पिछले दो साल से भ्रष्टाचार की जो घटनाएं सामने आ रही है, उनका संदेश तो यही है कि देश में विनियामक संस्थाओं की सख्त जरूरत है। इन संस्थाओं के बिना भारत की बाजार व्यवस्था सफल हो ही नहीं सकती। एक समय था, जब हम सरकारी नियंत्रण को भ्रष्टाचार की जननी मानते थे। माना जाता था कि निंयत्रण की नीतियों को हटाकर और बाजार को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है। पिछले दो दशकों से यही तो किया जा रहा है, लेकिन इस दौर में भ्रष्टाचार घटने की बजाय और भी बढ़ता जा रहा है। और अब तो इसके ऐसा भयानक रूप प्राप्त कर लिया है कि इसके कारण पूरी व्यवस्था को ही खतरा पैदा हो गया है।
अस खतरे से बचने के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रांें के लिए प्रभावी नियामक बनाने की जरूरत है, लेकिन नियामक बनाते समय इसका भी ़ख्याल किया जाना चाहिए कि इसका उद्देश्य बाजार में मुक्त व्यापार और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि नियंत्रण व्यवस्था की फिर से वापसी। नियमन और नियंत्रण के बीच की रेखा का उल्लंघन नियामकों के द्वारा नहीं होनी चाहिए। उसकी भूमिका एक रेफरी की तरह हो सकती है, जो खेल में खुद शामिल नहीं होकर यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी खिलाड़ी नियमों के अनुसार खेल रहे हैं।
बैंकिंग व्यवस्था का ही उदाहरण लें। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के तेज विकास के लिए बैंकिंग सेक्टर का स्वस्थ होना जरूरी है। इसके स्वास्थ्य के लिए यह जरूरी है कि उन्हें स्वतंत्र रहते हुए काम करने दिया जाय। पर अमेरिका में हम देख चुके हैं कि वहां की बैंकिेग व्यवस्था किस तरह से चरमर्रा गई थी और एक के बाद एक कई बैंक दिवालिया हो गए। पूरी दुनिया में उसके कारण आर्थिक संकट शुरू हो गया था। 1930 के दशक की महामंदी की आशंका बनने लगी थी। किसी तरह उस आशंका को निरस्त किया गया, लेकिन उस संकट से यह तो स्पष्ठ हो ही गया कि बैंकिंग व्यवस्था को सही ढंग से चलाने के लिए विनियमन की जरूरत है और विनियमन को सुनिश्चित करने के लिए विनियामक चाहिए।
आज हमारे देश में अनेक समस्याएं इसलिए भी पैदा हो गई हैं, क्योकि हमने बाजार की शक्तियों पर विश्वास नहीं किया है। बाजार की शक्तियों को खुला छोड. देने से भी नुकसान हुआ है। प्रतिस्पर्धा होनेी चाहिए, लेकिन वह स्वस्थ, स्वच्छ और मुक्त होनी चाहिए। उसकी विफलता के परिणाम के रूप में हम अपने देश में अनेक हिस्सों मंे नक्सलवादी समस्या देख रहे हैं। कौन हैं वे नक्सली? वे नक्सली अपने ही लोग हैं, जो अर्थव्यवस्था के गलत तरीके से काम करने के कारण पैदा हुए हैं। वे उन इलाकों में ज्यादा है, जो देश के प्राकृतिक रूप से संपन्न इलाके हैं। लेकिन बाजार के सही ढंग से काम नहीं करने के कारण वहां का सही तरीके से विकास नहीं हो पाया है और वहां के लोग भारी शोषण के शिकार है। विकास के लिए उनसे उनकी जमीन छीनी जा रही है। उसके लिए उन्हें बाजार दर पर उचित मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा है। उनमें गरीबी और अशिक्षा है, जिसके कारण वे मुआवजे का भी सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं और उनकी दशा दिनों दिन खराब होती जाती है। फिर तो वे नक्सलवादियों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। (संवाद)
भारत को प्रतिस्पर्धा चाहिए
मुक्त व्यापार विकास के लिए आवश्यक
अप्राकृता शंकर नारायण - 2011-05-28 11:07
एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं और उनके कारण बाजार का विश्वास डगमगा रहा है। बाजार का ही नहीं, बल्कि बाजार में भी लोगों का विश्वास डगमगा रहा है। इनके कारण देश के संसाधनों की भारी बर्बादी होती है। मुंबई जैसे महानगर में जहां गरीबों के लिए स्कूल और अस्पतालों की भारी कमी है, सरकारी जमीन भ्रष्ट लोगों के द्वारा हड़प् ली जाती है। आदर्श सोसाइटी घोटाला इसका एक उदाहरण है। क्या हम एक ऐसा समाज नहीं बना सकते, जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो और जहां तेजी से लोगों को न्याय मिलता हो?