यहीं उसका भविष्य है भी, क्योंकि उसका प्रशिक्षण नए औद्योगिक रोजगारों के लिए ही हुआ है। आइआइटी और आइआइएम से पास हो कर निकलने वाली युवा पीढ़ी को कोई और काम करना नहीं आता। जिन्होंने टेक्नोलॉजी पढ़ी है, उनका इस्तेमाल आधुनिक ढंग के कारखानों में ही हो सकता है। जिन्होंने मैंनेजमेंट पढ़ा है, उनका इस्तेमाल आधुनिक ढंग के कार्यालयों में ही हो सकता है। दोनों ही अंततः किसी का नौकर बनने के लिए अभिशप्त हैं। टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट के संयोग से कोई नई उत्पादक इकाई शुरू की जा सकती है, यह बात उनके दिमाग में आती ही नहीं है। क्योंकि यह दिमाग स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए नहीं, किसी अन्य को अपनी सेवाएं अर्पित करने के लिए बनाया गया है। अगर किसी के मन में ऐसा खयाल आए भी, तो पूंजी कहां से आएगी? सरकार देगी नहीं और निवेशक भी ऐसे नए उपक्रम में रुपया क्यों लगाएंगे, जिसके सफल होने की संभावना के बारे में कोई राय नहीं बनाई जा सकती। पूरी स्थिति उन उद्योगपतियों के पक्ष में है, जो अपनी साख के बल पर बैंकों और बाजार से पैसा उगाह सकते हैं।

दूसरी तरफ से देखा जाए, तो लगेगा कि हमारे उद्योगपति बागी हो गए हैं। वे अपनी वर्तमान कमाई से संतुष्ट नहीं हैं तथा और कमाना चाहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि वे नए इलाकों में जाएं और नई इकाइयां स्थापित करें। शहरों में यह संभव नहीं है, क्योंकि वहां की जमीन वहां रहने वालों और बाहर से आने वालों के लिए ही पूरी नहीं पड़ रही है। इसलिए वे कोलंबस और मार्को पोलो बन कर गांवों की जमीन पर नजर दौड़ाते हैं। खड़ी फसल को देख कर उनके मन में चाहत पैदा होती है कि उसे उखाड़ फेंकें और खाली होने वाली जगह पर अपने कारखाने का शिलान्यास करवा दें। वे भी क्या करें! उनकी मनुस्मृति यही कहती है। कारखाने और कार्यालय खुलेंगे, तो वहां तक सरपट पहुंचने के लिए और उनका माल एक केंद्र से दूसरे केंद्रों तक पहुंचाने के लिए एक्सप्रेस रास्ते भी चाहिए। यहां से सरकार की भूमिका शुरू होती है। उसका काम किसानों, खेतिहर मजदूरों और मनरेगा पर आश्रित गरीबों के भविष्य के बारे में सोचना नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के नए तीर्थों के लिए सब तरह की सुविधाएं मुहैया करना रह गया है। सरकार और उद्योग, दोनों एक ही अस्तबल के घोड़े हैं। दोनों के कठोर खुरों को साधारण जन की छाती का नरम मांस मुफीद पड़ता है।

ऐसे में, कोई भी फार्मूला बनाया जाए, वह सफल नहीं हो सकता। जो कारखाना लगा रहा है, वह भी रोजगार प्रदान करेगा, लेकिन सिर्फ कुछ लोगों को। कारण, वह महंगी से महंगी मशीनें लाएगा, जो सारा काम अपने आप करेंगी। मालिकों को सिर्फ सुपवाइजर चाहिए जो निगाह रखे कि कोई मशीन पगला तो नहीं गई है। किताबों की दुनिया से उदाहरण लें, तो परंपरागत तरीके में कोई छपाई करता है, कोई छपे हुए पन्नों को व्यवस्थित करता है, कोई सिलाई करता है, कोई जिल्द लगाता है और कोई कटिंग करता हैं। अब ऐसी मशीनें आ रही हैं जो यह सारा काम अकेले कर देती हैं। मशीनें हैं, इसलिए हर चीज नपी-तुली होती है। अब कोई गरीब प्रकाशक ही पुराने तरीके से काम करवाता है। उद्योगपति प्रकाशक आदमी किराए पर रखने के बजाय मशीन में रुपया लगाना पसंद करता है। अखबार भी इसी नए ढंग से छपते हैं। लाखों प्रतियां छापने और तह लगाने का काम चुटकियों में हो जाता है। जाहिर है, एक नया रोजगार सौ पुराने रोजगारों की कब्र पर जन्म लेता है।

दूसरी तरफ, जिस जमीन पर ये आधुनिक रोजगार पैदा हो रहे हैं या पैदा होने वाले हैं, वह परंपरागत पद्धतियों से बंधी हुई है। अगरचे खेती में भी मशीनों का प्रयोग शुरू हो गया है, पर उससे जितनी आमदनी होती है, उसके बल पर अमेरिकी कृषि पद्धति में प्रयुक्त आधुनिकतम मशीनें नहीं खरीदी जा सकतीं न उतना खुशहाल हुआ जा सकता है। वहां एक आदमी हजारों एकड़ जमीन पर जुताई-बुवाई कर लेता है, हवाई जहाज से खाद और कीटनाशक छींटता है और खेती से होने वाली आमदनी पर ठाट से रहता है। भारत में कुछ इलाकों को छोड़ दें, तो किसान आत्मदया का पात्र बन कर रह गया है। फिर भी खेती से ही उसका घर चलता है। किसान कोई और धंधा करने में असमर्थ है, इसीलिए वह अपनी जमीन से चिपका रहता है। उसकी जमीन गई, तो समझो उसकी जीविका भी गई। जमीन के बदले उसे चाहे जितना रुपया दे दो, कुछ समय के लिए उसके गालों की लाली तो बनी रहेगी। पर कुछ वर्षों के बाद जब उसकी हालत ठन ठन गोपाल की हो जाएगी, तो वह शहर की ओर भागेगा और रिक्शा चलाएगा। उसकी किसानी की मर्जाद जाती रहेगी और वह दिहाड़ी पर काम करने वाला मजदूर बन जाएगा।

इसीलिए किसान सरकार को या उद्योगपति को अपनी जमीन बेचना नहीं चाहते। जहां सरकार अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए एक लुटेरे कानून का सहारा ले कर किसानों की जमीन हड़पने की कोशिश करती है, वहां किसान अपने आपको असहाय पाता है। वह जानता है कि सरकार के पास पुलिस और सेना है, इसलिए उससे लड़ा नहीं जा सकता। अदालत से भी न्याय मिलने की आशा नहीं रहती, क्योंकि सरकार उसके सामने जन हित का तर्क रखती है और इस तर्क से कायल हो कर वह क्षतिपूर्ति की रकम बढ़ा कर फारिग हो जाती है। किसी-किसी अदालत ने जरूर पूछा है कि कोई उद्योगपति कारखाना लगाता है तो अपने फायदे के लिए – इसका जन हित से क्या लेना-देना है? लेकिन ऐसा साहस हवा-पानी की तरह सर्वत्र नहीं पाया जाता। सो किसान अपनी जमीन के लिए ज्यादा से ज्यादा हरजाना पाने के लिए लड़ता है। यही आजकल का किसान आंदोलन है।

केंद्र सरकार द्वारा भू अर्जन की जो नई नीति बनाई जा रही है, उसमें उदारता का तत्व है। लेकिन उससे समस्या का समाधान नहीं होगा। ज्यादा पैसा पा कर भी किसान बेदखल तो होगा ही। दूसरी तरफ, कानून ज्यादा कड़ा हो गया, तो उद्योगपति विदेश की ओर भागेंगे। लेकिन सरकार शायद ऐसा होने नहीं देगी, क्योंकि उसे भारत को इक्कीसवीं सदी लायक बनाना है। सिर्फ कॉल सेंटरों से तो यह होगा नहीं। कल-कारखाने भी चाहिए। वैसे भी विनिर्माण के क्षेत्र में देश काफी पीछे है तथा और पिछड़ता जा रहा है। सिर्फ बैंकिंग, बीमा, सॉफ्टवेयर आदि के बल पर कितनी लंबी छलांग लगाई जा सकती है? इसलिए कोई न कोई ऐसा इंतजाम जरूर किया जाएगा जिससे उद्योगपतियों को सस्ते में जमीन मिल सके। ऐसा नहीं हो पाया और उद्योगपतियों को बाजार के नियमों से जमीन खरीदना पड़ गया, तो औद्योगिक उत्पाद महंगे हो जाएंगे, जिससे साधारण जन बुरी तरह प्रभावित होगा।

क्या इस संकट से निकलने का कोई आसान रास्ता है? जो अर्थशास्त्र स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाया जाता है और जिसे पढ़ कर स्मार्ट लोग योजना आयोग में अर्थशास्त्री कहलाते हैं, उसके दायरे में तो कोई तरीका दिखाई नहीं देता। इसी अर्थशास्त्र के सूत्रों पर चल कर हम न तो भारत की खेती को लाभकर बना पाए हैं और न देश का उद्योगीकरण कर पाए हैं। भारत की कितनी उद्योग क्षमता और श्रम शक्ति बेकार जा रही है, इसका हिसाब लगाने जो भी बैठेगा, थोड़ी ही देर बाद उसे चक्कर आने लगेगा। निजी पूंजी से आज जो आशाएं की जा रही हैं, वे पूरी हो गईं, तब भी साठ-सत्तर करोड़ लोगों का जीवन कष्टमय ही बना रहेगा। बड़ी पूंजी और बड़े किसान इस छकड़ा गाड़ी को रॉल्स रायस में नहीं बदल सकते। दरअसल, हमें रॉल्स रायस की जरूरत भी नहीं है। एक रॉल्स रायस की कीमत से दर्जनों बसें और सैकड़ों साइकिलें आ सकती हैं। कुछ छोटी कारें भी। इसके लिए तो उत्पादन प्रणाली का विकेंद्रीकरण ही करना होगा।

इस विकेंद्रीकरण का मोटा-मोटी रूप यह होगा कि उत्पादन छोटी-छोटी मशीनों से हो। ऐसी मशीनों में ही यह संभावना है कि पूंजी कम लगे और रोजगार ज्यादा पैदा हो। इनकी सहायता से किसान भी औद्योगिक व्यवस्था में दाखिल हो सकते हैं। लघु और कुटीर स्तर पर चलने वाले धंधों से होने वाली आमदनी खेती से होने वाली आय के पूरक का काम करेगी। सबसे अच्छी बात यह होगी कि छोटे-छोटे कल-कारखाने बैठाने के लिए किसी भी उद्यमी को सैकड़ों एकड़ जमीन की जरूरत नहीं होगी। इनमें से कुछ तो घर के एक हिस्से में भी लगाए जा सकते हैं। जापान की वर्तमान समृद्धि में विकेंद्रीकरण की इस पद्धति का भी काफी योगदान है। इस प्रक्रिया में यह भी हो सकता है कि कुछ किसान लघु उद्यमी हो जाएं और किसानी छोड़ दें। सच तो यह है कि हमारे देश में खेती-किसानी पर जरूरत से ज्यादा लोग निर्भर हैं। संतुलित विकास के लिए इनकी संख्या घटनी चाहिए। औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार होना चाहिए। अभी तो हम इतने बिजली के पंखे या हाथ की सिलाई मशीनें भी नहीं बना पा रहे हैं जिससे हर परिवार को कम से कम एक पंखा और एक सिलाई मशीन उपलब्ध हो सके। जब ज्यादा से ज्यादा लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, तो औद्योगिक उत्पादों की मांग भी बढ़ेगी। भारत का उद्योगीकरण इसी रास्ते पर चलते हुए हो सकता है और किसान भी सुखी हो सकते हैं। बाकी सभी रास्ते खंदकों और भूस्खलनों से भरे हुए हैं।

इस विकंद्रित व्यवस्था से एक ही हानि है। हम इक्कीसवीं सदी के स्वर्ग से बाहर ही रह जाएंगे। लेकिन जन हित की मांग यही है। ऐसी इक्कीसवीं हमारे किस काम की, जो अपने स्वर्ग में हमारी पूरा आबादी के दस से पंद्रह प्रतिशत लोगों के लिए ही जगह बना सके और बाकी लोगों को नरक में धकेल दे। हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य यही हो सकता है कि हमें न तो स्वर्ग में जाना है और न नरक में रहना है। इन दोनों के बीच बहुत विशाल भूखंड है, जहां हम बड़े आराम से रह सकते हैं। लेकिन यह तभी मुमकिन है जब सत्ता जनता के वास्तविक प्रतिनिधियों के हाथ में हो और उन्हें लोकतंत्र के विस्तार से डर न लगता हो। वर्तमान सत्ताएं किसान का दूरवर्ती हित और उद्योगीकरण का फैलाव, दोनों की दुश्मन हैं। उन्हें निरस्त कर जन सरकारों का गठन करने में ही दोनों का भविष्य है।