करुणानिधि द्वारा केन्द्र सरकार से समर्थन वापस नहीं लिए जाने की संभावना व्यक्त करने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है। उनका कहना है कि तमिलनाडु के नेता केन्द्र सरकार से अपनी पार्टी का समर्थन वापस लेकर कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। इससे उन्हें कुछ खोना ही पड़ेगा। राज्य की सत्ता वे पहले ही खो चुके हैं। केन्द्र में समर्थन वापस लेने का मतलब है केन्द्र की सत्ता को भी खो देना। आज उनकी पार्टी के केन्द्र में 6 मंत्री हैं। उनके बड़े बेटे भी मंत्री हैं। उनका एक नाती भी केन्द्र में कैबिनेट मंत्री है। दबाव की राजनीति करके वे एक और मंत्री को मनमोहन सिंह सरकार में शामिल करवा सकते हैं, क्योंकि ए राजा के इस्तीफे के बाद उनके बदले में अभी डीएमके की तरफ से किसी और को मंत्री नहीं बनाया गया है।

यानी राज्य में सत्ता खोने के बाद भी केन्द्र मंे सत्ता में बने रहने के अवसर को करुणानिधि क्यों त्यागना चाहेंगे? आज राजनीति का मकसद सत्ता में बने रहने के अलावा कुछ और भी रह गया है, ऐसा अब शायद ही कोई मानता हो। करुणानिधि के परिवार में खुद भी सत्ता के लिए संधर्ष चलता रहा है। उस संधर्ष में संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होनंे अपने एक बेटे को केन्द्र में मंत्री बनवा दिया था। दूसरे बेटे को उन्होनंे तमिलनाडु का उपमुख्यमंत्री बना रखा था। बेटी कणिमोझी को राज्य सभा में सांसद बनवाने के अलावा उनकी पसंद के सांसद ए राजा को केन्द्र में संखर मंत्री बनवा रखा था। इस तरह से अब उनकी राजनीति ही पूरी तरह सत्ता केन्द्रित बन गई है, फिर भला वे केन्द्र की सत्ता से क्यों हटना चाहेंगे?

अस तर्क से माना जा रहा है कि डीएमके द्वारा केन्द्र की सत्ता से अलग होने का कोई सवाल नहीं है। यह सच है कि करुणानिधि को अपनी बेटी के जेल में होने का दुख है, लेकिन उन्हें कोई निर्णया करने के पहले अपने दोनों बेटे की राय का भी ध्यान रखना होगा। और तमिलनाडु की राजनीति के जानकार कहते हैं कि करुणानिधि के दोनों बेटों का अपनी बहन कणिमोझी से वह लगाव नहीं है, जो लगाव बाप का अपनी बेटी के साथ है। तमिलनाडु के चुनाव नतीजे आने के बाद उन्होनंे कणिमोझी प्रकरण को पार्टी की हार का एक बड़ा कारण बताया था। उनका कहना था कि ए राजा और कणिमोझी का बचाव करके करुणानिधि ने राज्य की जनता के बीच अपनी स्थिति कमजोर कर दी थी और उसके कारण ही पार्टी को इस तरह की करारी हार का सामना करना पड़ा।

जाहिर है करुणानिधि के बेटे कणिमो़झी के खातिर केन्द्र की सत्ता से बेदखल नहीं होना चाहेंगे और पुत्रीमोह पर पुत्रमोह भारी पड़ सकता है। लेकिन सिक्के का यह एक ही पहलू है। इसका एक दूसरा पहलू भी है और वह यह है कि निजी तोर पर करुणानिधि के पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है। वे तमिलनाडु में कई बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं। राजनीति की उन्होंने एक लंबी पारी खेल ली है और अब 87 साल के भी हो चुके हैं। उन्हें पता है कि मुख्यमंत्री के रूप में वे अपना अंतिम कार्यकाल पूरा कर चुके हैं और अब कभी भी इस पद पर आसीन नहीं होंगे। सच कहा जाए तो मुख्यमंत्री के अपने पद को वह पहले ही छोड़ना चाह रहे थे और अपने बेटे स्टालिन को उस पद पर बैठाना चाह रहे थे। पर दोनों बेटे के आपसी संघर्ष के कारण वे अपनी उस इच्छा की पूर्ति नहीं कर सके थे।

कहने का मतलब कि करुणानिधि ने अपना राजनैतिक सफर पूरा कर लिया है। अब राजनीति में कुछ भी उनके लिए दांव पर नहीं लगा हुआ है। इसलिए वे आने वाले दिनों में कुछ वैसा भी निर्णय कर सकते हैं, जिसकी संगति उन राजनैतिक तर्काें से न हों, जिनके आधार पर हम कह रहे हैं कि डीएमेके का समर्थन मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार को बना रहेगा। अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान करुणानिधि से अपना दर्द दुनिया को दिखा ही दिया। उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे दिल्ली में प्रधानमंत्री मनतोहन सिंह से नहीं, तो कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से जरूर मिलेंगे। लेकिन उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने में भी कोई रुचि नहीं दिखाईं। वे दिल्ली एक राजनेता की तरह आए ही नहीं थे। वे एक दुखी पिता की तरह आए और दुखी पिता की तरह अपनी बेटी से मिलकर वापस चले गए।

उनके दिल्ली प्रवास के दौरान उनसे गृहमंत्री पी चिदंबरम ने मुलाकात की और तमिलनाडु के कांग्रेस प्रभारी केन्द्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी मुलाकात की। लंकिन सोनिया गांधी का उनसे आकर न मिलना उन्हें जरूर खला होगा। स कहा जाए तो जिस तरह की परिस्थितियों में करुणानिधि दिल्ली आए थे, उनमें सोनिया गांधी को उनके पास जाकर मिलना चाहिए था। लेकिन उनके सलाहकारों ने शायद उन्हें ऐसी सलाह दी ही नहीं। यदि सोनिया खुद जाकर मिलतीं, तो शायद यूपीए सरकार की स्थिरता को और भी बल मिलता। भारतीय संस्क्ति में दुखी व्यक्ति द्वारा किसी और के घर पर जाकर रोने को अच्छा नहीं माना जाता है। इसलिए करुणानिधि ने सोनिया के घर जाकर नहीं मिलने का जो निर्णय किया, वह भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही थां। लेकिन उनको इस बात का मलाल होगा कि खुद सोनिया उनसे मिलने के लिए नहीं आईं। आज सोनिया भले ही देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी के अध्यक्ष हों, लेकिन राजनीति में वे करुणानिधि से बहुत जूनियर हैं।

दिल्ली आकर अपने से मिलने वालों को करुणानिधि से कहा कि जिस तरह के आरोप में उनकी बेटी जेल में है, उसी तरह के आरोपों का सामना करने वाले अन्य लोग जेल से बाहर क्यों है। करुणानिधि की इस तरह की चिंता मनमोहन सिंह सरकार के भविष्य के लिए खतरा भी बन सकती है। कणिमोझी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेल में है। उस घोटाले की सीबीआई जांच सप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है। पर राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले की जांच सीबीआई प्रधानमंत्री की देखरेख में कर रही है और उस जांच में ढील बरती जा रही है। कहीं डीएमके नेता का इशारा उधर ही तो नहीं था? यदि यह सच है तो प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले सहित अन्य घोटालों के आरोपियों के खिलाफ भी कार्रवाई तेज कर देना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि उन घोटालों में शामिल सभी लोग जेल में हों। तभी करुणानिधि के आक्रोश को शांत किया जा सकता है और यूपीए सरकार की स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती ळें (संवाद)