शनिवार, 3 फरवरी, 2007
बुरे लोगों से साठगांठ और आम जनता का दमन
भारतीय सुरक्षा व्यवस्था का यह धब्बा मिटे तो कैसे
ज्ञान पाठक
एन एन वोहरा समिति की उस रपट के सरकारी ताक पर रखे जाने के लगभग अब एक दशक हो जायेंगे जिसमें कहा गया था कि अधिकारियों-राजनीतिज्ञों-अपराधियों के बीच एक साठगांठ है। उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया था और अब तक किसी भी सरकार ने उन लोगों को बेनकाब कर दंडित करने की कोशिश नहीं की। हां, इतना जरुर हुआ कि वोहरा साहब को राष्ट्रीय सम्मान हासिल हुआ, क्योंकि उन्होंने बड़ी बात कही थी। वैसे इस बड़ी बात से जनता पहले से ही वाकिफ थी।
विभिन्न स्तरों, स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक, सम्मान पाने वालों की सूची काफी लंबी है, और सम्मान इस बहाने दिया जाता है कि उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वाह बड़ी अच्छी तरह किया। प्रकारांतर से इसमें अंतर्निहित है कि हमारे देश में अधिकांश चूंकि अपने कर्तव्यों का निर्वाह ठीक ढंग से नहीं करते, इसलिए जो थोड़ा-बहुत ठीक ढंग से करते हैं उन्हें प्रोत्साहन दिया जाये ताकि और लोग भी पुरस्कार और सम्मान पाने के लिए कुछ बेहतर कर दिखायें।
लेकिन इस मामले में भी बुरे राजनीतिज्ञों और अधिकारियों ने अपना रास्ता निकाल लिया है। वे इसमें भी बाजी मार रहे हैं। काम भी बुरे करो और सम्मानित भी होवो। अच्छे अधिकारियों और व्यक्तियों के लिए सम्मान हासिल करना भी काफी जटिल बना दिया गया है। उन्हें हतोत्साहित, प्रताड़ित और दरकिनार कर दिया जाना एक सामान्य सी बात है। यही आम लोगों की पीड़ा है। दरअसल, यह एक मानवीय त्रासदी है। सत्ता, सम्पदा, और शोहरत पाने की लालसा से वे सारे दुष्कर्म करते जा रहे हैं, और वे जानते हैं कि इसके बावजूद उनको सम्मान भी मिलेगा।
अभी सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था की बात हो रही है, आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व्यवस्था की। देश भर में, कश्मीर से कन्याकुमारी और पूर्वोत्तर भारतीय सीमा से गुजरात तक, सुरक्षा व्यवस्था के कार्यनिष्पादन पर नजर डालने मात्र से ही निराशा हो जाती है। पुलिस और सेना के अधिकारियों और जवानों में एक अजीब सी मनोवृत्ति देखी जा रही है। बदतर होती जा रही कानून और व्यवस्था पर अंकुश डाल पाने में जहां एक ओर उन्हें भारी विफलता हासिल हुई है वहीं दूसरी ओर आम जनता के दमन की घटनाएं बढ़ती गयी हैं। इसके प्रमाण के लिए मानवाधिकार आयोग की रपटों में झांका जा सकता है।
आम लोगों की त्रासदी की नजर से देखें तो अपराधकर्मियों और आतंकवादियों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों और पुलिस तथा सुरक्षा बलों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों से होने वाली पीड़ा तो समान होती है। उन्हें तो दोनों से सुरक्षा चाहिए।
लेकिन जनता दोनों ओर से असुरक्षित है। अपराधियों और आतंकवादियों से मिलीभगत की रपटें आते रहती हैं। ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के निठारी कांड का है जिसमें गरीब बच्चे मारे जाते रहे और पुलिस अपराधियों को संरक्षण देती रही और पीड़ितों को ही जलील करती रही। सीमाक्षेत्रों में जम्मू और कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों में आतंकवादियों से सुरक्षा बलों के मालामाल हो जाने की खबरें भी आती रही हैं। पंजाब में तो आतंकवादियों ने एक पुलिस अधीक्षक को नकली रुपये की लाखों की गड्डियां तक दे दी थीं। ऐसी स्थिति में अच्छे पुलिस अधिकारियों और जवानों के लिए अपराधियों और आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करना भी काफी मुश्किल हो जाता है, लगभग असंभव। क्योंकि भेदिये सुरक्षा ढांचे के अंदर ही होते हैं।
लेकिन तब बुरे सुरक्षा अधिकारियों और जवानों को भी कार्रवाई दिखानी आवश्यक हो जाती है। इसलिए आम लोगों को फंसाकर और कई बार तो जान से मारकर कार्रवाई दिखा दी जाती है। उसके बाद ये ही अधिकारी रपट तैयार करते हैं और बताते हैं कि किस तरह उन्होंने कितनी बड़ी संख्या में अपराधियों और आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाइयां कीं। इस तरह ये बुरे अधिकारी और जवान स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर के सम्मान हासिल कर अच्छे अधिकारियों और जवानों की तुलना में बाजी मार लेते हैं। जनता इसे जानती है। जानती इसलिए भी है कि जब वे ऐसे बुरे सुरक्षा अधिकारियों और पुलिसकर्मियों से बचने के लिए मानवाधिकार की बात करती है तो उनपर ठप्पा लगा दिया जाता है कि ये अपराधियों और आतंकवादियों के पक्षधर हैं। अनेक लोग यह कहते हुए सुने जाते हैं कि आतंकवादी और अपराधकर्मी जब लोगों को मार रहे होते हैं तो ये मानवाधिकारी कहां छिपे रहते हैं ! इस पक्ष-विपक्ष में फिर जनहित खो जाता है।
यह निश्चित रुप से भारतीय आंतरिक और बाह्य सुरक्षा में लगे अधिकारियों और जवानों पर एक धब्बा है। आज ही भारत के एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र ने खबर दी है कि किस तरह सेना के दुष्ट अधिकारियों और जवानों ने आम लोगों की हत्या की और उन्हें आतंकवादी करार दिया, और यह सब किया गया पुरस्कार पाने के लिए, प्रोन्नतियां पाने के लिए।
ऐसी स्थिति में दो प्रमुख सवाल उभरकर सामने आते हैं। पहला यह कि इन बुरे अधिकारियों और जवानों को पुरस्कृत न होने देना कैसे सुनिश्चित की जाये, और दूसरा यह कि सुरक्षा व्यवस्था को आम जनता के लिए संवेदनशील कैसे बनाया जाये। दमन और अत्याचार की प्रवृत्ति को साहस और शौर्य नहीं कहा जा सकता। जैसा कि वोहरा साहब ने अपनी रपट में इंगित किया था, अधिकारियों-राजनीतिज्ञों-अपराधकर्मियों के दुश्चक्र का खुलासा करने की ओर सरकार को बढ़ना चाहिए। लेकिन बात यहीं पर आकर अटक जाती है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? #
ज्ञान पाठक के अभिलेखागार से
बुरे लोगों से साठगांठ ...
System Administrator - 2007-10-20 05:22
एन एन वोहरा समिति की उस रपट के सरकारी ताक पर रखे जाने के लगभग अब एक दशक हो जायेंगे जिसमें कहा गया था कि अधिकारियों-राजनीतिज्ञों-अपराधियों के बीच एक साठगांठ है। उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया था और अब तक किसी भी सरकार ने उन लोगों को बेनकाब कर दंडित करने की कोशिश नहीं की।