पिछले रविवार को मनमोहन सिंह की वर्तमान सरकार ने अपनी दूसरी साल गिरह मनाई। उसमें प्रधानमंत्री ने कहा कि वे कुछ मसले पर अपने काम काज में सुधार करेंगे। विपक्ष ने जहां विफलताओं के लिए उनकी सरकार की काफी आलोचना की है, वहीं, खुद सरकार का मानना है कि वह अपने कामकाज से संतुष्ट है। आर्थिक विकास दर को वह अपनी बड़ी उपलब्धि दता रही है। लेकिन लोक मान्यता यह है कि यह सरकार लगातार एक संकट से दूसरे संकट की ओर बढ़ रही है। भ्रष्टाचार के एक मामले पर चर्चा अभी खत्म नहीं होती है कि भ्रष्टाचार का दूसरा मामला सामने आ जाता है। और सरकार के पास उनके बारे में कहने के लिए कुछ खास नहीं रह जाता।
सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई तो है ही, उसने अपने दूसरे कार्यकाल में आथिक सुधार कार्यक्रमों की दिशा में भी कोई खास प्रगति नहीं की है। पहले कार्यकाल में उसके समर्थक वामदल सुधार कार्यक्रमों को लागू करने में अड़ंगेबाजी करते थे, पर अब तक सरकार को उनका भी सहारा नहीं है, फिर भी बैंक्रिग सुधार, श्रम कानूनों के सुधार, बीमा सुधार, खुदरा व्यापार सुधार व अन्य क्षेत्रों में सुधार के काम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। कीमतें ेजी से बढ़ रही हैं और मुद्रास्फीति की दर भी परेशान कर रही है।
तीसरा साल केन्द्र सरकार के लिए काफी निर्णायक साबित होने वाला है। यह साल इस सरकार के लिए सबसे ज्यादा नाजुकए संवदेनशील और निर्णायक होने वाला है। केन्द सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए भी यह साल चुनौतियों भरा होगा। राजनैतिक रूप से देखा जाए, तो कर्नाटक में भारी संकट पैदा होने वाला है। तेलंगाना राज्य की मांग और उसके विरोध को लेकर वहां भारी बवंडर होने की आशंका है। सरकार वहां चाहे जिस तरह का निर्णय ले, स्थिति विस्फोटक होने से बच नहीं पाएगी। ऐसे हालात में वहां की सरकार गिर सकती है और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग सकता है।
आने वाले दिनों में योग गुरू रामदेव अपने हजारों समर्थकों के साथ दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठने वाले हैं। कुछ मांगों को लेकर वह आमरण अनशन करने की बात कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि भारतीयो के देश अथवा विदेशों मे जमा सारे काले धन का राष्ट्रीयकरण कर लिया जाए। वे 100 रुपए से बड़े नोटों के चलन को समाप्त करने की मांग भी कर रहे हैं। ये दो ऐसे विषय हैं, जिस पर बहस की जरूरत है। सवाल उठता है कि केन्द्र सरकार रामदेव के इस आंदोलन का सामना कैसे करेगी? अन्ना हजारे ने लोकपाल विधेयक के निर्माण में सिविल सोसाइटी के लोगों को शामिल करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी और सरकार उनके आंदोलन के सामने नत मस्तक हो गई। सवाल उठता है कि क्या रामदेव के आंदोलन के सामने भी सरकार वैसा ही रुख अपनाएगी?
आने वाले समय में केंन्द्र सरकार को अनेक कानून भी बनाने हैं। लाकपाल विधेयक पर बात चल रही है। उस बिल का मसौदा तैयार किया जा रहा है। किसानों के असंतोष के बीच नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाने का दबाव भी केन्द्र सरकार पर है। सांप्रदायिक सद्भाव कानून भी संसद के अगले सत्र के दौरान लाया जा सकता है। 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव है। उसके पहले केन्द्र की सरकार विवादित महिला आऱ़क्षण विधेयक को लोकसभा में एक बार और लाने की कोशिश कर सकती है।
उत्तर प्रदेश ही नहीं, गुजरात में भी अगले साल ही विधानसभा का चुनाव है। साल के शुरू मं उत्तर प्रदेश में चुनाव है, तो साल के अंत में गुजरात में चुनाव होगा। कुछ अन्य राज्यों के चुनाव भी होंगे। जाहिर है कि कांग्रेस के लिए आने वाला समय राजनैतिक तौर से काफी महत्वपूर्ण और यूपीए सरकार की स्थिरता के लिए भी आने वाले दिन नाजुक बने रह सकते हैं। उसका एक कारण तो करुणानिधि का कांग्रेस नेतृत्व और केन्द्र सरकार से नाराज हो जाना है। उनकी बेटी कणिमोझी जेल में है और कभी भी करुणानिधि दुखी होकर यूपीए सरकार छोड़ने की घोषणा कर सकते हैं।
ममता बनर्जी की तरफ से भी यूपीए सरकार को खतरा हो सकता है। वैसे तो ममता आज पूरी तरह यूपीए के साथ हैं। उनकी अपनी राज्य सरकार में भी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व है, लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता अपनी सरकार के बहुमत के लिए कांग्रेस पर आश्रित नहीं हैं। इसलिए केन्द्र सरकार का उनका समर्थन हमेशा बना ही रहेगा, इसके बारे मं आज दावे से कोई नहीं कह सकता। इसका कारण यह है कि ममता बनर्जी का व्यक्तित्व जटिल है। उत्तर प्रदेश में चुनाव का उलटी गिनती शुरू होने के कारण वहां की सपा और बसपा पर भी कांग्रेस अब अपनी केन्द्र सरकार बचाने के लिए निर्भर नहीं रह सकती। इन दोनों पार्टियों का बार बार समर्थन लेना उत्तर प्रदेश की उसकी अपनी राजनीति के लिए भी उचित नहीं है और चुनाव नजदीक होने के कारण वहां सपा और बसपा भी कांग्रेस से दूरी बनाए रखना चाहेगी। जाहिर है, आने वाला समय केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के लिए बहुत ही कठिन है। (संवाद)
मनमोहन सरकार के लिए खतरे की घंटी
तीसरा साल बहुत ही नाजुक होगा
कल्याणी शंकर - 2011-05-28 11:04
जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार के पहले कार्यकाल का पहला साल परा किया था, तो उन्होंने अपनी सरकार को अपनी उपलब्धियों के लिए 10 में से 6 अंक दिए थे। दूसरे कार्यकाल का दूसरा साल पूरा होने पर प्रधानमंत्री अब कितना अंक देना चाहेंगे? क्या वे अपनी सरकार को 5 अंक देंगे अथवा 4 ही, क्योंकि पिछले एक साल से उनकी सरकार के ऊपर भ्रष्टाचार के एक से एक आरोप लग रहे हैं। उन्हें यह मानने में कोई एतराज नहीं होगा कि उनके सरकार का पहला कार्यकाल दूसरे कार्यकाल से काफी बेहतर था। दूसरा कार्यकाल तो अनेक मोर्चे पर विफल रहा है।