20 सितम्बर को दिल्ली से देहरादून के रास्ते में कई जगह पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता ने जिस हर्षौल्लास तथा गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, उससे भाजपा नेतृत्व में बेचैनी छा गई है। प्रदेश कांग्रेस का एक गुट विशेष भी असहज दिखता है।

भाजपा यह समझ नहीं पा रही है कि प्रदेश की राजनीति के इस वरिष्ठतम राजनेता के मुकाबले किसको मैदान में उतारें क्योंकि उनके बराबर कद का कोई भी नेता राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियों में नहीं है।

रावत की वापसी कांग्रेस आलाकमान द्वारा इनका इस्तीफा खारिज किए जाने और उनको चुनाव प्रचार में सक्रिय रूप से शामिल होने के निर्देश दिए जाने क बाद हुई है।

इससे कांग्रेस को लाभ तो मिलेगा ही साथ ही चुनावी लड़ाई भी कांटे की हो सकती है क्योंकि मुख्यमंत्री पुष्कर धामी, हरीश रावत के मुकाबले मुश्किल से ही चुनाव मैदान में ठहर पाएंगे। ऊपर से एक दशक लंबी जनता की नाराजगी अलग से धामी को परेशान किये हुए है। कारण, मुख्यमंत्री और उनकी सरकार का भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा होना।

हरीश रावत पिछले दो महीनों से दिल्ली में स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। उनके दिल्ली प्रवास के दौरान इस अफवाह ने ज़ोर पकड़ लिया कि रावत को पार्टी नेतृत्व ने स्थायी अवकाश लेने संबंधी आदेश दिया है।

लेकिन दिल्ली से देहरादून सड़क मार्ग पर मुज्जफरनगर, नारसन, मंगलौर, रुड़की, हरिद्वार और देहरादून में जिस उल्लास तथा गर्मजोशी से उनका स्वागत किया गया, उसने उन तमाम अटकलों और अफवाहों पर विराम लगा दिया।

रावत के इस जबरदस्त स्वागत से यह साफ प्रकट होता है कि जनता ने ईडी द्वारा हाल में उनके एक सहयोगी के निवास स्थान पर मारे गए छापे को एक सिरे से नकार दिया है। लोगों ने इस सरकारी कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित माना है।

"हरीश रावतजी हमारे मार्गदर्शक, वरिष्ठ और सबसे अनुभवी नेता हैं। उत्तराखंड की राजनीति में उनकी वापसी कांग्रेस और प्रदेश दोनों के लिए संजीवनी का काम करेगी, " यह कहना है प्रदेश कांग्रेस की प्रवक्ता गरिमा दसोनी का।

रावत की वापसी से सबसे ज्यादा हड़बड़ाहट पार्टी के भीतर एक गुट विशेष में देखी गई है जो यह दावा कर रहा था कि हरीश रावत प्रांत की राजनीति के हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। लेकिन रावत ने देहरादून पहुंचते ही यह ऐलान करके विरोधियों के दावों की पोल खोल दी कि वह न केवल पार्टी को जिताएंगे बल्कि धामी की भ्रष्ट सरकार को भी उखाड़ फेंकेंगे।

"हमारे शहीदों ने जैसे उत्तराखंड की कल्पना की थी और जिसके लिए उन्होंने कुर्बानियां दीं थी, वह आज बिखर रही है। हम ऐसा नहीं होने देंगे और राज्य को सही दिशा में ले जाकर उनके सपनों को साकार करेंगे," यह बात उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान इस संवाददाता से एक बातचीत में कही।

उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के लौटने से सबसे ज्यादा घबराहट प्रदेश भाजपा में है जिसके कारण पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश पार्टी स्तर पर आमूलचूल परिवर्तन करने तथा आधे से ज्यादा वर्तमान विधायकों के टिकट काटने का विचार बना रहा है। इस आशय की चर्चा देहरादून के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों जोर पकड़े हुए है।

राज्य में हुए पिछले दो विधान सभा चुनावों की भांति ही कांग्रेस के खिलाफ भाजपा ने वही रणनीति अपनाई है जिससे वह जीत के प्रति आश्वस्त हो जाती है। इस रणनीति का केंद्रबिंदु है सफल मीडिया प्रबंधन।

इस तिकड़मबाजी के जरिए भाजपा प्रदेश के लगभग सभी छोटे बड़े टीवी चैनलों में फर्जी सर्वेक्षण जारी करवाती है कि कांग्रेस उत्तराखंड में जीत के काफी निकट है। बस दो या चार सीट की मामूली बढ़त है। इससे कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता निश्चिंत होकर घर बैठ जाते हैं और भाजपा चुनाव जीत जाती है।

तिकड़म तो भाजपा ने इस बार भी वही लगाई है। लेकिन अबकी जनता के बीच फर्क साफ देखा जा सकता है। रुड़की से हरिद्वार, मंगलौर और डोईवाला के रास्ते देहरादून आदि जगहों पर आम लोगों से इस मुद्दे पर सवाल पूछे जाने पर वो बिना किसी लाग लपेट के तत्काल इन सर्वेक्षणों को धोखाधड़ी करार दे देते हैं।