सुषमा स्वराज और अरुण जेटली लाककृष्ण आडवाणी के खास लोगों में शामिल रहे हैं। सुषमा को लोकसभा में पार्टी का नेता और अरूण जेटली को राज्य सभा में पार्टी का नेता लालकृष्ण आडवाणी ने ही बनाया है। दोनों की महत्वाकांक्षा अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री का दावेदार बनने की है और इसके लिए दोनों मंें प्रतिस्पर्धा चल रही है, हालांकि प्रधानमंत्री पद के लिए और भी दावेदार हैं और उन्हें कमजोर करने की भी कोशिशें होती रही हैं।
फिलहाल भाजपा की तरफ से पाटी्र के प्रबलतम दावेदार नरेन्द्र मोदी हैं। वे वाजपेयी और आडवाणी के बाद पार्टी के सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे हैं। उनका यह उभार स्वाभाविक रूप से हुआ है। वे न तो आडवाणी और न ही वाजपेयी के आदमी के रूप में भाजपा के शिखर नेता के पद की ओर बढ़़ रहे हैं, बल्कि गुजरात के मुख्यमत्री और राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की अपनी क्षमता के कारण भाजपा के सहज और स्वाभाविक नेता बने हुए हैं। आज भाजपा के अंदर पार्टी के नेता के रूप में चुनौती देने की स्थिति में पार्टी के कोई नेता भी नहीं हैं। न तो अरुण जेटली नरेन्द्र मोदी के सामने कहीं टिकते दिखाई देते हैं और न ही सुषमा स्वराज और न ही पार्टी के कोई अन्य नेता। इसलिए पार्टी के अंदर प्रधानमंत्री पद की लालसा रखने वाले नेता राजग के सहयोगी जनता दल(यू) के नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर नरेन्द्र मोदी की बढ़त को रोकना चाहते हैं। बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने अपना जो मोदी विरोधी रवेया अपनाया, उसके पीछे भाजपा की अंदरूनी राजनीति का भी हाथ था। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से कौन नीतीश कुमार के सबसे ज्यादा नजदीक है, यह सबको पता है।
पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी प्रधानमंत्री पद के एक सभाववित दावेदार हैं, लेकिन उनके अपने प्रदेश में पार्टी की हालत खराब है। कभी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी होने का रुतबा रखने वाली भाजपा वहां अब चौथे नंबर की पार्टी बन गई है। पार्टी का वहां यह हाल राजनाथ सिंह के नेत्ृत्व में ही हुआ है। पार्टी का ग्राफ वहां तेजी से उस समय गिरा था, जब राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन्हीं को अगला मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर पार्टी वहां चुनाव लड़ रही थी। उस समय पार्टी तीसरे पायदान पर खिसक गई थी और बसपा ने तब मुख्य विपक्षी पार्टी का रुतबा हासिल कर लिया था और मुलायम की सपा सत्ता में आ गई थी। पार्टी प्रदेश में तीसरे से चौथे पायदान पर उस समय आई, जब राजनाथ सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। जाहिर है उत्तर प्रदेश में पार्टी की वर्तमान खराब स्थिति के लिए यदि कोई पार्टी नेता सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, तो वे राजनाथ सिंह ही हैं। इसके कारण उनका प्रधानमंत्री पद का दावा बहुत कमजोर पड़ गया है।
इसलिए यदि नरेन्द्र मोदी को नीतीश के विरोध का हवाला देकर प्रधानमंत्री उम्मीदवार के दौड़ से बाहर कर दिया जाता है, तो सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ही इस पद के दो सबसे सशक्त दावेदार बचते हैं। दोनों मे से किसी नेता की नरेन्द्र मोदी की तरह कोई मास अपील नहीं है, लेकिन सुषमा स्वराज अपने भाषणों से जनसमुदाय को मुग्ध करना जानती हैं। वे लोकसभा का चुनाव लड़ती रही हैं। एकाध बार हार का भी सामना किया है, लेकिन ज्यादातर वह लोकसभा मंे जीतकर ही संसद पहुंचती रही हैं, जबकि अरुण जेटली पिछले दरवाजे से संसद में आते रहे हैं। इन सब कारणों से सुषमा स्वराज का व्यक्तित्व अरूण जेटली पर भारी पड़ता है।
पार्टी की अंदरूनी सत्ता संधर्ष के तहत सुषमा स्वराज का नाम बार बार कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं की गौडमदर के रूप में उछाला जाता रहा है। सुषमा एक बार बेल्लारी से लोकसभा का चुनाव सोनिया गांधी के खिलाफ लड़ी थीं। वह चुनाव हार गई थीं, लेकिन कहने वाले कहते हैं कि उसी समय बेल्लारी के रेड्डी बंधु उनके संपर्क मंे आए थे। आज वे दोनों भाई कर्नाटक सरकार में मंत्री हैं। दोनों खनन उद्योग से जुड़े हुए हैं और दोनों पर अवैध तरीके से माइनिंग करने का आरोप लगता रहा है। दोनों भाइयांे ने मिलकर एक समय कर्नाटक के मुख्यमंत्री यदुरप्पा को पद से हटाने की कसम खा ली थी और उनकी सरकार को खतरे में भी डाल दिया था। तब सुषमा स्वराज ने बीच बवाव करके मामले को शांत किया था। तब यदुरप्पा की सरकार बची थी और रेड्डी बंधुओं की कुछ अन्य मांगे भी पूरी हो गई थीं। उस समय पार्टी के लोगों ने इस बात को जोर शोर से प्रचारित किया था कि रेड्डी बंधु सुषमा स्वराज के खासम खास हैं।
आज भ्रष्टाचार एक बड़ा राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन गया है। वैसे माहौल में सुषमा स्वराज के साथ रेड्डी भाइयों का नाम जुड़ना उनकी छवि के लिए खतरनाक साबित हो रहा था। रेड्डी भाइयों की छवि खान माफिया की बन गई है और खान माफिया की गौडमदर की छवि के साथ सुषमा स्वराज प्रधानमंत्री पद की दावेदार नहीं बन सकतीं। इसलिए उन्होंने भाजपा के शीतयुद्ध को खुलेआम कर दिया और सार्वजनिक रूप से कह डाला कि रेड्डी भाइयों को मंत्री बनवाने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही परिवार के तीन सदस्यों को मंत्री बनाए जाने का उन्होंने विरोध भी किया था। गौरतलब है कि रेड्डी भाइयों मे से दो तो सरकार में मंत्री हैं और तीसरे को मंत्री के बराबर का ही एक पद सरकार में मिला हुआ है।
सुषमा स्वराज इतना कहकर ही अपने आपको रेड्डी भाइयों से अलग कर सकती थीं, लेकिन वे जानती हैं कि इस तरह की बयानबाजी का कोई खास असर लोगों पर नहीं पड़ता है, क्यांेंकि किसी खराब छवि वाले व्यक्ति से दूरी बनाए रखने का बयान एक रूटीन बयान होता है, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद के अपने प्रतिस्पर्धी अरुण जेटली का नाम लेकर यह दुनिया को बता दिया कि दोनों भाइयों को मुख्यमंत्री बनाने में उनका हाथ है, क्योंकि वे ही उस समय कर्नाटक के पार्टी प्रभारी थे।
सुश्री स्वराज के इस बयान पर पार्टी में खलबली मची हुई है। खुद श्री जेटली चुप हैं, क्योंकि उनके पास शायद इस पर कहने के लिए कुछ है भी नहीं, लेकिन शीतयुद्ध को गर्म होता देख पार्टी के अन्य नेता जरूर हरकत में आ गए हैं। राजनाथ सिंह ने उस समय पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है, जिसका कोई मतलब नहीं बनता। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने सुषमा के इस बयान को अनावश्यक करार दिया है, जो वास्तव में सुश्री स्वराज के लिए आवश्यक था। सुषमा और जेटली के गौडफादर लालकृष्ण आडवाणी चुप हैं। सार्वजनिक तौर पर इस मसले पर शांति छा गई है, लेकिन शीतयुद्ध जारी है। (संवाद)
सुषमा स्वराज का जेटली पर हमला
बयानबाजी बंद हुई पर शीतयुद्ध जारी है
उपेन्द्र प्रसाद - 2011-05-30 09:38
भारतीय जनता पार्टी में उत्तराधिकार का सवाल अभी तक फैसला नहीं हो सका है और यही कारण है कि इसकी लड़ाई अभी तक जारी है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज द्वारा राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली पर खुला हमला इसी लड़ाई का एक हिस्सा है। यह लड़ाई 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लड़ी जा रही है। अब तक तो यह चुपचाप लड़ी जा रही थी और दूसरी पंक्ति के नेता एक दूसरे को पीछे धकेलने की कोशिश शीतयुद्ध की कूटनीति के अनुसार कर रहे थे। इस शीतयुद्ध में सुषमा स्वराज पिछड़ रही थी, इसलिए उन्होंने खुलकर हमला बोल दिया। जो लड़ाई पर्दे के पीछे लड़ी जा रही थी वह अब सबके सामने आ गई है।