गुरुवार, 1 मार्च, 2007

केन्द्रीय बजट 2007 – 08 में खेती-बारी और किसान

छल-प्रपंच से सावधान, कथनी और करनी पर गौर फरमायें

ज्ञान पाठक

नई दिल्ली: केन्द्रीय मंत्री पी चिदम्बरम ने संसद में अपने बजट भाषण में जब कृषि क्षेत्र पर बोलना प्रारंभ किया तो सबसे पहले भारत के लिए कृषि को ही प्रमुख चुनौती बताया। उन्होंने भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु की एक उक्ति सामने रखी कि “सब कुछ इंतजार कर सकता है लेकिन खेती नहीं।” फिर इस विषय पर अंत में दक्षिण भारत के संत तिरुवल्लुर की उस उक्ति का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि खेत जोतने वाले हाथ पर हाथ रखकर बैठ जायें तो सारी दुनिया का त्याग करने का दावा करने वाले संत भी मोक्ष हासिल नहीं कर सकते। ध्यान रहे कि यह उस सरकार के वित्त मंत्री ने कहा है जिनकी नीतियों के कारण देश भर में हजारों किसान आत्महत्या करते रहे, देश ने जिसके शासनकाल में खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता खो दी और विदेशों से कृषि उपजें आयात कर देश के किसानों के लिए खेती को घाटे का सौदा बना दिया। अब खेती की जमीनें किसानों के हाथों से लेकर अन्य देशी-विदेशी धनवानों को खेती और अन्य कार्यों के लिए सौंपने की नीति अगली पंचवर्षीय योजना 2007 – 12 के लिए बनायी गयी है, तथा उन धनवानों को इसके लिए धन उपलब्ध कराने और उनके उनके द्वारा निगमित और अन्य कंपनी या सहकारिता किसानी में निवेश को कृषि क्षेत्र में सुधार का नाम दिया जा रहा है। ये उसी सरकार के वित्त मंत्री हैं जिसकी एक योजना यह भी है कि प्रखंड स्तर पर से ही किसानों से असीमित खरीद की व्यवस्था में धनवान देशी-विदेशी कंपनियों को छूट दी जाये और वे खरीदे गये सामान अन्यत्र निर्यात कर दें। नतीजे के तौर पर स्थानीय लोगों को वहीं की उपज खाने को नहीं मिल पायेगी, परंतु सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है।

पत्रकारों और अन्य सामान्य लोग तो महज इस बात से सरकार की तारीफ करने में लग गये हैं कि योजना में कृषि क्षेत्र के लिए ज्यादा धन का प्रावधान कर दिया गया है। वे सिर्फ बढ़े हुए आंकड़े से वाहवाही कर रहे हैं, और आने वाले दिनों में जनता की जो और दुर्गति होगी वह उन्हें नहीं दिखायी दे रही।

कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय किसान नीति बनी है, जिसके बारे में वित्त मंत्री ने बताया कि उसपर विचारण हो रहा है। अभी उसपर विचारण करने की फुर्सत सरकार को हुई नहीं, लेकिन वित्त मंत्री ने कहा कि उनके पास इस बजट में खेती-बारी को जीवनक्षम बनाने और किसानों को न्यूनतम शुद्ध आय सुनिश्चित करने के लिए कई प्रस्ताव हैं। बजट के प्रशंसकों ने यह सवाल पूछने की आवश्यकता नहीं समझी कि आखिर खेती के काम को इस दुर्दशा तक किसने पहुंचाया और अब यही गुनाहगार सरकार उसे जीवित रखने के तथाकथित प्रस्ताव क्यों रख रही है? उनसे यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि जब तक छोटे किसान खेती करें तो उनके खिलाफ नीतियां क्यों बनीं और अब बड़े धनवान खेती में उतरना चाहते हैं तो सारी नीतियों को इन बड़ों के पक्ष में क्यों मोड़ा जा रहा है? यदि शब्दकोश में छल की परिभाषा देखें तो ऐसे ही कार्यों को तो छल-प्रपंच की संज्ञा दी गयी है।

किसानों को बैंक या संस्थागत कर्ज ज्यादा उपलब्ध कराये जाने की बात एक लंबे समय से की जाती रही है क्योंकि जिन किसानों ने आत्महत्या कि उनपर कर्ज का बोझ काफी ज्यादा पाया गया था। लेकिन तथ्य यह है कि उद्योगों की तुलना में ज्यादा कठिन शर्तों और ब्याज पर ही किसानों को कर्ज दिया जाता है। कहा गया कि किसानों को इस साल 50,000 करोड़ रुपये ज्याद कर्ज की व्यवस्था की गयी है। यदि कर्ज लेने देने को व्यवसाय के रुप में देखें तो कृषि क्षेत्र से बैंकों को ज्यादा लाभ मिलने की संभावना पर वित्त मंत्री का ध्यान गया है। सवाल पूछा जा सकता है कि यदि कृषि क्षेत्र की आप तरक्की चाहते हैं तो उसे भी उद्योगों की तरह उदार शर्तों और ब्याज पर कर्ज देने का प्रावधान क्यों नहीं किया जाता? आखिर उद्योगपति कर्ज की राशियां डकारकर भी कारों में कैसे घूमते हैं और किसान महज कुछ हजार रुपयों की कर्ज अदायगी न करने पर आत्महत्या करने को विवश कर दिये जाते हैं?

ध्यान रहे कि देश के चार राज्यों के 31 जिलों की पहचान की गयी है जिनमें किसान सर्वाधिक दुखी हैं। सरकार ने घोषणा की कि इन जिलों के लिए 16,979 करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। आंकड़ा आकर्षक है, लेकिन ध्यान रहे कि इनमें से 12,400 करोड़ रुपये नयी पुरानी सिंचाई परियोजनाओं के हैं। इन्हीं क्षेत्रों के लिए 153 करोड़ की लागत से दुधारु पशुओं के पालन की एक नयी योजना शुरु की गयी है ताकि किसानों को अतिरिक्त आय मिल सके। यह भी उन लोगों को आकर्षक लग सकता है जो पशुपालन का अनुभव नहीं रखते और यह नहीं जानते कि दशकों से किसान सरकारी धन से पशु लेते रहे हैं और उनके अधिकांश पशु मरते गये। पूरी योजना क्यों फेल हो गयी, इसका अनुभव नहीं रखने वाले भी इस योजना की प्रशंसा कर सकते हैं। लेकिन अनुभवी लोग जानते हैं कि ऐसी योजनाओं में किसान कर्ज के बोझ में और लद जाते हैं, स्थानीय और किसानों की परिस्थितियों विशेष में बाहर से पशु लाकर उनपर थोप दिये जाते हैं, व्यापारी और सरकारी अधिकारी, बीमा कंपनियों के लोग सभी मालामाल होते हैं।

किसानों के कर्ज के बोझ में लदने के बारे में एक समिति भी गठित की गयी थी लेकिन उसकी रपट अब तक आयी नहीं। इसलिए वित्त मंत्री महोदय के पास सिर्फ आश्वासन देने का काम रह गया था कि रपट आने पर सरकार कार्रवाई करेगी। उनसे यह सवाल पूछा जा सकता है कि अन्य मामलों में तो सरकार रपट आने के पहले की कदम उठाती रहती है, फिर जब हजारों की संख्या में किसान मर रहे हों तो आप चुप क्यों हैं? किसानों की मौतें आपके लिए आपातकालीन स्थिति क्यों नहीं है? वर्षों में रपट आयेगी और वर्षों विचारण के बाद आप उसपर कार्रवाई करेंगे?

वित्त मंत्री महोदय ने कहा कि दलहन का उत्पादन और उत्पादकता ठहर जाने से सरकार बड़ी चिंतित है। लेकिन उनका लक्ष्य देखिये। कहते हैं कि गुणवत्ता वाले सर्टिफायड बीजों की भारी कमी हो गयी है। उन्होंने पहले सरकारी संस्थानों और कार्यक्रमों का जिक्र कर लोगों को प्रसन्न किया और असली बात बाद में कह दी कि बीजों के उत्पादन बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी योजना जमा करने को कहा जायेगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार धन की व्यवस्था करायेगी और अनुदान देगी। वाह, यदि सरकारी स्वदेशी क्षेत्र में ही पहले से ऐसा कर दिया जाता तो आज की बदतर स्थिति न आती और दलहन गरीबों के लिए सपना न होता। आज, इन नये इरादे को वित्त मंत्री मिशन कह रहे हैं।

चाय, काफी, रबड़, मसालों, बादाम और नारियल की खेती के बारे में उन्होंने आश्वासन दिया कि विशेष उद्देश्य वाले कोश स्थापित किये जायेंगे जैसे चाय कोष का गठन किया गया है। सिंचाई के बारे में काफी व्यवस्था करने की बात कही गयी है, हजारों हजार करोड़ की। धीमी गति से चलने वाली इन परियोजनाओं में तेजी लाने का उन्होंने आश्वासन दिया, जैसा कि पहले भी दिया जाता रहा है, और जिन आश्वासनों पर कभी अमल नहीं होता। इस वित्त मंत्री के साथ भी हमारा ऐसा ही अनुभव है।

जल संसाधनों को बेहतर बनाने के लिए विश्व बैंक से कर्ज लेने की इसे पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने जलस्रोतों की सफाई और मरम्मत के लिए काफी कर्ज ले रखे हैं और वित्त मंत्री ने सभी राज्यों से कहा है कि वे कर्ज लेकर यह काम जल्द से जल्द दो वर्षों के भीतर करें। कर्नाटक उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की विश्व बैंक से बातचीत भी चल रही है।

गांवों में कुओं की खुदाई कराकर उसमें वर्षा का पानी भरने के लिए एक योजना की घोषणा की गयी है। कहा गया कि ऐसे कुएं 4000 रुपये में बनाये जायेंगे। यह भी बताया गया छोटे और सीमांत किसानों को उनकी जमीन में ऐसे कुओं की खुदाई के लिए शत प्रति शत सहायता दी जायेगी। बात सुनने में अच्छी लगती है यदि आपको यह नहीं मालूम हो कि एक कुएं की खुदाई में कितना पारिश्रमिक लग जायेगा, जमीन की कीमत क्या होगी, और सरकार की भूमिगत जल के उपयोग पर विश्व बैंक के इशारे पर शुल्क लेने की क्या नीति अंदर ही अंदर चल रही है। पेय पदार्थों का उत्पादन करने वाली कंपनियां किस तरह भूमिगत जल का भारी दोहन कर रही हैं और उनके लिए पानी की व्यवस्था में सरकार के अधिकारी कितने चुस्त रहते हैं, भले आम जनता को पानी मिले या न मिले।

ऐसा नहीं कि देश में पानी की समस्या नहीं है और इसके लिए कुछ नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन तब पानी की समस्या दूर करने के नाम पर कमाई के लिए रास्ता निकालने का काम बंद होना चाहिए। पानी सार्वजनिक संपत्ति है, उसका व्यापारिक उपयोग किन शर्तों पर हो यह निर्धारित करना पहली जरुरत है। यदि कोई इसके खरीद बिक्री से लाभ कमाता है तो उसकी समुचित भरपायी उस जनता को होनी चाहिए जिसकी वह सम्पत्ति है। उद्योगों, व्यवसायियों और शहरी जनता को जलसंसाधनों पर दादागिरी की छूट देने वाली जलसंसाधन व्यवस्था के लिए किये गये खर्च को भी कृषि नीति का खर्च कहना धोखा है।

किसानों को प्रशिक्षण, कृषि प्रौद्योगिकी के विस्तार, और रसायनिक खाद की सबसिडी उद्योगपितयों को देने की परम्परा समाप्त कर सीधे किसानों को सबसिडी देने के उपाय करने की बात की गयी। किसानों से नाम पर पिछले साल उद्योगपतियों को 22,452 करोड़ रुपये की खाद सबसिडी दी गयी, जो 17,253 करोड़ के लक्ष्य से ज्यादा है। अन्य सबसिडियों के बारे में इतनी बढ़ोतरी नहीं हुई, विशेषकर उनमें जिसमें धन सीधे आम व्यक्ति के पास जाता है, जैसे बिजली, पानी, खाद्यान्न, रसोई गैस आदि पर दी जाने वाली सबसिडियां।

यदि किसानों की भलाई करने का इरादा होता तो सारे देश में फसल बीमा लागू की जाती। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। #