2004 में जबसे मनमोहन सिंह की सरकार बनी है, तब से ही सोनिया गांधी सरकार को बचाए रखने के लिए तरह तरह के समझौते करती रही हैं। पहले कार्यकाल के दौरान यह सरकार वाम समर्थन पर आश्रित थी। वाम समर्थन मिलता रहे, इसके लिए सोनिया गांधी बार बार केन्द्र सरकार के फैसले को प्रभावित करती रहीं। वह तो भारत अमेरिका परमाणु करार तक से पीछे हटने को तैयार थीं। सच तो यह है कि परमाणु करार लगभग मर ही चुका था, लेकिन उस करार को राहुल गांधी का समर्थ्रन मिला और बाद में समाजवादी पार्टी भी उसका समर्थन करने के लिए तैयार हो गई। उसके कारण ही वह करार संभव हो सका, अन्यथा सोनिया गांधी मनमोहन सरकार बचाने के लिए करार को अलविदा कहने को भी तैयार थी।
यूपीए के दूसरे कार्यकाल में भी कांग्रेस अध्यक्ष का यही रवैया रहा। कांग्रेस अध्यक्ष डीएमके की मांग को पूरी करती रहीं। बात सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष तक ही सीमित नहीं रही। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी समय पर सही फैसला नहीं लिया। ए राजा के भ्रष्टाचार की चर्चा लंबे समय तक होती रही। मामला सामने आने के बाद ही उनसे संचार मंत्रालय ले लिया जाना चाहिए था, लेकिन प्रधानमंत्री वैसा कर नहीं सके। राजा सरकार में बने रहे। सरकार कर थू थू होती रही। प्रधानमंत्री मूक दर्शक बने रहे। वही हाल राष्ट्रमंडल खेलों के मामले में भी हुआ। भ्रष्टाचार की खबरें रोज आती रहीं। भ्रष्टाचार के कारण तैयारियों में विलंब के मामले भी आते रहे। दुनिया भर में हम हंसी का पात्र बनते रहे। खेल के आयोजन के हमारे सामर्थ्य को लेकर विश्व समुदाय में सवाल उठने लगे। प्रधानमंत्री ने वहां भी मामले को अपने तरीके से चलने दिया।
सीवीसी की नियुक्ति के मामले में भी प्रधानमंत्री ने अपनी और अपनी सरकार की फजीहत करवा दी। उसके कारण सुप्रीम कोर्ट तक ने सरकार के खिलाफ विपरीत टिप्पणियां की और प्रधानमंत्री का कार्यालय भी आलोचना के घेरे में आ गया। वह मामला बहुत लंबा खिंचता रहा और लंबे समय तक केन्द्र सरकार पर कीचड़ उछलता रहा। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए जेपीसी के गठन की मांग को भी केन्द्र सरकार ने मानने से इनकार कर दिया था। विपक्ष भी अपनी बात पर अड़ गया। अंत में जेपीसी का गठन हुआ भी, पर तबतक इस मसले पर केन्द्र सरकार की भारी फजीहत हो चुकी थी। लोगों के दिमाग में यह बात बैठने लगी थी कि केन्द्र सरकार 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की सही तरीके से जांच कराने में दिलचस्पी ही नहीं रखती है।
अब 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में कई प्रभावशाली लोग जेल में हैं। ए राजा भी जेल में हैं और करुणानिधि की बेटी कणिमोझी भी। लेकिन इसका श्रेय केन्द्र सरकार को नहीं, सुप्रीम कोर्ट को जाता है, क्योंकि इस मामले की जांच सीबीआई सुप्रीम कोर्ट की सख्त निगरानी में कर रहा है। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल की दूसरी साल गिरह पर कहा कि वे भ्रष्टाचार के मामले पर बहुत ही गंभीर हैं। सच कहा जाए तो किसी भी प्रधानमंत्री को इस तरह के मामले पर गंभीर होना ही चाहिए। कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बना ही इसलिए है। लेकिन इस तरह के वक्तव्य से लगता है कि प्रधानमंत्री अब तक इस मामले पर गंभीर नहीं थे। इस तरह का बयान अपनी विफलता को स्वीकार करने के अलावा और क्या हो सकता है? (संवाद)
घोटाले के साए में दूसरी यूपीए सरकार की दूसरी सालगिरह
प्रधानमंत्री द्वारा अपनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं करने से सरकार की छवि प्रभावित
अमूल्य गांगुली - 2011-05-25 10:26
केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की दूसरी सालगिरह मनाई। कहने को ता यह दो साल पूरा होने का उत्सव था, लेकिन यह एक बेहद ही उदासी का दिन था। उत्सव मनाने के लिए सरकार के पास कुछ भी नहीं था। पिछला एक साल लगातार सरकार की विफलता का साल रहा है। एक के बाद एक घोटाले की ,खबरें आती रहीं और केन्द्र सरकार ने उन खबरों पर अपनी जो प्रतिक्रेयाएं दिखाईं, उनके कारण उसकी छवि खराब ही हुई है। इसके लिए यदि कोई जिम्मेदार है, तो वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा किसी तरह सरकार बनाए रखने की चाह है।