शुक्रवार, 22 सितम्बर 2006

आतंकवाद के खिलाफ भारतीय संघर्ष

कहानी का एक नया मोड़

ज्ञान पाठक

आतंकवाद के खिलाफ भारतीय संघर्ष की कहानी में एक और नया मोड़ आया है। भारत के प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने एक संयुक्त बयान जारी किया है कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ एस साझा संस्थागत ढांचा बनायेंगे और सूचनाओं का आदान प्रदान करेंगे।

इस मोड़ पर हम कैसे आये, और नेपथ्य में कौन भूमिका अदा कर रहा है आदि पर काफी कुछ प्रसारित और प्रकाशित किया जा रहा है। लेकिन आगे यह कहानी कौन सी मोड़ लेगी इसका अंदाजा किसी को नहीं है। स्वयं आतंकवाद का स्वरुप बदल गया है, उसका उद्देश्य बदल गया है।

भारत की नयी मुश्किलें यहीं से पैदा हो सकती हैं, और पुरानी मुश्किलें तो कायम हैं ही। आतंकवाद के पुराने स्वरुप में पाकिस्तान और उसकी गुप्तचर एजंसी आई एस आई ही जड़ है। जम्मू और कश्मीर में आतंकवादियों को सीमा पार से भेजा जाता रहा है। पाकिस्तान का इस भारतीय राज्य के एक हिस्से पर अवैध कब्जा है और वह येन-केन प्रकारेण पूरा राज्य अपने हिस्से में चाहता है। पिछले दरवाजे से आजाद कश्मीर की वकालत करते हुए वह अपना उद्देश्य हासिल करना चाहता है और इसी के लिए उसने यह पूरा आतंकवाद चलाया। इस आतंकवाद में अब ‘इस्लामी आतंकवादी संगठनों’ के आतंकवादियों के शामिल होने की खबरें भारत के लिए नयी चिंता का कारण है। अर्थात यदि पाकिस्तान और आई एस आई भारत के अनुकूल आचरण करने भी लगें, जैसी की संभावना नहीं है, तो भी आतंकवाद का एक नया मोर्चा खुला हुआ है, जिसे आजकल अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद कहा जाता है।

भारत और पाकिस्तान नेतृत्वों ने जो साझे आतंकवाद विरोधी ढांचे का प्रस्ताव किया है उसके मूल में आखिर क्या है? यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि भारत वास्तव में किस आतंकवाद की गुप्तचर सूचनाएं पाकिस्तान से हासिल करने में कामयाब हो सकेगा – अल कायदा के नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय मुस्लिम आतंकवाद की या पाक-आई एस आई द्वारा भारत में संचालित आतंकवाद की।

वैसे किसी भी तरह के आतंकवाद संबंधी सूचनाएं भारत के लिए फायदेमंद हो सकती है, यदि वे सही हों। लेकिन भारत की सुरक्षा एजंसियां पाक सुरक्षा एजंसियों द्वारा दी जाने वाली सूचनाओं पर उतना भरोसा नहीं कर सकतीं जितना कि अन्य मित्र राष्ट्रों द्वारा दी गयी सूचनाओं पर।

उधर पाकिस्तानी गुप्तचर एजंसियां और सरकार के अधिकारी भी ऐसी ही आशंकाओं के शिकार रहने को विवश हैं, विशेषकर वे जो भारत के खिलाफ अपनी धरती से आतंकवादी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं और आगे भी ऐसा करने का इरादा रखते हैं। उन्हें यदि भारत द्वारा गुप्त सूचनाएं भी मुहैया करवायी गयीं तो उनकी क्षमता और भी विनाशकारी होगी।

भारत का पिछला अनुभव बताता है कि यह पाकिस्तान के नेतृत्व की बातों का भरोसा नहीं कर सकता क्योंकि यही वह राष्ट्र है जिसके प्रधान मंत्री एक ओर दोस्ती का समझौता करते हैं तथा सेना ठीक उसी समय हमला कर रही होती है। कारगिल युद्ध के इस उदाहरण का उल्लेख करना महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि उस समय पाकिस्तान सेना का नेतृत्व परवेज मुशर्रफ ही कर रहे थे।

यह सही है कि इस समय परवेज मुशर्रफ पर अमेरिका का भारी दबाव है और वहां के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने सार्वजनिक तौर पर यह भी कह दिया है कि ओसामा की खोज में वह पाकिस्तान में भी सेना भेजने में नहीं झिझकेंगे, भारत को इस बात पर टेक नहीं रखनी चाहिए। अमेरिका की बात कुछ और है, वह पाकिस्तान को समझौता करने और किये गये समझौते को पालन करने के लिए वाध्य कर सकता है, पर भारत नहीं। अमेरिका अपने हितों के लिए ऐसा कर सकता है लेकिन भारत के हितों के लिए भी वह ऐसा ही करे जरुरी नहीं। हम गत 17 वर्षों से पाकिस्तान संचालित आतंकवाद का सामना कर रहे हैं और अमेरिका इस अवधि में पाकिस्तान का सामरिक दोस्त रहा है। उसके द्वारा दिये गये हथियारों का इस्तेमाल पाकिस्तान ने मूलतः भारत के खिलाफ ही किया है। अमेरिका हमारा नया दोस्त बन रहा है जो हमारे दुश्मन राष्ट्र का पुराना दोस्त है।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की ऐसी ही उलझी हुई स्थिति में भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के संयुक्त बयान को लेना चाहिए और साथ में यह भी मानकर चलना चाहिए कि अनेक बातों की जानकारियां अभी सार्वजनिक नहीं हुई हैं।

लेकिन तब सवाल उठता है कि क्या भारत धीरे-धीरे पाकिस्तानी शातिर चालों में फंसता जा रहा है? अधिकांश लोग महसूसते हैं कि भारत फंसता जा रहा है और एक न एक दिन भारत के नेता भारत की जम्मू और कश्मीर वाली धरती का एक बड़ा भाग पाकिस्तान को सौंप देंगे। भारत में आतंकवाद के समाप्त होने की संभावना तब भी शायद न हो, विशेषकर हमारे नेतृत्व की लचर सोच और अक्षमताओं के कारण।

भारत में अधिकांश विश्लेषकों की राय है कि संयुक्त आतंकवाद विरोधी ढांचा खड़ा करने का समझौता करने के पहले भारत को यह सुनिश्चत कर लेना चाहिए था कि पाकिस्तान और आई एस आई भारत की धरती पर आतंकवादी गतिविधियों को अब संचालित नहीं कर रहे हैं।

भारत के नेताओं द्वारा कोई बड़ी आतंकवादी घटना होने पर महज यह कहने से काम नहीं चलेगा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवदी गतिविधियां चलाना बंद नहीं करता तब तक उससे बातचीत शुरु नहीं की जायेगी। उनपर कभी अमल नहीं किया जाता और पाकिस्तानी धरती से आतंकवाद संचालित होता रहता है।

उधर पाकिस्तान कभी भी अपना रुख नहीं बदलता। जम्मू और कश्मीर के आतंकवादियों को आधिकारिक तौर पर नैतिक समर्थन देने की बात वह करता रहा है और गुपचुप ढंग से उन्हें धन और हथियारों की मदद देता है। दुनिया के देश, अमेरिका समेत, उसकी इस हरकत पर चुप क्यों हैं? भारत को यह भी ध्यान रखना चाहिए।

यदि आतंकवाद को समाप्त करना है तो उसे किसी भी रुप में समर्थन देने वालों से बातचीत का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि इससे उस राष्ट्र की नीयत का पता चलता है। भारत किसी मुगालते में न रहे वही अच्छा।#