सूखे शौचालय मौजूद हैं, उन्हें खत्म करना प्राथमिकता होनी चाहिए और इसे स्वच्छ भारत मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। पटना हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अंजना प्रकाश के मुताबिक इसे केवल कानून बनाकर खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए सरकार के साथ समाज को भी जातिगत मानसिकता बदलनी होगी।

हाथ से मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए 1993 में केंद्रीय कानून बनाया गया था। इसके बाद 2013 में अधिक व्यापक कानून लाया गया, जिसने मैनुअल स्कैवेंजिंग को प्रतिबंधित करने के साथ इसके लिए लोगों को काम पर लगाने को दंडनीय अपराध बनाया। 2013 और फिर 2018 में हुए सरकारी सर्वेक्षणों में देश में 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर चिह्नित किए गए थे। लेकिन यदि आज भी लोग सूखे शौचालयों से हाथ से मल साफ करने की बात कह रहे हैं, तो सवाल केवल कानून की मौजूदगी का नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन और सरकारी सर्वेक्षणों की वास्तविक स्थिति को पहचान पाने की क्षमता का भी है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन तीन दशकों से अधिक समय से इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उनका कहना है कि इतने सालों में बहुत कुछ बदला, लेकिन सूखे शौचालयों की हाथ से सफाई अब भी जारी है। वे उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर सरकार से नए सिरे से सर्वेक्षण कर इस प्रथा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

समस्या का दूसरा गंभीर पहलू सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान होने वाली मौतें हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान 332 सफाईकर्मियों की मौत हुई है। सरकारी आंकड़ों में हाथ से मैला ढोने और सीवर या सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया जाता है। सरकार मैनुअल स्कैवेंजिंग का कोई नया मामला नहीं मिलने की बात कहती है, जबकि सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान मौतें अलग से दर्ज होती हैं। इस वर्गीकरण पर सफाईकर्मियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि मानव मल साफ करने के लिए किसी व्यक्ति का सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरना भी इसी अमानवीय व्यवस्था का हिस्सा है और अलग परिभाषाओं के आधार पर इन मौतों को मैनुअल स्कैवेंजिंग के व्यापक सवाल से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।

27 जुलाई 2026 को डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने अपने निर्देशों के बावजूद मौतें जारी रहने पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत के सामने रखे गए संसदीय आंकड़ों के मुताबिक 2024 में 54 और 2025 में 46 मौतें हुई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने पांच राज्यों के मुख्य सचिवों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि उसके आदेशों का पालन नहीं होने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। अदालत ने राज्यों द्वारा ठेकेदारों पर जिम्मेदारी डालने पर भी साफ किया कि इस तरह जवाबदेही से नहीं बचा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट अक्टूबर 2023 के अपने फैसले में सीवर और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक सफाई रोकने और ऐसी मौत होने पर मृतक के परिजनों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने सहित कई निर्देश दे चुका है।

सरकार ने 2023-24 में नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम यानी ‘नमस्ते’ योजना शुरू की, जिसका उद्देश्य खतरनाक मैनुअल सफाई की जगह मशीनों का इस्तेमाल बढ़ाना और सफाईकर्मियों को सुरक्षा उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद मौतों का जारी रहना बताता है कि चुनौती योजनाएं बनाने से आगे उनके प्रभावी क्रियान्वयन की भी है।

आजादी के आठ दशक पूरे करने जा रहे भारत में सवाल केवल यह नहीं है कि सरकारी रिकॉर्ड में कितने मैनुअल स्कैवेंजर दर्ज हैं या कितने जिलों ने खुद को इससे मुक्त घोषित कर दिया है। सरकार को इस मुद्दे पर काम कर रहे संगठनों और सफाईकर्मियों के साथ बैठकर वास्तविक स्थिति की पहचान करनी होगी और जहां भी यह प्रथा मौजूद है, उसे खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। मुआवजा जरूरी है, लेकिन किसी सफाईकर्मी को सीवर में उतरकर अपनी जान गंवानी ही न पड़े, इसके लिए मशीनी सफाई की व्यवस्था को जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू करना होगा।