दीवाली से लेकर होली तक हम खाद्य पदार्थों विशेषकर मिठाइयों की दुकानों पर छापे की तथा उन्हें नष्ट करने की खबर पढते रहते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट से निपटने के लिए भारत के कानूनी ढांचे का पर एक नजर डालने पर पता चलता है कि मद्रास मिलावट निवारण अधिनियम 1918 से लेकर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए), 2013 तक बने हुए हैं।
खाद्य पदार्थों में मिलावट एक वैश्विक मुद्दा है जो मौजूदा कानूनों, नियमों और दिशा-निर्देशों के बावजूद औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों को प्रभावित करता है। एक बार मिलावटी उत्पाद आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश कर जाने के बाद उनका पता लगाना या उन्हें वापस मंगाना लगभग असंभव है। एक भी खराब नमूना सैकड़ों को प्रभावित कर सकता है।
राज्य सरकारें विक्रेताओं को लाइसेंस जारी करती हैं। लेकिन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न स्तरों पर मिलावटी उत्पादों की प्रभावी निगरानी और जांच के लिए सक्षम व्यवस्था नहीं की गयी है। जिस कारण भारत में खाद्य मिलावट एक गंभीर स्वास्थ्य और आर्थिक चुनौती बन चुकी है। दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले बुनियादी खाद्य पदार्थों जैसे दूध, घी, मसालों, तेल और अनाजों में मिलावट के मामले लगातार सामने आते रहते हैं।
भारत में दूध सबसे अधिक मिलावटी खाद्य उत्पादों में से एक है। मात्रा बढ़ाने के लिए अक्सर पानी मिलाया जाता है, लेकिन डिटर्जेंट, यूरिया, स्टार्च और हाइड्रोजन पेरोक्साइड जैसे अधिक चिंताजनक मिलावट वाले पदार्थ भी पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न मामलों में पाए गए हैं। घरों में घी को बहुत महत्व दिया जाता है, दुर्भाग्यवश यही कारण है कि यह मिलावट का निशाना बन जाता है। घी में सस्ते वसा, वनस्पति घी या अन्य तेल मिलाने से लाभप्रदता तो बढ़ सकती है, लेकिन इससे प्रामाणिकता और गुणवत्ता में काफी कमी आती है।
खाद्य पदार्थों में मिलावट न केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा तंत्र पर भी एक बड़ा बोझ है। डेयरी उत्पाद व दूध में पानी, यूरिया, डिटर्जेंट, स्टार्च और सिंथेटिक दूध की मिलावट सबसे आम है। मावा और पनीर में अक्सर सप्लीमेंट्स और स्टार्च मिलाया जाता है। पिसे हुए मसालों में लकड़ी का बुरादा, सिंथेटिक रंग, ईंट का पाउडर (लाल मिर्च में) और मेटानिल येलो (हल्दी में) मिलाया जाता है। खाने वाले तेलों में सस्ते आर्जिमोन तेल या मिनरल ऑयल की मिलावट देखी जाती है। अनाज और दालें, चावल और दालों में कंकड़-पत्थर, लेड क्रोमेट (चमक के लिए) और प्रतिबंधित रंगों का इस्तेमाल होता है। फल और सब्जियां इन्हें समय से पहले पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड और चमकदार दिखाने के लिए रासायनिक रंगों व मोम का धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है।
खाद्य पदार्थों में मिलावट से पाचन संबंधी विकार, एलर्जी, पोषण संबंधी कमियां, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली तथा कैंसर और यकृत क्षति जैसी दीर्घकालिक बीमारियों सहित कई स्वास्थ्य समस्यएं उत्पन्न हो सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष असुरक्षित भोजन के कारण लगभग 60 करोड़ लोग खाद्यजनित बीमारियों से प्रभावित होते हैं और 4.20 लाख लोगों की मृत्यु होती है। अधिकांश उपभोक्ता भोजन का मूल्यांकन उसकी दिखावट, सुगंध और कीमत के आधार पर करते हैं। दुर्भाग्यवश, बेईमान व्यापारी अक्सर इन्हीं कारकों का फायदा उठाकर मिलावटी भोजन बेचते हैं। समस्या यह है कि उपभोक्ता अक्सर चटख रंगों को ताजगी और गुणवत्ता से जोड़ते हैं। वास्तविकता में, अत्यधिक चमकीले रंग कभी-कभी बेहतर गुणवत्ता का संकेत होने के बजाय चेतावनी का संकेत हो सकते हैं। कुछ अनधिकृत रंगों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से लीवर को नुकसान, गुर्दे की विषाक्तता, बच्चों में व्यवहार संबंधी प्रभाव और यहां तक कि कैंसर के संभावित खतरे भी जुड़े हुए हैं।
इसलिए विश्वसनीय और प्रतिष्ठित स्रोतों से ही भोजन सामाग्री खरीदना चाहिए। खरीदने से पहले लेबल को ध्यान से पढ़ें। वैध लाइसेंस और विनिर्माण संबंधी विवरण देखें। ऐसे उत्पादों से सावधान रहें जो असामान्य रूप से चमकीले दिखते हों या जिनकी कीमत बाजार मूल्य से काफी कम हो। अविश्वसनीय स्रोतों से खुले उत्पाद खरीदने से बचें। संदिग्ध उत्पादों की सूचना खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को दें। खाद्य सुरक्षा एक साझा जिम्मेदारी है। नियामक, निर्माता, खुदरा विक्रेता, वैज्ञानिक और उपभोक्ता सभी की इसमें भूमिका है।क्योंकि अंततः, भोजन का उद्देश्य लोगों का पोषण करना होना चाहिए, न कि उनके स्वास्थ्य को खतरे में डालना।
खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के मार्ग में कई बड़ी बाधाएं हैं, जिनमें देश में आधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं की भारी कमी भी शामिल है। स्वीकृत पदों की तुलना में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की संख्या बहुत कम होने के कारण भी नियमित निरीक्षण नहीं हो पाता। धीमी कानूनी प्रक्रिया और ढीला प्रवर्तन के कारण मिलावटखोरों के खिलाफ मामले सालों तक अदालतों में लटके रहते हैं। न्याय में देरी और कम जुर्माने के कारण अपराधियों में कानून का डर नहीं रहता। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार द्वारा समुचित कदम उठाने के अलावा निर्माताओं, व्यापारियों और उपभोक्ताओं की सामूहिक सहभागिता की आवश्यकता है। जब तक सख्त कानून, आधुनिक तकनीक और जागरूक नागरिक एक साथ नहीं आएंगे, तब तक एक सुरक्षित और स्वस्थ भारत का सपना अधूरा रहेगा।
देश में मिलावटी खाद्य पदार्थो की बिक्री रोकने में अक्षम हैं सरकारें
एस एन वर्मा - 2026-09-17 15:21 UTC
मानसून के जाते ही अगले कुछ महीनों तक देश में त्योहारों का मौसम रहेगा। त्योहारों के दिनों में हमारे घरों एवं रसोइयों में मिठाइयों व विभिन्न तरह के स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू भरी होती है। लेकिन ये रुचिकर व सुगंधित भोजन से उबकाई तब लगने लगती है जब यह पता चलता है कि ये सब मिलावटी व दूषित खाद्य पदार्थो से बने हुए हैं। मानवाधिकार आयोग के अनुसार देश के प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ और रोगमुक्त जीवन जीने का अधिकार है लेकिन सरकार के ढिलमूल रवैये के कारण हमारे इस अधिकार का हनन हो रहा है।