इसके साथ ही, सीईसी और ईसी की नियुक्ति के लिए 2023 के अधिनियम से जुड़े मामले में एक नया मोड़ आया है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के एक जज ने बंटा हुआ फ़ैसला दिया था, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से कानून के तहत सीईसी को उनकी नियुक्ति के मामले में भी मदद मिली। आरोप है कि जज का बेटा सीईसी के वकीलों के पैनल में शामिल हैं। मामला इसलिए भी पेचीदा है क्योंकि उसी जज ने हाल ही में सीईसी ज्ञानेश कुमार की बेटी और नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम को राहत देते हुए एक फ़ैसला सुनाया था। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा लगाई गई सख़्त टिप्पणियों और 5 लाख रुपये के जुर्माने पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान शामिल एक छात्रा एक्टिविस्ट को एनएसए के तहत हिरासत में लिए जाने के मामले को रद्द कर दिया था।
हालांकि आम धारणा यह है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार अब तक सर्वोच्च न्यायायल और उच्च् न्यायालयों में अपने और अपने निर्णयों से जुड़े मामलों को सफलतापूर्वक संभालते रहे हैं। लेकिन आने वाले कुछ दिनों में उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है जब इन मामलों की सुनवाई होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके कई फ़ैसलों को बाकी दो चुनाव आयुक्तों ने भी 'ग़ैर-कानूनी' और 'बिना अधिकार के लिए गए फ़ैसले' बताया था, जबकि उन्होंने अपने फ़ैसलों को ईसीआई के सर्वसम्मत फ़ैसले के तौर पर पेश किया था। 2 अक्टूबर के बाद जब सीईसी के खिलाफ़ आंदोलन तेज़ हो गयी है, तो इसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। इसमें न सिर्फ़ इंडिया ब्लॉक की पार्टियां, बल्कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के बैनर तले जेन जेड, सिविल सोसाइटी और आम लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं।
सीईसी के खिलाफ़ यह आंदोलन, जो असल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाता है, अब एक नए और मज़बूत चरण में प्रवेश कर रहा है। पहले वोट चोरी का मुद्दा सिर्फ़ कांग्रेस का था, लेकिन अब यह पूरे इंडिया ब्लॉक का मुद्दा बन गया है। इस हफ़्ते 2 से 8 अक्टूबर तक देशव्यापी "लोकतंत्र बचाओ" विरोध प्रदर्शन होंगे, 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसद ईसीआई तक मार्च करेंगे, सीजेपी ने 2 अक्टूबर से "जेल भरो" आंदोलन और प्रदर्शन शुरू कर दिया है, और देश के सभी ज़िलों में कई अन्य विरोध रैलियां होंगी। चूंकि यह सीईसी के खिलाफ़ एक संयुक्त अभियान होगा - जो असल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ है - इसलिए यह अब तक के ऐसे किसी भी आंदोलन से ज़्यादा मज़बूत होगा।
चुनावी आख्यान में बदलाव साफ़ दिख रहा है। अगले साल की शुरुआत में होने वाले अहम राज्य चुनावों से ठीक पहले "वोट चोरी" का नारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाता है। विपक्ष ने सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के साथ-साथ प्रधान मंत्री के इस्तीफ़े की भी मांग की है। इंडिया ब्लॉक ने इस आंदोलन को न सिर्फ़ सड़कों पर, बल्कि संसद और अदालतों तक भी ले जाने की योजना बनाई है। वे 'सीईसी और अन्य ईसी नियुक्ति अधिनियम 2023' की धारा 16 को भी चुनौती देने की योजना बना रहे हैं, जो सीईसी को मुकदमों या उनके खिलाफ कार्रवाई से आजीवन सुरक्षा देती है।
यह हफ़्ता सीईसी ज्ञानेश कुमार के लिए मुश्किल भरा होगा, क्योंकि उन्हें ईसीआई के भीतर संस्थागत अलगाव महसूस हो रहा है। वहां दो चुनाव आयुक्त उनके सभी फ़ैसलों का समर्थन नहीं कर रहे हैं, खासकर उन फ़ैसलों का जो "ग़ैर-कानूनी" और "अनधिकृत" हैं। विश्वसनीयता खोने के कारण, उन्हें आयोग के भीतर, न्यायपालिका में और देश भर में राजनीतिक स्तर पर मामलों से निपटने में मुश्किल होगी। उनके अतीत, वर्तमान और भविष्य के कामों की जांच न्यायपालिका, राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी और उन सभी लोगों द्वारा की जाएगी जो देश के चुनावी लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं।
इसलिए, सीईसी के लिए सबसे बड़ी समस्या ज़रूरी नहीं कि विरोध प्रदर्शन ही हों। अब यह साबित करने की ज़रूरत बढ़ती जा रही है कि आयोग के फ़ैसले स्वतंत्र जांच, अंदरूनी असहमति, न्यायिक जांच और जनता की नज़र में खरे उतर सकते हैं।
इन सभी बातों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी बहुत महत्व है, क्योंकि ईसीआई, सीईसी, और एसआईआर से जुड़ी राजनीतिक कहानी अब उनके नियंत्रण में नहीं है। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति समिति से हटा दिया था और सीईसी के तौर पर ज्ञानेंद्र कुमार को नियुक्त किया था, जिन पर आरोप है कि वे उनके इशारों पर काम करते हैं तथा एसआईआर लागू किया और अब तक वोटर लिस्ट से 13.3 करोड़ से ज़्यादा वोट हटाने जैसे "ग़ैर-क़ानूनी" और "बिना अधिकार के" फ़ैसले लिए हैं। कई राज्यों में, वोटरों के नाम हटाने और जोड़ने से भाजपा को चुनाव जीतने में मदद मिली। भाजपा ईसीआई का बचाव कर रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि भारत के नागरिकों के वोट देने का अधिकार छिनने की वजह से भाजपा अपनी राजनीतिक पकड़ खो रही है।
यह मुद्दा धीरे-धीरे सीईसी ज्ञानेंद्र कुमार पर व्यक्तिगत आरोपों से आगे बढ़कर संस्थागत जवाबदेही और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा की तरफ़ से वोट की चोरी तक पहुंच गया है। जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात है, तो किसी खास सरकारी नीति के बजाय चुनावी व्यवस्था की वैधता पर हमला बहुत नुकसानदेह है और राजनीतिक रूप से इसके नतीजे कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं। इसके कारण भाजपा को बचाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, लेकिन इस बार बचाव कमज़ोर हो गया है।
इस हफ़्ते न्यायिक घटनाक्रम इसलिए भी अहम हैं क्योंकि तीन अलग-अलग कानूनी सवाल अब एक साथ आ गए हैं: (1) ईसीआई और सीईसी का संवैधानिक दर्जा और सामूहिक कामकाज, (2) नियुक्तियों से जुड़े 2023 के कानून की वैधता, और (3) क्या एसआईआर के फ़ैसले और वोटरों के नाम हटाने का काम असल में कानूनी तौर पर ज़रूरी संस्थागत प्रक्रिया के ज़रिए किया गया था। सुप्रीम कोर्ट इन्हीं सवालों की जांच करने के लिए सहमत हो गया है, जिसमें सीईसी ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका भी शामिल है।
सीईसी और ईसी की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून का मामला भी दूसरे न्यायिक चरण में पहुंच गया है, जिसमें 23 सितंबर के बंटे हुए फ़ैसले में एक नया मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट में एक क्यूरेटिव याचिका दायर की गई है, जिसमें बेंच में शामिल दो जजों में से एक के बेटे की भूमिका का आरोप लगाया गया है।
वोटरों के नाम हटाने का मुद्दा अब और भी खास हो गया है। क्या ईसीआई ने वोटरों के नाम हटाते समय कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों का पालन किया? क्या ईसीआई ने अपने नियमों का पालन किया? क्या ईसीआई के फ़ैसले असल में तीन-सदस्यीय आयोग के फ़ैसले थे? ऐसे और भी सवाल हैं।
5 अक्टूबर को बॉम्बे उच्च न्यायालय की सुनवाई भी अहम है, क्योंकि इसमें इस सवाल की जांच की जाएगी - महाराष्ट्र के एसआईआर में असल में क्या हुआ था और क्या ईसीआई के विवादित आदेश प्रक्रिया या कानून के हिसाब से सही थे? गोवा बेंच इस बात की जांच कर रही है - क्या अलग-अलग वोटरों के नाम असल में कानूनी प्रक्रिया के ज़रिए हटाए गए थे? कलकत्ता, तेलंगाना और दूसरे हाई कोर्ट इस सवाल की जांच कर रहे हैं - वोटर लिस्ट गलत होने पर किसी वोटर के पास क्या उपाय है? इन सभी मामलों के नतीजे सीईसी और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी चर्चा पर और असर डालेंगे। (संवाद)
भारत में नया राजनीतिक आख्यान – ‘प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मोहरे हैं सीईसी ज्ञानेश कुमार'
मुख्य चुनाव आयुक्त के विरोध में बढ़ता आंदोलन और अगले हफ़्ते आने वाले कानूनी मोड़
डॉ. ज्ञान पाठक - 2026-10-03 10:31 UTC
विपक्षी इंडिया गठबंधन का नया राजनीतिक आख्यान यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मोहरे हैं, जिनके ज़रिए भारत के चुनावी लोकतंत्र को अगुवा कर लिया गया है। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि भाजपा सीईसी ज्ञानेश कुमार और प्रधान मंत्री मोदी का बचाव करने की पूरी कोशिश कर रही है, क्योंकि अब प्रधान मंत्री मोदी सीधे तौर पर इंडिया गठबंधन के निशाने पर हैं। 2 अक्टूबर से सीईसी के विरोध में आंदोलन तेज़ हो गया है, जो पूरे हफ़्ते यानी 8 अक्टूबर तक चलेगा। इसके अलावा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों, खासकर बॉम्बे उच्च न्यायालय में सीईसी और मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के ख़िलाफ़ कई मामलों की सुनवाई होगी।